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तिरछी नज़र: प्रदूषण के फ़ायदे

"यह जो प्रदूषण है ना, इसका देश की अर्थव्यवस्था में कितना सार्थक योगदान है, सोचो ज़रा…”
Poisonous
तस्वीर प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए। कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

 

गुप्ता जी मिल गए। नहीं, नहीं सुबह सवेरे सोसाइटी के पार्क में घूमते हुए नहीं, दोपहर को पार्क में धूप का मज़ा लेते हुए मिल गए। एक्यूआई अभी इतना कम नहीं हुआ है कि सुबह सुबह घूमने निकला जाये।

देखते ही बोले, "और डॉक्टर, तुम्हारा यह एक्यूआई कहाँ गया। बस अख़बार में एक संख्या बन कर रह गया है। कहीं कोई आंदोलन नहीं, कोई सुगबुगाहट तक नहीं। अब तो लोगों ने जिक्र तक करना बंद कर दिया है। सरकार जी को पता है, जनता कुछ नहीं कहेगी, कुछ नहीं करेगी। बस आदत डाल लेगी। ऐसा महंगाई में हुआ, भ्रष्टाचार में हुआ, बेरोजगारी में हुआ। और ऐसा ही अब प्रदूषण में भी होगा। लोग तब बोलेंगे, जब कुछ लोग मरेंगे"। 

"गंदे पानी के साथ तो हम जीना ही सीख गए हैं", गुप्ता ने आगे जोड़ा, "घर में फ़िल्टर का, आर ओ का पानी पीते हैं और घर से बाहर निकलते हैं तो फट से बोतल खरीद लेते हैं। और जो इतना भी नहीं कर सकते मर जाते हैं। गंदा पानी पी कर सबसे साफ शहर में लोग मर गए तो और शहरों का क्या हाल होता होगा? फिर उस पर प्रश्न पूछो तो हड़का दिये जाते हो"।

गुप्ता मुझे छेड़ रहा था कि मैं कुछ बोलूं या ख़ुद पर व्यंग्य कर रहा था या सरकार जी पर कुछ समझ नहीं आया। बस बोले जा रहा था। आज वो पक्ष और विपक्ष दोनों भूमिकाओं में दिखाई दे रहा था। 

"डॉक्टर, पिछली गर्मियों में मैं स्विट्ज़रलैंड गया। यूँ ही बस जरा घूमने", गुप्ता अपनी कहानी बताने लगा, "जा कर देखा कि कितना पिछड़ा देश है, कितने पिछड़े लोग हैं। जगह जगह पानी की टोंटी लगी हैं। जहाँ प्यास लगी, टोंटी से मुँह लगाया, पानी पी लिया। हमारे यहाँ तो गरीब से गरीब आदमी भी ऐसे पानी नहीं पीये। घर से बाहर निकले तो शुद्ध पानी की बोतल खरीद कर पीये। अब उसकी सहूलियत के लिए थैलियों में भी शुद्ध, साफ पानी मिलने लगा है"।

"यह जो प्रदूषण है ना, इसका देश की अर्थव्यवस्था में कितना सार्थक योगदान है, सोचो जरा। वाटर फ़िल्टर की, आर ओ की, बोतल वाले पानी की इंडस्ट्री जितनी बड़ी हमारे देश में है, कहीं और हो सकती है भला", गुप्ता जी ने आगे जोड़ा, "तुम तो डॉक्टर हो, तुम खुद बताओ, उलटी दस्त की जितनी दवाइयां, एंटरोक्यूनोल, मेट्रोनिड़ाजोल, हमारे देश में बनती हैं, बिकती हैं, विश्व में कहीं और बिकती हैं भला। इससे फार्मा इंडस्ट्री को कितना बूम मिलता है। हॉस्पिटल कितना चलते हैं। दवाइयों की बिक्री होती रहे, अस्पताल भरे रहें, इसके लिए प्रदूषण बहुत ही जरूरी है"।

