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ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा ने तो संसद में हमेशा उछाले हैं अख़बार

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन अपने साप्ताहिक कॉलम में भाजपा की दोहरी नीति, ममता की रणनीति और कांग्रेस के ‘मनरेगा बचाओ’ आंदोलन का हाल बता रहे हैं।
MANMOHAN
फ़ाइल फ़ोटो। यह 2004 की तस्वीर। संसद में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने खड़े हुए थे तब उनके सामने पहुंचकर बीजेपी के सांसदों ने हंगामा किया था। साभार: सोशल मीडिया

 

लोकसभा में बीते सोमवार को बड़ा विवाद हुआ कि राहुल गांधी कैसे एक बिना छपी हुई किताब के अंश पढ़ कर मुद्दा उठा रहे हैं। संसद के कामकाज के नियम 349 के हवाले से कहा गया कि संसद में किसी बिना छपी हुई किताब या अखबार या पत्रिका की कतरन के आधार पर चर्चा नहीं की जा सकती है। हालांकि स्पीकर ओम बिरला को यह कहते भी सुना गया कि किसी भी किताब या अखबार के आधार पर मुद्दे नहीं उठाए जा सकते। राहुल कोई 45 मिनट तक बोलने का प्रयास करते रहे और अंत में इतने परेशान हो गए कि उन्होंने तंज करने के अंदाज में स्पीकर से पूछा कि वे बता दें कि नेता प्रतिपक्ष को क्या बोलना चाहिए।

हैरानी की बात है कि पत्रिका और किताब के आधार पर मुद्दे उठाने से रोकने की कोशिश कर रही भाजपा ने विपक्ष में रहते सबसे ज्यादा राजनीति इसी आधार पर की है। इंदिरा और राजीव गांधी के जमाने से लेकर नरसिंहराव और मनमोहन सिह के जमाने तक भाजपा के नेता अक्सर अखबारों में छपी खबरों के हवाले से संसद में हंगामा करते थे। बोफोर्स का मामला तो स्वीडिश रेडियो ने खोला था और उसके बाद अखबारों ने वह मुद्दा उठाया था। उस समय भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने लगातार अखबारों में और खासकर 'इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी खबरों के आधार पर संसद में मुद्दे उठाए थे। नरसिंहराव और मनमोहन सिंह के समय भी तमाम कथित घोटाले अखबारों में छपी खबरों के आधार पर ही संसद में उठाए गए थे। लेकिन अब भाजपा को पत्रिका और किताब से समस्या है।

नकदी बांटने की योजनाएं कब तक? 

इस बार के आम बजट और उससे पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण के दौरान इस बात पर खूब चर्चा हुई है कि नकदी बांटने की योजनाएं कब तक चलती रहेंगी। आर्थिक सर्वेक्षण में वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने इसके आंकड़े दिए हैं। हालांकि एक साल पहले आर्थिक सर्वेक्षण में इस किस्म की योजनाओं की तारीफ की गई थी। लेकिन इस बार यह चिंता जताई गई है कि इस किस्म की योजनाओं से राजकोष पर बहुत बोझ बढ़ रहा है और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास की अनेक योजनाओं पर बुरा असर पड़ रहा है। 

असल में एक अनुमान के मुताबिक देश की कई राज्य सरकारें मिल कर सिर्फ महिलाओं के लिए शुरू की गई योजनाओं में हर साल दो लाख करोड़ रुपए बांट रही हैं। अभी कई राज्यों ने ऐसी योजना शुरू नहीं की है। अगर देश के सभी राज्य ऐसी योजना शुरू कर दे तो यह राशि चार लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है। महिलाओं के अलावा दूसरे कई और समूहों को भी नकद पैसे दिए जा रहे हैं। इसीलिए अब इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि योजना की घोषणा के साथ ही सनसेट क्लॉज भी लगाया जाना चाहिए। इसमें यह बता दिया जाना चाहिए कि योजना कितने दिन तक चलेगी। उस सीमा के बाद इसे समाप्त कर देना चाहिए। नकद बांटने की योजना को अनंतकाल तक चलाए रखना देश के लिए ठीक नहीं है।

जनगणना में भी समस्या आएगी! 

