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कटाक्ष: थैंक यू, मोदी जी! आप उस दिन संसद में नहीं आए

बिड़ला जी को आइंदा सांसदों के दांतों के ख़तरे से पीएम की हिफ़ाज़त का भी कुछ तो इंतेज़ाम करना ही होगा।
MODI SANSAD

भाई हम तो बिड़ला जी से सहमत हैं, पूरी तरह से। कौन से बिड़ला जी? बिड़ला हाउस वाले बिड़ला जी नहीं, नागपुरिया कुनबे वाले बिरला जी। लोकसभा की ऊंची कुर्सी वाले बिड़ला जी। बिड़ला जी ने दिल की गहराई से कहा--थैंक यू मोदी जी! थैंक यू मोदी जी, सलाह का मान रखने के लिए। थैंक यू मोदी जी, स्पीकर की सलाह मानकर, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देने के लिए लोकसभा में नहीं आने के लिए।

मोदी जी अगर बिड़ला जी की सलाह सुनकर भी नहीं मानते और अपने भाषण के लिए तय टाइम पर लोकसभा में पहुंच जाते तो? अघट घट जाता, अघट। विपक्षी सांसदों ने जाने क्या ‘‘अप्रत्याशित’’  कर दिया होता। संसद की गरिमा, लोकसभा की परंपराओं और जनतंत्र की इज्जत तक, सब को विपक्षियों ने तार-तार कर दिया होता। पर मोदी जी की कृपा से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 

मोदी जी ने संसद की गरिमा, लोकसभा की परंपराओं और संसद की इज्जत का बाल भी बांका नहीं होने दिया। मोदी जी ने खुद ही न आकर, इन सारे खतरों को और वास्तव में विपक्षी षडयंत्रों को ध्वस्त कर के रख दिया। न मोदी जी लोकसभा में आए और न विपक्षी वह अघट घटा पाए, जिसे घटाने का मोदी विरोधी विपक्ष का षडयंत्र था।

यह कोई न भूले कि बिड़ला साहब को विपक्षी षडयंत्र की पक्की जानकारी थी। उन्होंने खुद अपने मुंह से कहा और इधर-उधर नहीं, खुद लोकसभा में अपने ऊंचे आसन पर बैठकर कहा कि उन्हें ‘‘पुख्ता’’ जानकारी मिली थी। और लोकसभा में जो दृश्य उन्होंने देखे थे, जिस तरह विपक्षी सांसद विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, जिस तरह एक-दो नहीं पूरी तीन-तीन महिला सांसद, संसद के वेल में जाकर विरोध जता रही थीं, उससे उनकी जानकारियों की पुष्टि होती थी। ये महिला सांसद जहां थीं, वहां से प्रधानमंत्री का आसन जरा सी ही दूरी पर तो था। ये सांसद आसानी से प्रधानमंत्री को उनके आसन पर घेर सकती थीं। कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था बल्कि कुछ भी अप्रत्याशित करने की विपक्ष की तैयारी थी। पर मोदी जी और बिड़ला जी ने मिलकर, इस पूरे के पूरे षडयंत्र को ही विफल कर दिया। मोदी जी आए ही नहीं। जब बाबा ही नहीं आए, तो घंटा कैसे बजता!

पर बिड़ला जी के साथ-साथ मोदी जी का थैंक यू करना तो दूर रहा, उल्टे विपक्ष वाले इसका शोर मचा रहे हैं कि मोदी जी सवालों से डर कर भाग गए! बिड़ला जी ने संसद की परंपरा और डेमोक्रेसी  वगैरह को बचाने के लिए भरी लोकसभा में मोदी जी का थैंक यू भी कर दिया, तब भी विपक्ष वाले भाग गए, भाग गए की रट लगाए हुए हैं। यह विपक्ष वालों की थेथरई को ही दिखाता है। 

लोकसभा वाला षडयंत्र विफल हो गया, तब भी बेशर्मी से पीएम मोदी को बदनाम करने का षडयंत्र चलाए जा रहे हैं। कह रहे हैं कि मोदी जी की छप्पन इंची छाती, कोरे प्रचार की चीज थी। नरवणे की फैसले की मांग से लेकर, एप्स्टीन फाइल और ट्रंप डील तक, जब भी नपने का सवाल आया, मिस्टर 56 इंच दुम दबाकर भाग गए। पर यह सब भी विपक्षी षडयंत्र ही है--भारत के पीएम की छाती को छोटा कर के दिखाने का षडयंत्र। 

विपक्षियों को यह हजम ही नहीं हो रहा है कि मोदी जी भारत को विश्व गुरु के आसन पर बैठाने से पहले ही, विश्व मल्ल के आसन पर कब्जा भी जमा चुके हैं। छप्पन इंची छाती का, बाकी ग्रहों की तो हम नहीं कहते, पर दुनिया भर के नेताओं में तो और कोई दावेदार है नहीं।

