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फ़ासीवाद पर परिचर्चा: हिटलर का भूत हिंदुस्तान में समा गया है?

फ़ासीवाद की पराजय के 80 साल पूरे होने पर अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन और भारतीय सांस्कृतिक सहयोग और मैत्री संघ के संयुक्त तत्वाधान में परिचर्चा।
Discussion on Fascism

पटना। फासीवाद की पराजय के अस्सी साल पूरे होने पर  अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन ( ऐप्सो ) और भारतीय सांस्कृतिक सहयोग और मैत्री संघ ( इसकफ)  के संयुक्त तत्वाधान में  परिचर्चा का आयोजन मैत्री शांति भवन में किया गया। विषय था ' फासीवाद की पराजय : सबक और कार्यभार "। 

इस मौके पर पटना शहर के बुद्धिजीवी , साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। पूरे कार्यक्रम का संचालन शिक्षाविद रौशन प्रकाश ने किया। 

प्रारम्भिक वक्तव्य देते हुए इसकफ के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय ने कहा "पूंजीवाद का विकृत रूप फासीवाद है। वह संसद को, संविधान को लोकतांत्रिक अधिकारों सबको नष्ट कर देता है । हिटलर घृणा फैलाता था। एक नस्ल की सर्वोच्चता की बात किया करता था। रेडियो से अपना भाषण प्रसारित करता था। ट्रेड यूनियन आंदोलन से, कम्युनिस्टों से नफरत करता था। अति महत्वाकांक्षा के कारण पूरी दुनिया के साथ साथ जर्मनी को बर्बाद कर डाला। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद फासीवाद का उभार हुआ। हमें देखना है कि क्या भारत में भी वैसी ही परिस्थितियां तो नहीं कायम हो गई है? हमें देखना है कि कहीं हिटलर का भूत हिंदुस्तान के अंदर तो नहीं आकर समा गया है? फासिस्ट किसी एक धर्म को अपने देश के अंदर का दुश्मन बनाता है।"

ऐप्सो के राज्य महासचिव अनीश अंकुर ने बताया " फासीवाद की हार में सबसे बड़ी भूमिका सोवियत संघ और चीन ने निभाई। यदि आज से अस्सी वर्ष पूर्व जर्मनी, जापान और इटली के फासीवादी गठजोड़ की पराजय हुई तो इसके पीछे सोवियत संघ के दो करोड़ सत्तर लाख और चीन के दो करोड़ चालीस लाख मारे गए। जिन लोगों के पास कुछ नहीं था उनलोगों ने सबसे ज्यादा फासीवाद का कहर झेला। द्वितीय विश्वयुद्ध में लगभग साढ़े आठ करोड़ लोग मारे गए जिसमें से 73 प्रतिशत अकेले रूस चीन और एशिया-अफ्रीका के लोगों को शहादत देनी पड़ी थी। इंग्लैंड - अमेरिका के सिर्फ 1 प्रतिशत नुकसान हुआ था। लेकिन आज इतिहास से रूस और चीन के अकल्पनीय शहादत को मिटाया जा रहा है।"

एस.यू.सी.आई के राजकुमार चौधरी के अनुसार " जब पूंजीवाद पूरी तरह प्रतिक्रियावादी और प्रतिक्रांतिकारी हो जाता है, जिन मूल्यों का उसने सृजन किया हुआ था उसे ही खत्म कर देना चाहता है तब उसी अवस्था में फासीवाद का जन्म होता है। पूंजीवाद अब मरणासन्न अवस्था में आ गया है। उसका एक दिन भी रहना समाज के लिए खतरनाक है । फासीवाद कोई व्यक्ति, कोई पार्टी भी फासीवाद नहीं लाता है। सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के संकट के कारण फासीवाद लाता है। जब तक पूंजीवाद बरकरार रहेगा तब तक फासीवाद भी रहेगा। इसके लिए व्यापक मोर्चा बनाकर लड़ना पड़ेगा। "  

पटना विश्विद्यालय में लोक प्रशासन के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रो सुधीर कुमार ने कहा " फासीवाद के अंदर तर्क शक्तियों को कमजोर किया जाता है। सब अधिकार हमारे हाथ में नियंत्रित हो। ऐसा कोशिश किया जाता है। लोकतंत्र के अंदर काम करना होगा। हमें भारत के अंदर भी काम करना होगा। यह लोगों की भावनाओं को जगाकर काम करता है। यह समाज के अन्दर वर्चस्व कायम करने के लिए काम करता है। मुसोलिनी कहा करता था सब कुछ देश है।" 

सामाजिक कार्यकर्ता विजयकांत सिन्हा  ने अपने संबोधन में कहा "फासीवाद घोर जनतंत्र विरोधी होता है। यदि आप पब्लिकली उसके खिलाफ बोलते हैं तो पुलिस या एजेंसी आपके दरवाजे पर चली आती है। 

फ़ासिज़्म के खिलाफ लड़ाई के मोर्चा 'दिशा छात्र संगठन' के अजीत ने दिल्ली-नोएडा में मजदूरों के आंदोलन के बारे में  बताया। उन्होंने कहा कि फासीवाद का मुकाबला भारत के पचपन करोड़ मजदूर ही करेगा।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए भाकपा नेता रामलाला सिंह ने कहा  "1917 की सोवियत  क्रांति ने इतिहास बदल डाला। यदि सोवियत संघ ने फासीवाद को नहीं हराया होता तो सौ से अधिक देश आजाद नहीं होती। ट्रेड यूनियन और किसान जो भी प्रगतिशील विचारधारा के साथ है वे सभी एकजुट हैं और यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। अभी जो मजदूरों का आंदोलन हुआ उसने पूरे देश को अपने चपेट में ले लिया है उससे हमें प्रेरणा लेना है। फासीवादी विचार ने विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका सब कर कब्जा के लिया है। "

सभा को फॉरवर्ड ब्लॉक के अनिल शर्मा, पटना जिला किसान सभा के गोपाल शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता प्रति सिंह ने भी संबोधित किया।

सभा में मौजूद प्रमुख लोगों में थे  इसकफ के जिला सचिव विनय लाल, आनंद शर्मा, रवि आनंद, कवि चंद्रबिंद सिंह, फिल्मकार जितेंद्रनाथ जीतू, सबीना, अनिल रजक, विजयकांत सिन्हा, विपिन, फॉरवर्ड ब्लॉक के अनिल शर्मा, उत्कर्ष  आनंद , अभिषेक भोजपुरी, कुमार सर्वेश, सबीना, सचिन, रोहित शर्मा, गोपाल शर्मा,  मृगांक, रवि, अभिषेक आदि ।

(लेखक संस्कृतिकर्मी हैं।)

 

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