मतदाता सूचियों को विशेष गहन पुनरीक्षण तो अभी तक संदेह और विवादों के घेरे में है ही और अब जनगणना को लेकर भी एक महत्वपूर्ण सवाल सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि जाति जनगणना के लिए जाति प्रमाणपत्र या जाति को प्रमाणित करने वाला कोई एक प्रमाणपत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि जाति गणना के लिए सेल्फ डिक्लेरेशन पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे कुछ जातियों के आंकड़े असाधारण रूप से ज्यादा और कुछ के कम हो सकते हैं। इसलिए ऑनलाइन जनगणना फॉर्म भरने के समय भी कोई दस्तावेज अनिवार्य किया जाना चाहिए। अगर कोई दस्तावेज अनिवार्य किया जाता है तो उसमें निर्धारित से ज्यादा समय लगेगा। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका में उठाए गए बिंदुओं से सहमति जताई है। इतना ही नहीं सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता आकाश गोयल की तारीफ की है कि उन्होंने यह मुद्दा उठाया और अदालत का ध्यान इस ओर खींचा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और याचिका में उठाए गए बिंदुओं से सैद्धांतिक सहमति जताई। 

अदालत को भी लग रहा है कि अगर कोई दस्तावेज अनिवार्य नहीं किया गया तो संतुलन बिगड़ सकता है। हालांकि अभी अदालत ने मामला जनगणना करने वाली संस्था पर छोड़ा है कि वह इस चिंता का क्या हल निकालती है। 

ममता बनर्जी क्या अब भी अकेले चलेंगी? 

संसद के बजट सत्र में विपक्षी पार्टियों के बीच कमाल की एकजुटता बनी है। विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां राहुल गांधी के साथ खड़ी है और उनके उठाए मुद्दों का समर्थन कर रही है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के सांसद अब भी अलग मुद्दा उठाए हुए हैं। इसका तात्कालिक कारण ममता बनर्जी का दिल्ली पहुंचा रहा। दो फरवरी को उन्हें चुनाव आयोग से मिलना था, जहां उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को खूब आडे हाथों लिया। अगले दिन तीन फरवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भी सरकार और चुनाव आयोग को घेरा। फिर सुप्रीम कोर्ट में पेश हुईं। उनका दावा है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के जरिये लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। हालांकि राहुल गांधी ने इस मसले पर चुप्पी साधी है। दरअसल कांग्रेस को पता है कि पश्चिम बंगाल मे उसका बहुत कुछ दांव पर नहीं है। इसलिए उसके नेता एसआईआर का मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। कांग्रेस के नेताओं को शिकायत है कि ममता बनर्जी जान बूझकर राहुल गांधी की अनदेखी करती हैं। राहुल जो मुद्दे उठाते हैं, उन पर वे चुप रह जाती हैं। इसके साथ ही बंगाल के बाहर दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए ममता बनर्जी काम करती है। इसीलिए कांग्रेस चुप है। अब तृणमूल के नेता चाहते हैं कि किसी तरह से संसद सत्र के दौरान कांग्रेस को तैयार किया जाए कि वह एसआईआर के मुद्दे पर बोले। यह तभी होगा, जब ममता बनर्जी कांग्रेस और राहुल के मुद्दों का समर्थन करेंगी।

कहां है कांग्रेस का 'मनरेगा बचाओ’ आंदोलन?

कांग्रेस पार्टी ने काफी सोच-विचार कर और योजना बना कर पिछले महीने 'मनरेगा बचाओ’ आंदोलन शुरू किया था। यह आंदोलन शुरू होने से पहले राहुल गांधी ने कई बार कहा कि जिस तरह से केंद्र सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने एकजुट होकर आंदोलन किया था, उसी तरह मनरेगा को समाप्त करके 'वीबी ग्राम जी कानून’ लाने के खिलाफ मजदूर एकजुट होंगे। 

राहुल का दावा है कि केंद्र सरकार को यह कानून भी वापस लेना होगा, जैसे उसने कृषि कानून वापस लिए थे। लेकिन सवाल है कि क्या इन कानून को वापस लेने के लिए उसी तरह का आंदोलन हो रहा है, जैसा किसानों ने किया था? हजारों किसानों ने भीषण सर्दी, गरमी और बरसात का सामना करते एक साल तक दिल्ली की घेराबंदी करके रखी थी। उस दौरान सैकड़ों किसानों की जान गई थी। तब सरकार ने वह कानून वापस लिया था। लेकिन मनरेगा को खत्म करने के खिलाफ कांग्रेस जो आंदोलन कर रही है वह कहीं दिख नहीं रहा है। 

10 जनवरी से शुरू हुआ आंदोलन 15 फरवरी तक चलना था। लेकिन एक महीना पूरा होने से पहले ही इसकी चर्चा बंद हो गई है। शुरू में कुछ दिन तो कांग्रेस के नेताओं ने जिला मुख्यालयों आदि में प्रदर्शन वगैरह किया लेकिन अब वह भी बंद है। अगर राहुल गांधी चाहते हैं कि नया कानून वापस हो तो इस तरह ढीले ढाले अभियान से वह नहीं हो पाएगा। इसके लिए सुनियोजित आंदोलन की जरुरत पड़ेगी। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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