और विरोधी जो बार-बार इसकी दलील दे रहे हैं कि तीनों महिला सांसद तो निहत्थी थीं, पिन से लेकर आलपिन तक उनके पास तो कुछ भी नहीं था, उनसे सैकड़ों भक्त सांसदों के बीच प्रधानमंत्री को क्या खतरा हो सकता था, उसका क्या? पर इस दलील में क्या वाकई कोई दम है? मोदी जी की गद्दी की सबसे बड़ी रक्षक, तेलुगू देशम के प्रवक्ता ने सत्तापक्ष की ओर से एकदम सही बताया है। महिला सांसदों के पास कोई हथियार न होने से क्या हुआ, उनके पास दांत तो थे। दांत भी थोड़े नहीं, एक-एक के करीब बत्तीस। सब मिलाकर सौ के करीब दांत। जरा सोचिए, अगर सौ दांतों से प्रधानमंत्री को काटा गया होता तो क्या होता? माना कि यह भी किसी न किसी तरह का विश्व रिकार्ड होता, पर राष्ट्र पर जो संकट आ जाता उसका क्या होता? बिड़ला जी को आइंदा सांसदों के दांतों के खतरे से पीएम की हिफाजत का भी कुछ तो इंतेज़ाम करना ही होगा। 

वैसे यही क्यों माना जाए कि प्रधानमंत्री पर संसद में महिला सांसदों के दांत हमले का ही खतरा था? बिड़ला जी ने कब कहा कि  दांत हमले का ही खतरा था? उनकी पुख्ता जानकारी तो प्रधानमंत्री के साथ कुछ भी ‘‘अप्रत्याशित’’ घट सकने की थी! सिर्फ दांत हमला ही क्यों, प्रधानमंत्री पर किताब हमला भी तो हो सकता था। क्या राहुल गांधी ने अपनी ओर से चाहे शेखी बघारते हुए ही सही, खुद ही सार्वजनिक रूप से इसका इशारा नहीं कर दिया था? क्या राहुल गांधी ने नरवाणे की किताब दिखाते हुए कहा नहीं था कि प्रधानमंत्री सदन में आएंगे, तो वह उन्हें नरवाणे की किताब देंगे! क्या यह प्रधानमंत्री के लिए अप्रत्याशित नहीं होता? रक्षामंत्री ने कहा कि नरवाणे की किताब है ही नहीं, गृहमंत्री ने कहा कि किताब है ही नहीं, प्रधानमंत्री ने कहा कि किताब है ही नहीं है, फिर भी किताब का वह भूत प्रधानमंत्री के हाथों में! सोचा है इसका नतीजा? साफ है कि राहुल का किताब ‘‘देना’’ सिर्फ शाब्दिक अर्थ में देना नहीं था। उसके खतरनाक अर्थ संकेत थे। थैंक यू मोदी जी इस संकट से देश को बचाने के लिए और थैंक यू बिड़ला जी, प्रधानमंत्री को इस संकट से देश को बचाने का रास्ता दिखाने के लिए।

और यह सवाल करना तो  विरोधियों की सरासर कठहुज्जती है कि अगर बिड़ला जी को सदन में मोदी जी के साथ कुछ अघट घटने की पुख्ता जानकारी थी, तो उन्होंने यह जानकारी, सुरक्षा के उपाय करने के लिए सरकार के अधिकारियों के साथ साझा क्यों नहीं की और प्रधानमंत्री को मौके से ही गायब हो जाने की सलाह क्यों दी? और जानकारी अगर पुख्ता थी, तो इस जानकारी पर अब षडयंत्र के विफल हो जाने के बाद क्या कार्रवाई की जा रही है? लेकिन, ऐसे सवाल ही अनुचित हैं। बिड़ला जी सभी सांसदों के संरक्षक हैं और ऊपर से संस्कारी हैं; संसद की बात यानी उनके घर की बात और घर के मुखिया होने के नाते उन्हें घर की बात घर में ही निपटाना खूब आता है। पीएम के साथ अप्रत्याशित घट सकता था, नहीं घटा और षडयंत्र करने वालों को चेतावनी भी मिल गयी, सांप भी मर गया और लाठी भी मर गयी।  अमृतकाल में भला और क्या चाहिए?

बस हमें बिड़ला जी से एक ही बात की शिकायत है। उन्होंने अपनी ओर से तो मोदी जी का थैंक यू किया, पर इतना तो काफी नहीं था। वह कम से कम 140 करोड़ भारतीयों की ओर से तो मोदी जी का थैंक यू कर ही सकते थे। मोदी जी ने कितने बड़े संकट से देश को बचा लिया। और विश्व को भी। आखिरकार, मोदी जी को किसी ने काट-वाट लिया होता, तो पूरी दुनिया उलट-पलट हो सकती थी। ट्रंप ने वैसे ही युद्ध रुकवाने के नाम पर, कई नये युद्ध छिड़वा दिए हैं। विश्व युद्ध भी छिड़ सकता था। इसलिए, 600 करोड़ पृथ्वी वासियों की ओर से थैंक यू भी हो जाता तो कोई गलत बात नहीं होती। खैर! बिड़ला जी के ही थैंक यू में सब का थैंक यू शामिल माना जाए। फिर, फिर थैंक यू मोदी जी! 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)

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