बजट 2026-27: आर्थिक समस्याएं और औंधी रणनीति
अब जबकि पूंजीवाद का सर्वोच्च दूत, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तक भारत के जीडीपी के अनुमानों की विश्वसनीयता पर संदेह जता चुका है, ठीक-ठीक बजट के आंकड़ों का, जो जीडीपी के एक खास स्तर तथा रुपयों में जीडीपी में एक खास वृद्धि दर को मानकर चलने पर आधारित होते हैं, कोई खास अर्थ ही नहीं रह जाता है।
वास्तव में वर्तमान बजट में, करारोपण संबंधी अनेक कदमों की घोषणा करते हुए, इसके अनुमान तक देने की ज़हमत नहीं उठायी गयी है कि इन कदमों से राजस्व में कितनी कमी या बढ़ोतरी होने जा रही है। फिर भी बजट के आंकड़ों से हम इस बजट की रणनीतिक दिशा का अंदाजा लगा सकते हैं और हैरानी की बात नहीं है कि यह रणनीतिक दिशा, भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में, एक पूरी तरह से विकृत रणनीति है।
इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याएं इस प्रकार हैं: आर्थिक असमानता में बेतहाशा बढ़ोतरी, जिसका परिमाण पिछले सौ वर्ष के दौरान, किसी भी समय में इतना ज्यादा नहीं था; शुद्ध गरीबी में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है, जिसे शुुरुआत में योजना आयोग द्वारा दैनिक कैलोरी आहार के मानक के आधार पर परिभाषित किया था; और बेरोजगारी में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसकी मार में अब देश के शिक्षित युवाओं का विशाल हिस्सा भी आ चुका है। इन समस्याओं का एक साझा समाधान यह है कि आम लोगों के हाथों में बड़े पैमाने पर क्रय शक्ति पहुंचायी जाए। लेकिन, अगर जीडीपी के अनुपात के रूप में राजकोषीय घाटे को नहीं बढ़ाना हो तो, इसे अमीरों की कीमत पर कर एकत्र करने के खासे बड़े प्रयास के जरिए ही हासिल किया जा सकता है। इससे, उपभोग की मांग में बढ़ोतरी के रास्ते, अर्थव्यवस्था में सकल मांग का स्तर बढ़ेगा और यह उत्पाद तथा रोजगार में बढ़ोतरी की ओर और गरीबी में कमी की ओर भी ले जाएगा। इससे आय की असमानता भी घटेगी क्योंकि अमीरों की करोपरांत आय का स्तर, अन्यथा जो होता उससे घटकर होगा।
लेकिन, बजट रणनीति की विकृति, इसमें निहित है कि उसमें जो दिशा ली जानी चाहिए थी उससे ठीक उल्टी दिशा ली गयी है। जीडीपी के हिस्से के तौर पर कुल कर राजस्व में कोई बढ़ोतरी होने के बजाए, मामूली गिरावट ही हुई है और यह 2023-24 तथा 2024-25 के 11.5 फीसद तथा 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 11.4 फीसद से कुछ घटकर, 2026-27 में 11.2 फीसद रह गया है। और बताया गया है कि इसके साथ ही राजकोषीय घाटा 2024-25 के 4.8 फीसद और 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 4.4 फीसद से घटकर, 4.3 फीसद हो जाना है। इस तरह के कुल सरकारी खर्च के दायरे में, जिसकी सीमाएं सरकार के एक ओर अमीरों पर कर बढ़ाने और दूसरी ओर राजकोषीय घाटा बढऩे देने, दोनों से ही इंकार ने तय कर दी हैं, पूंजी व्यय में बढ़ोतरी की गयी है और इसका हिस्सा 2024-25 के जीडीपी के 4.0 फीसद तथा 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 3.9 फीसद से बढ़कर, 2026-27 में 4.4 फीसद हो गया है।
राज्यों पर बढ़ता हमला
बहरहाल, पूंजी व्यय में यह बढ़ोतरी भी भ्रामक ही है। केंद्र सरकार का अपना पूंजी व्यय तो, जो 2023-24 में तथा 2024-25 में जीडीपी के 3.2 फीसद के बराबर था और 2025-26 (संशोधित अनुमान) में कुछ गिरकर 3.1 फीसद रह गया था, 2026-27 में 3.1 फीसद ही बना रहने जा रहा है। बढ़ोतरी होनी है, पूंजी परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए ग्रांट इन एड में, जो 2024-25 के 0.8 फीसद तथा 2025-26 के संशोधित अनुमान के 0.9 फीसद से बढक़र, 2026-27 में 1.3 फीसद हो जानी है। लेकिन, इस आखिरी आइटम में मगरेगा का आवंटन भी शामिल है, जिसकी फंडिंग अब केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच, 60:40 के आधार पर साझा की जा रही होगी, जबकि पहले यह साझेदारी 90:10 के आधार पर ही हो रही थी।