"यही हाल वायु प्रदूषण का है", गुप्ता जी बोलते ही जा रहे थे, "अब देखो हमने भी दो एयर फ़िल्टर खरीद लिए हैं। एक पिछले साल लिया था, इस साल एक और ले लिया है। एक तो बैडरूम में रहता है, रात भर चलता है और दूसरा ड्राइंग डाइनिंग के लिए। दिन में वह चलता है। डॉक्टर, तुम भी एक तो खरीद ही लो। रात को बैडरूम में लगा कर सोओ। नींद भी चैन की आएगी और सुबह गले में खराश भी नहीं होगी। अब यह वायु प्रदूषण नहीं होता तो हम एयर फ़िल्टर खरीदते क्या? एयर फ़िल्टर बनते भी क्या? एयर फिल्टर की इंडस्ट्री भी होती भला। इस इंडस्ट्री को भी वायु प्रदूषण से और बूम मिलेगा"। 

"इंडस्ट्री के नाम से ध्यान आया डॉक्टर, हम लोग मिल कर एक फैक्ट्री खोल लेते हैं। बोतल बंद शुद्ध हवा की फैक्ट्री। 'डॉक्टर ब्रांड' बोतल बंद शुद्ध हवा। कश्मीर की वादियों से भरी गई शुद्ध शीतल वायु। वायु अच्छा रहेगा या पवन। एक बार चल गई तो वारे न्यारे हो जायेंगे। और चलेगी क्यों नहीं? बोतल बंद पानी चलेगा, ऐसा किसी ने सोचा था भला"।

"डॉक्टर, तुम खुद बताओ। पहले सर्दियों में अस्पताल खाली पड़े रहते थे। अब बेड नहीं मिलता है। सारे बेड सांस के, दमे के मरीजों से भरे रहते हैं। हार्ट अटैक भी बढ़ गए हैं। अब सर्दियों में जो मेडिकल बूम होता है, फार्मा कम्पनियों की सेल होती है ना, वह एयर पोल्युशन से ही होती है। यह जो पोल्युशन है, जीडीपी बढाने का एक साधन है"।

गुप्ता रुक ही नहीं रहा था तो मैंने उसे रोक कर कहा, "गुप्ता, इस प्रदूषण से सिर्फ जीडीपी ही नहीं बढ़ती है, इसके और भी लाभ हैं। इस प्रदूषण से हमारी प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है। जल प्रदूषण हमारे पेट पर आक्रमण करता है तो हम बीमार पड़ते हैं। उल्टी दस्त होते हैं। एक बार बीमार पड़ते हैं, दूसरी बार बीमार पड़ते हैं। बार बार बीमार पड़ते हैं तो हमारी बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इससे हमारी आंते और लीवर मज़बूत बनती हैं। और इसी तरह से वायु प्रदूषण से दिल और फेफड़े मज़बूत बनते हैं"।

"गुप्ता, तुमने डार्विन की थ्योरी पढ़ी ही होगी ना। अगर पढ़ी है तो समझ सकते हो हमारे देश पर यह पूरी तरह लागू है। जो फिट नहीं है, वह जल प्रदूषण से, वायु प्रदूषण से बच नहीं पाएगा, खत्म हो जायेगा और जो फिट है, आगे जायेगा। इसे ही सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट कहते हैं, क्यों गुप्ता समझे कुछ। और हाँ, देख लेना, कुछ पीड़ियों बाद हम इवोल्व भी हो जायेंगे। हमारा इवोलुशन हो जायेगा। होमो सपियन्स की नई नस्ल पैदा होगी, मज़बूत दिल, फेफड़े, लीवर और आंतों के साथ। और वह भारत में ही पैदा होगी। इस बढ़े हुए प्रदूषण के कारण ही पैदा होगी। यही है डार्विन की थ्योरी ऑफ़ इवोलुश। जिसे हमने स्कूल सिलेबस से तो हटा दिया है पर जी जरूर रहे हैं"। यह कहते हुए मैं गुप्ता को भौच्चका छोड़ चला आया।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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