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ख़बरों के आगे-पीछे: बीजेपी की असम-बंगाल सब जगह हिंदू-मुस्लिम की बिसात

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन अपने साप्ताहिक कॉलम में असम से लेकर बंगाल तक के चुनाव में बीजेपी की रणनीति पर बात कर रहे हैं। साथ ही तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश की राजनीति को भी डिकोड कर रहे हैं।
Himanta Suvendu

असम का चुनाव सभ्यताओं का संघर्ष!

आमतौर पर चुनावों को पानीपत की लड़ाई बताया जाता है लेकिन अब एक राज्य के चुनाव को सभ्यताओं का संघर्ष बताया जा रहा है। असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को सभ्यताओं का संघर्ष कहा है। चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने का प्रयास कर रहे सरमा ने दावा किया है कि 2011 में 34 फीसदी आबादी मुस्लिम थी, जो अब लगभग 40 फीसदी हो गई है। उनका दावा है कि इसमें ज्यादा हिस्सा बांग्लादेश से आए 'मियां मुस्लिमका है। उनके खिलाफ बाकी लोगों को एकजुट होकर चुनाव लड़ना है और इसलिए यह सभ्यताओं का संघर्ष है। 

हैरानी की बात है कि असम में पिछले 10 साल से भाजपा की ही सरकार है। पांच साल से तो खुद सरमा मुख्ममंत्री हैं और 11 साल से ज्यादा समय से केंद्र में भाजपा की सरकार है। फिर सीमा पार से कैसे घुसपैठ हो रही है और कैसे 'मियां मुस्लिमआबादी इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है? इससे पहले वे मदरसे बंद कराने से लेकर बहुविवाह रोकने सहित कई उपाय आजमा चुके हैं। अब जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है और सरकार के विरोध का माहौल बन रहा है, वैसे-वैसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नए-नए मुद्दे उठाए जाने लगे हैं। गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस मजबूती से तैयारी कर रही है। इस बार कांग्रेस ने एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल से गठबंधन नहीं करने का ऐलान किया है। सो, ध्रुवीकरण कराना थोड़ा मुश्किल हो रहा है। इसीलिए सभ्यताओं के संघर्ष का शिगूफा उछाला जा रहा है।

बांग्लादेश की घटनाओं का असर बंगाल में

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार की घटनाएं हो रही है और पश्चिम बंगाल में उन हिंदुओं की जाति बता कर राजनीति हो रही है। पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि 18 दिसंबर को जिस हिंदू युवक की हत्या की गई थी और पेड़ पर लटका कर जिंदा जला दिया गया था वह दलित था। उनका कहना है कि दलित हिंदू की हत्या हुई इसलिए तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ सवाल नहीं उठा रही है। दूसरे हिंदू अमृत मंडल उर्फ सम्राट की हत्या का मुद्दा भी जोर-शोर से उठ रहा है। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश की घटनाओं को लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। केंद्र सरकार अपने स्तर पर कूटनीतिक पहल कर रही है। बांग्लादेश के उच्चायुक्त को बुला कर दो बार इस बारे में चिंता जताई गई है। लेकिन शुभेंदु अधिकारी भी अपनी ओर से कोलकाता में बांग्लादेश के वाणिज्य दूतावास में गए और हिंदुओं पर हमले को लेकर चिंता जताई। 

कोलकाता से लेकर सिलिगुड़ी तक भाजपा और अन्य हिंदू संगठनों के प्रदर्शन हो रहे हैं। इस बीच सिलिगुड़ी और दार्जिलिंग में बांग्लादेशियों का बहिष्कार शुरू हो गया है। सिलिगुड़ी होटल ऑनर्स एसोसिएशन ने बांग्लादेशी नागरिकों को अपने होटल में नहीं ठहराने का फैसला किया है। गौरतलब है कि बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होने वाले हैं। अगर उस समय तक हिंसा होती है और हिंदू शिकार बनते हैं तो बांग्लादेश और मुसलमानों के प्रति नाराजगी बढ़ेगी। इससे हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं। इसीलिए भाजपा बांग्लादेश के मुद्दे पर पश्चिम बंगाल का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

अब कांग्रेस और डीएमके में भी खटपट

कांग्रेस के नेता पता नहीं किस सोच में हर जगह पहले से बने हुए समीकरण और राजनीतिक संरचना को ध्वस्त करना चाहते हैं। बिहार में उन्होंने ऐसा किया, जिसका नुकसान सभी पार्टियों को हुआ। उसके बाद कांग्रेस के नेता उत्तर प्रदेश को लेकर बयानबाजी करने लगे। उधर महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव में गठबंधन टूट ही गया। अब तमिलनाडु में कांग्रेस के नेता हाथ आजमा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि उसे सरकार में शामिल किया जाए। कांग्रेस को सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए क्योंकि उसके नेताओं का कहना है कि कांग्रेस का भी अपना घोषणापत्र है और जनता से किया गया वादा है, जिसे पूरा करने के लिए उसका सरकार में रहना जरूरी है। 