इसका अर्थ यह हुआ कि अगर राज्य सरकारें, जो पहले ही फंड की कमी से जूझ रही हैं, अपना आनुपातिक हिस्सा नहीं जुटा पाती हैं, जो जुटाना उनके लिए मुश्किल होगा, उस सूरत में केंद्र को भी मूल रूप में उसके द्वारा आवंटित हिस्सा खर्च नहीं करना पड़ेगा। उस सूरत में केंद्र सरकार को बजट में दर्शाया गया खर्चा करना ही नहीं पड़ेगा और इसके ऊपर से वह इस कार्यक्रम की विफलता का दोष आसानी से राज्य सरकारों के सिर पर डालने में कामयाब हो जाएगी, जबकि इस योजना के व्यय के 60:40 के अनुपात में बंटवारे के फैसले में, राज्य सरकारें तो कहीं से शामिल ही नहीं थीं। यह फैसला तो इकतरफा तरीके से और पूरी तरह से मनमाने ढंग से केंद्र सरकार ने लिया था और उसे राज्यों पर तो थोप भर दिया गया था।
कथित ‘‘सहकारी संघवाद’’ की दिखावटी संज्ञा की यही हकीकत है। इसके नाम पर हो यह रहा है कि केंद्र सरकार मनमाने तरीके से राज्य सरकारों के संसाधनों तथा उनकी जिम्मेदारियों को तय कर रही है और इस तथ्य का इस्तेमाल अपने चहेते राज्यों को बढ़ावा देने के लिए कर रही है, जो इसके पक्षपाती होने के चलते जाहिर है कि भाजपा-शासित राज्यों के साथ पक्षपात के रूप में सामने आता है, जबकि गैर-भाजपा सरकारों के हाथ बांधे जाते हैं और फिर इन विपक्षी सरकारों पर कथित ‘खराब प्रदर्शन’ का दोष डाला जाता है।
वाइवी रेड्डी की अध्यक्षता में, 14वें वित्त आयोग ने इसकी सिफारिश की थी कि करों के विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा, 2020 तक पहले के 32 फीसद से बढ़ाकर 42 फीसद कर दिया जाए। लेकिन, केंद्र सरकार ने बाकायदा कर लगाने के बजाए, जिनकी प्राप्तियों को राज्यों के साथ साझा करना होता है, सैस तथा सरचार्ज लगाने का ही सहारा लिया, जिनकी प्राप्तियों को राज्यों के साथ साझा नहीं करना होता है और इस तरह उसने यह सुनिश्चित किया कि सैस तथा सरचार्ज समेत कुल कर राजस्व में राज्यों का हिस्सा, 34 फीसद से ज्यादा ही ही नहीं पाए। यह व्यावहारिक रूप से केंद्र के हाथों में संसाधनों के केंद्रीयकरण की ही एक अवैध तिकड़म है।
पूंजी व्यय में बढ़ोतरी भ्रामक
इस कपट लीला के बावजूद, केंद्र सरकार का व्यय जहां का तहां ही रहने जा रहा है (अगर जैसी कि हमने पीछे चर्चा की, पूंजी परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए सहायता बजटीय प्रावधान से घटकर रहती है) या फिर जीडीपी के हिस्से के तौर पर उसमें मामूली सी बढ़ोतरी ही होने जा रही है। लेकिन, इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के उन तीन फौरी संकटों पर काबू पाना संभव ही नहीं है, जिनकी हम शुरू में ही चर्चा कर आए हैं। वास्तव में समग्रता में केंद्र द्वारा पूंजी व्यय, जनता के हाथों में हस्तांतरणों के मुकाबले कम रोजगार पैदा करने वाला होता है। इसकी वजह यह है कि ढांचागत खर्च का मजदूरी का घटक, जोकि पूंजी व्यय के केंद्र में होता है, कुल पूंजी व्यय का एक अंश भर होता है। इसके विपरीत, जनता के लिए हस्तांतरित समूची राशि ही, व्यावहारिक मानों में एक प्रकार से मजदूरी के भुगतान का काम करती है। और जाहिर है कि अगर ढांचागत निवेश के लिए रखे गए संसाधनों को स्कूलों, कालेजों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षकों को लगाने आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इन संस्थाओं में स्टाफ की भारी कमी है, या फिर इन संसाधनों का उपयोग सरकारी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में कर्मचारियों को बढ़ाने के लिए किया जाता है, उस सूरत में इस निवेश का रोजगार पर प्रत्यक्ष असर और इन नये रोजगार पाने वाले लोगों द्वारा पैदा की जा रही मांग के चलते द्वितीयक बहुगुणनकारी प्रभाव, कहीं ज्यादा उल्लेखनीय होगा।
