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मोदी सरकार का डबल गेम!, UGC गाइडलाइंस पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

सुप्रीम कोर्ट ने UGC की नई गाइडलाइंस पर रोक लगा दी है। इस तरह मोदी सरकार ने एक तीर से दो निशाने साध लिए। सामाजिक न्याय का झंडा भी उठा लिया और अब दबंग जातियों को भी ख़ुश कर लिया।
UGC-SC

इसे कहते हैं चित भी मेरी पट भी मेरी। सुप्रीम कोर्ट ने UGC की नई गाइडलाइंस पर रोक लगा दी है। इस तरह मोदी सरकार ने एक तीर से दो निशाने साध लिए। सामाजिक न्याय का झंडा भी उठा लिया और अब दबंग जातियों को भी ख़ुश कर लिया। नियम लाए भी और नहीं भी लाए। 

आपको मालूम ही है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की थी जो 15 जनवरी से लागू मानी गई थी। इन्हें नाम दिया गया था– Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, जन्मस्थान, लिंग, विकलांगता आदि के आधार पर भेदभाव रोकना था। ये नई गाइडलाइंस, 2012 की गाइडलाइंस की जगह ले रही थी। वो भी इसलिए क्योंकि रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मांओं और प्रगतिशील छात्रों ने जातीय उत्पीड़न के ख़िलाफ़ रोहित वेमुला एक्ट की मांग को लेकर लंबा संघर्ष किया। 

जानकार इन नई गाइडलाइन को ही कमज़ोर बता रहे थे और इन्हें ज़्यादा सख़्त बनाने की मांग कर रहे थे, लेकिन एक वर्ग जो खुद को विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग समझता है, उसके कुछ लोगों ने ऐसा हंगामा किया कि उसके दबाव में यह गाइड लाइंस ही अब लागू नहीं हो पाएंगी।

गुरुवार 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तत्काल सुनवाई की और इन गाइडलाइंस पर रोक लगा दी। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इन नियमों के दुरुपयोग का ख़तरा है। नए नियम अगर गलत तरीके से लागू हुए तो सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है। कोर्ट ने केंद्र/UGC से विस्तृत जवाब मांगा है और नए सिरे से ड्राफ्ट करने का निर्देश दिया है। अब अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फ़िलहाल 2012 के यूजीसी के नियम ही देशभर में लागू रहेंगे।

आपको मालूम है कि लंबे छात्र संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही ये नए नियम बने थे। कोर्ट ने ही 2012 की गाइडलाइन को नाकाफ़ी माना था। 

अब कोर्ट पूछ रहा है कि जब भेदभाव की परिभाषा पहले से सभी तरह के भेदभाव को कवर करती है तो जाति आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने की ज़रूरत क्यों पड़ी।

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि रेगुलेशंस में रैगिंग को क्यों शामिल नहीं किया गया, जबकि यह कैंपस की एक बड़ी समस्या है। लेकिन आपको बता दें कि रैगिंग पर पहले से ही रोक है और रैगिंग एक दंडनीय अपराध है। 

चीफ़ जस्टिस यह भी कहते हैं अनुसूचित जातियों में भी कई लोग अब आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुके हैं। हमने अब तक जो जातिविहीन समाज की दिशा में प्रगति की है क्या हम फिर पीछे से जा रहे हैं? 

लेकिन चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत जी यह टिप्पणी करते हुए भूल गए कि अभी पूर्व चीफ़ जस्टिस बीआर गवई पर उनकी जाति की वजह से ही एक वकील ने जूता उछाल दिया था। 

कुल मिलाकर साफ़ है कि इस मामले में सरकार और यूजीसी शायद यही चाहती थी। कहने वाले कह रहे हैं कि उसने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में शायद ठीक से पैरवी नहीं की, अपना पक्ष नहीं रखा। वरना आपने देखा कि एसआईआर पर पूरे विपक्ष ने ऐड़ी से चोटी तक का ज़ोर लगा लिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट से एसआईआर रुकवा नहीं सका। लेकिन यूजीसी गाइड लाइंस पर दबंग जाति के लोग ज़रा सड़क पर क्या उतरे। सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सब चिंतित हो गए। 

इस पूरे मामले ने मोदी सरकार और कॉरपोरेट यानी गोदी मीडिया की भी कलई एक बार फिर खोल कर सामने रख दी। इस गाइडलाइंस को लेकर जिस तरह हो-हल्ला, हंगामा हुआ, उसे रोकने वाला कोई नहीं था। जेएनयू में सरकार विरोधी एक ज़रा से नारे पर बवाल मचाने वालों ने खुद इस गाइडलाइन का विरोध करते हुए “मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी, यूजीसी की छाती पर”, जैसे नारे लगाए। प्रधानमंत्री मोदी के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। मोदी और अमित शाह की तस्वीरों पर कालिख पोत रहे थे लेकिन ना तो बीजेपी को बुरा लगा ना उसके गोदी मीडिया को जो ऐसे ही किसी एक नारे पर रात-दिन हल्ला मचा देता है, कि प्रधानमंत्री मोदी का अपमान हो गया। ऐसे लोगों को टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाने लगता है, देशद्रोह के मुकदमे दर्ज होने लगते हैं। लेकिन जब बीजेपी के कोर वोटर ने ही उसके ख़िलाफ़ ऐसा हल्ला बोला तो सबको सांप सूंघ गया। अभी तक एक भी ख़बर नहीं मिली कि इस मामले में किसी के ख़िलाफ़ पुलिस-प्रशासन ने एक भी मुकदमा लिखा हो।

ख़ैर, सरकार का काम हो गया है। दलित-पिछड़े-वंचित वर्ग को एक बार फिर ठग लिया गया है। 

अब दलित-पिछड़े समाज के कई नेता और संगठन, साथ ही वामपंथी प्रगतिशील छात्र संगठन एक बार फिर भेदभाव और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए हैं और अब इन गाइडलाइंस को लागू कराने का आंदोलन शुरू हो गया है। अब देखते हैं कि इनका असर क्या होता है, हालांकि…

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

 

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