कांग्रेस ने इस बार विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे से पहले इसकी मांग शुरू कर दी है। कांग्रेस के तमिलनाडु के प्रभारी गिरीश चोडनकर ने कहा है कि अगले चुनाव से पहले डीएमके को ऐलान करना चाहिए कि कांग्रेस सरकार का हिस्सा बनेगी तभी तालमेल की घोषणा होगी। दूसरी ओर डीएमके नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को अगर सरकार में शामिल करने का ऐलान किया गया तो सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस की दूसरी पार्टियां भी इसकी मांग करेगी और फिर जो खिचड़ी सरकार बनेगी उसके लिए काम करना मुश्किल हो जाएगी। दोनों तरफ से इस पर जोर आजमाइश चल रही है। इस बीच कांग्रेस के नेता सरकार के कर्ज के आंकड़े निकाल कर स्टालिन सरकार को कठघरे में खड़ा करने लगे हैं। 

ओडिशा में जनता की ताकत दिखी

ओड़िशा की भाजपा सरकार ने पिछले दिनों बड़ा फैसला किया था। विधानसभा में विधेयक लाकर सरकार ने विधायकों के वेतन को तीन गुना से ज्यादा बढ़ा दिया था। पहले विधायकों का वेतन और भत्ता एक लाख रुपए के करीब था, जिसे बढ़ा कर 3.35 लाख रुपया कर दिया गया। यही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और विधायकों की पेंशन में भी लगभग तीन गुना बढोतरी कर दी गई। इसे लेकर बड़ा विवाद हुआ, सवाल उठे। कहा गया कि विधायकों का वेतन और भत्ता बढ़ना चाहिए क्योंकि कई बरसों से नवीन पटनायक की सरकार ने उसमें बढ़ोतरी नहीं की थी। लेकिन ओडिशा जैसे गरीब राज्य में एक बार में वेतन तीन गुना से ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं है। आम लोगों ने इसका विरोध शुरू किया। सोशल मीडिया में इसके खिलाफ नैरेटिव बना। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष नवीन पटनायक ने तुरंत इस जनभावना को पकड़ा और ऐलान कर दिया कि वे बढ़ा हुआ वेतन नहीं लेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो उनके वेतन का बढ़ा हुआ हिस्सा जन कल्याण की किसी दूसरी योजना में इस्तेमाल करे। जब बीजू जनता दल के सर्वोच्च नेता ने बढ़ा हुआ वेतन लेने से इनकार कर दिया तो फिर उनकी पार्टी के दूसरे विधायक भी इसके खिलाफ खड़े हुए। अंत में भाजपा के विधायकों को भी मजबूरी मे इसका विरोध करना पड़ा। तब भाजपा की सरकार मजबूर हुई बढ़ा हुआ वेतन वापस करने के लिए। बढ़ाए गए वेतन में से जनता के दबाव में कुछ कटौती होगी।

चंद्रबाबू नायडू की योजना क्या कारगर होगी?

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एक बड़ा ऐलान किया है कि अगर आंध्र प्रदेश का कोई व्यक्ति क्वांटम कंप्यूटिंग में नोबल पुरस्कार जीतता है तो उसको राज्य सरकार एक सौ करोड़ रुपए देगी। यह बहुत बड़ी रकम होती है। वैसे नोबल जीतने वाले को 10 करोड़ रुपए नोबल कमेटी की ओर से मिलते है, इसलिए सौ करोड़ रुपये का ऐलान बड़ी बात है। 

सवाल है कि नोबल जीतना क्या कुश्ती का मेडल जीतने की तरह है कि पैसे का प्रलोभन लोगों को उस दिशा मे प्रेरित करेगा और वह जीत जाएगा? नोबल शारीरिक शक्ति की परीक्षा नहीं है और न किसी खास कौशल की परीक्षा है। नोबल जीतना जीवन भर के संचित श्रम प्राप्य होता है, मेधा की श्रेष्ठता का परिचायक होता है और विशिष्ट संज्ञानात्मक श्रेष्ठता से इसे हासिल किया जाता है। उसके लिए पैसा प्रेरक तत्व नहीं हो सकता है। इसलिए नायडू की मंशा भले अच्छी हो लेकिन तरीका ठीक नहीं है। इसकी बजाय अगर वे सौ या दो सौ करोड़ रुपये खर्च करके कोई अच्छा रिसर्च सेंटर स्थापित करे तो ज्यादा बेहतर होगा। उनको चाहिए कि वे क्वांटम कंप्यूटिंग में काम करने वाले आंध्र प्रदेश के युवाओं को दुनिया के हर कोने से खोज कर ले आएं और रिसर्च सेंटर में बहुत अच्छे वेतन और सुविधाओं के साथ काम करने की स्थितियां मुहैया कराएं तो एक नहीं कई नोबल आ सकते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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