इसलिए, न सिर्फ यह कि यह बजट बेरोजगारी तथा गरीबी में बढ़ोतरी के रुझान को पलटने के लिए कुछ भी नहीं करता है, वास्तव में वह इससे उल्टा काम ही करता है। यह किया जाता है एक ओर तो निजी क्षेत्र को (और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए बहुराष्ट्रीय निगमों को भी) कर रियायतें देने के जरिए और दूसरी ओर प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने करने वाले खर्चों तथा जनता के पक्ष में हस्तांतरणों की कीमत पर, ढांचागत व्यय का अनुपात बढ़ाने के जरिए।
ऐसा लगता है कि सरकार को इस सचाई का पता ही नहीं है कि निजी निवेश, बढ़ती मांग के प्रत्युत्तर में ही आता है। चाहे कितनी ही कर रियायतें क्यों न दी जाएं, पूंजीपतियों को निवेश बढ़ाने के लिए तब तक प्रेरित नहीं किया जा सकता है, जब तक पहले ही स्थापित उत्पादन क्षमता ठाली पड़ी रहती है। प्रसंगत: बता दें कि यही वजह है कि इससे पहले दी गयी तमाम कर रियायतों के बावजूद, जिनमें 2019 में कारपोरेट करों में कटौती करने जैसी भारी रियायतें भी शामिल थीं, निजी निवेश सुस्त ही बना रहा है। इसी तरह, एक ऐसे दौर में जब आम तौर पर विश्व अर्थव्यवस्था में तथा इसलिए निवेश में भी सुस्ती बनी हुई है, यह उम्मीद करना कि बहुराष्ट्रीय निगमों के करों के घटाए जाने भर से भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह चले आएंगे, बेतुकी बात है। और इसकी उम्मीद तब करना जब ट्रंप अमेरिका से निवेशों को बाहर जाने से रोकने के लिए टैरिफ बढ़ाने के हथियार का इस्तेमाल कर रहा है, और भी बेतुका है।
हालात बदतर होंगे
दो और कारणों से हालात और भी बदतर होने जा रहे हैं। पहला तो यह 2027 में प्रतिव्यक्ति 5 किलोग्राम खाद्यान्न वितरण की योजना खत्म होने वाली है। यह ग्रामीण भारत के लिए जीवन रेखा बनी रही है और इसका अंत होने से लोगों की बदहाली बहुत बढ़ जाएगी। दूसरा कारण है, व्यापार समझौते जिन पर दस्तखत किए जा रहे हैं और इनमें अब अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता भी शामिल है। अगर खबरों का सच माना जाए तो यह बाद वाला समझौता अमेरिका को तो भारतीय मालों पर 18 फीसद टैरिफ लगाने की इजाजत देता है, जबकि भारत को अमेरिकी मालों के शुल्क मुक्त आयात के लिए बाध्य करता है। इस तरह की ‘नाबराबरी की संधि’ भारतीय कृषि और खासतौर पर डेयरी क्षेत्र में भारी तकलीफें पैदा करने जा रही है। लेकिन, फासीवादी सरकार की तो जनता के प्रति दायलुता की अपनी छवि बनाने में ही ज्यादा दिलचस्पी है, न कि वास्तव में जनता की जीवन-दशाओं को बेहतर बनाने में।
1930 के दशक के फासीवाद और वर्तमान फासीवादी सरकारों के बीच के अंतर को, यह बजट रेखांकित करता है। 1930 के दशक में फासीवादी देशों में सैन्य खर्चों को बढ़ाने के लिए, राजकोषीय घाटे में भारी बढ़ोतरियां की गयी थीं। इससे सकल मांग का स्तर पर बहुत बढ़ा था और ये देश महामंदी से उबरने में कामयाब हो गए थे। इसके अलावा सरकारी खर्चों में यह बढ़ोतरी, ऑटोबानों के निर्माण तथा सैन्य साज-सामान की खरीद जैसे ढांचागत निवेश तक ही सीमित नहीं थे बल्कि इनमें सैन्य बलों के आकार में बढ़ोतरी भी शामिल थी, जिससे प्रत्यक्ष तरीके से रोजगार बढ़ा था। लेकिन, भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार जैसी आज की फासीवादी सरकारें, न तो सकल मांग को बढ़ाने के लिए राजकोषीय घाटा बढ़ा सकती हैं और न उसमें इसका बूता है कि (सिर्फ ढांचागत क्षेत्र पर खर्च बढ़ाने से भिन्न) जनता के लिए प्रत्यक्ष रूप से रोजगार बढ़ा सकें या उसके पक्ष में हस्तांतरण कर सकें। जहां तक रोजगार बढ़ाने का सवाल है, वे दोनों ही पहलुओं से नाकाम हैं। इसलिए, आने वाले महीनों में उनका ‘‘नफरत फैलाने’’ का सहारा लेना और भी बढ़ जाने वाला है।
(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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