आर्थिक सर्वे में नहीं दिखी अर्थव्यवस्था की ज़मीनी हक़ीक़त
संसद में गुरुवार को आर्थिक सर्वे 2025-26 पेश कर दिया गया। इसमें सब अच्छा ही अच्छा है। गुड ही गुड। आर्थिक सर्वे भारत की अर्थव्यवस्था का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड है जिससे हमारी अर्थव्यवस्था की सेहत पता चलती है। इसे सरकार बजट से पहले पेश करती है। इसमें पिछले वित्त वर्ष 2025-26 का लेखा-जोखा और आने वाले वित्तीय वर्ष यानी 26-27 के लिए अनुमान व नीति-सुझाव शामिल हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे सदन में पेश किया।
इस आर्थिक सर्वे में अगले वित्त वर्ष के लिए विकास दर यानी GDP वृद्धि की संभावना 6.8% से 7.2% के बीच बताई गई है। कहा गया है कि घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और निवेश बढ़ रहा है। गिग इकोनॉमी का विस्तार हो रहा है।
मुद्रास्फीति में नियंत्रण दिखाया गया है और राजकोषीय घाटा (Fiscal deficit) सीमित रखने पर जोर दिया गया है। भारतीय रुपये की गिरावट समेत जो भी कमी-बेशी है उसके लिए वैश्विक कारण ज़िम्मेदार बता दिए गए हैं।
लेकिन जानकार ऐसा नहीं मानते। विश्लेषकों का कहना है कि GDP ग्रोथ का अनुमान ज़मीन से कटा आशावाद है। 6.8–7.2% की विकास दर का अनुमान घरेलू मांग और निवेश पर टिका है, लेकिन वास्तविक वेतन (real wages) कई क्षेत्रों में स्थिर हैं या घटे हैं। ग्रामीण खपत अभी भी प्री-कोविड स्तर तक नहीं पहुंची। सर्वे मैक्रो संकेतकों को मजबूत बताता है, लेकिन घर-परिवार की आर्थिक हालत पर गहराई से बात नहीं करता। सवाल है कि अगर आम आदमी की क्रय-शक्ति नहीं बढ़ रही, तो खपत-आधारित ग्रोथ कब तक टिकेगी?
बेरोज़गारी और रोज़गार की गुणवत्ता पर गोलमोल भाषा है। सर्वे में गिग इकोनॉमी और स्वरोज़गार को रोज़गार वृद्धि की सफलता के रूप में दिखाया गया है। लेकिन यह साफ़ नहीं करता कि कितनी नौकरियां स्थायी, सामाजिक सुरक्षा वाली हैं। सर्वे समावेशी विकास की बात करता है, लेकिन आय और संपत्ति असमानता पर कोई ठोस अध्याय नहीं है। निजी निवेश पर ज़्यादा भरोसा किया गया है लेकिन जोखिम की अनदेखी की गई है। सर्वे मानता है कि निजी निवेश आगे ग्रोथ का इंजन बनेगा। पर यह नहीं बताता कि MSME सेक्टर अभी भी कर्ज़ और मांग की कमी से जूझ रहा है। बड़े कॉरपोरेट भी कुछ ज़्यादा रोजगार पैदा नहीं कर रहे है। AI Economic Council जैसी सिफारिशें भविष्य-मुखी हैं। लेकिन AI से नौकरियां खत्म होने के जोखिम पर गंभीर आकलन नहीं है।
राजकोषीय घाटा सीमित रखने की बात की गई है लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ाने की जरूरत को समान महत्व नहीं दिया गया है। कुल मिलाकर आर्थिक सर्वे एक यूटोपिया रचता है जिसमें देश के आम नागरिक की आर्थिक हक़ीक़त नहीं झलकती।
अब एक फ़रवरी को आम बजट पेश किया जाएगा, देखते हैं कि सरकार उसमें देश के आम मेहनतकश, मज़दूर-किसान-नौजवान का कितना ध्यान रखती है।
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