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नव-फ़ासीवाद का उभार, बीजेपी और शिक्षा

भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार का ध्यान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के जनतांत्रीकरण (Democratization) पर न होकर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विनाश पर है।
JNU PROTEST
तस्वीर प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए।

बहुत से विचारवान लोग यह मानते हैं कि निरुपनिवेशीकरण (Decolonization) के बाद भी लंबे अर्से तक भारत के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में एक छोटे से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके का जो बोलबाला बना रहा था, वह उस देसी भाषा-भाषी नवोदित अभिजात तबके का शत्रुभाव भड़कने का एक महत्वपूर्ण कारण है, जो बहिष्कृत महसूस करता रहा था और इसलिए भारतीय जनता पार्टी की ओर खिंच गया है। दूसरे शब्दों में यह कि भाजपा अन्य चीजों के अलावा देश के मामलों में छोटे से अंग्रेजीभाषी अभिजात वर्ग के बोलबाले के खिलाफ एक प्रकार के विद्रोह को प्रदर्शित करती है। इसमें सच्चाई का कुछ अंश हो भी सकता है और बहस के लिए हम फिलहाल यह माने लेते हैं कि यह नजरिया सही है।

लेकिन, इसका अर्थ तो यह है कि उन्हें शिक्षा के जनतांत्रीकरण (Democratization) के जरिए और खासतौर पर उच्च शिक्षा के जनतांत्रीकरण के जरिए, इस छोटे से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके के बोलबाले को तोड़ने का प्रयास करते रहा होना चाहिए, जिससे समय गुजरने के साथ गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा इतने सारे लोगों को उपलब्ध हो जाती कि जो विशेषाधिकार अब तक छोटे से अभिजात वर्ग को मिल रहे थे, वे विलुप्त ही हो जाते। किसी को भी लगेगा कि भाजपा जो बहुतेरों के बहिष्करण के इस एहसास भुनाती आयी है, गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा का जनतांत्रीकरण कर रही होगी और उसे अब तक उच्च शिक्षा से बहिष्कृत छात्रों के निरंतर बढ़ते वृत्त की पहुंच में ला रही होगी और मुट्ठीभर  प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थाओं की इजारेदारी (एकाधिकार) को तोड़ रही होगी, जो संस्थाएं अपने यहां शिक्षितों की संतानों को विशेषाधिकारपूर्ण पहुंच मुहैया कराने के जरिए, एक छोटे से अभिजात तबके के खुद को संरक्षित रखने की प्रक्रिया में औजारों का काम करती हैं। ठीक इसी के लिए वह कहीं बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थाएं शुरू कर रही होगी।

बहरहाल, भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार, ठीक यही तो नहीं कर रही है। उसका ध्यान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के जनतांत्रीकरण (Democratization) पर न होकर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विनाश पर है। 

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसी जो चंद गुणवत्तापूर्ण ऐसी सार्वजनिक संस्थाएं हैं, जो अपनी समावेशी दाखिला नीति के चलते, अभिजात तबके के बच्चों से कहीं ज्यादा, आबादी के वृहत्तर हिस्से के बच्चों को शिक्षित करती आ रही थीं, लेकिन उन्हें तो व्यवस्थित तरीके से नष्ट ही करने की कोशिशें की जाती रही हैं। 

उच्च शिक्षा के जनतांत्रीकरण के उक्त एजेंडा के तकाजों को पूरा करने के लिए, शिक्षा पर बहुत बढ़ी हुई मात्रा में खर्च करने के बजाए, यह सरकार तो अपने शिक्षा बजट में भारी कटौतियां ही करती आयी है। इसका लक्ष्य तो उच्च शिक्षा का निजीकरण करना ही रहा है और यह उच्च शिक्षा को इतना महंगा बना देता है कि गैर-अभिजात पृष्ठभूमि के बच्चों की हैसियत ही नहीं होती है कि इन नयी निजी उच्च शिक्षा संस्थाओं में पांव रख सकें। जहां पहले चंद प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान थे जो अभिजात तबका पैदा करते थे, उनकी जगह अब कुछ और प्रतिष्ठित संस्थान स्थापित हो गए हैं और ये संस्थान भी अभिजात तबके को ही पैदा करने में लगे हुए हैं, हालांकि जरा भिन्न किस्म के अभिजात तबके को और काफी सचेत रूप से ऐसा करने का लक्ष्य बनाकर यह कर रहे हैं। बहिष्करण की वह प्रक्रिया, जिसके विरोध ने भाजपा को कथित रूप से बहुतों के लिए आकर्षक बनाया था, और भी जोर-शोर से जारी है। वास्तव में आज तो यह प्रक्रिया, आजादी के फौरन बाद के वर्षों में जिस गति से जारी थी, उससे भी तेज गति से जारी है।

सार्वजनिक शिक्षा की बर्बादी और शिक्षा का ही विनाश

जहां शिक्षा के जनतांत्रीकरण के एजेंडा को इस तरह धता बता दी गयी है, वहीं सार्वजनिक शिक्षा संस्थाओं को पैसे के लिए तरसाया जा रहा है (जिसमें वर्षों तक उन्हें बहुत ही अपर्याप्त स्टाफ से काम चलाने पर मजबूर करना शामिल है, जिसके जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वहां कोई खास पढ़ना-पढ़ाना ही नहीं हो), शिक्षकों को अपने विषयों में उनकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि हिंदुत्व के एजेंडा के प्रति उनकी घोषित वफादारी के आधार पर भर्ती किया जा रहा है और बिना किसी अकादमिक औचित्य के पाठ्यक्रम से विषय के बड़े-बड़े हिस्सों को हटाया जा रहा है (जैसे अनेक स्कूलों में इतिहास की पढ़ाई में से मुगल काल का हटाया जाना)। यह सब यही सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक शिक्षा संस्थाओं का अकादमिक स्तर बहुत ही नीचे चला जाए। चूंकि निजी शिक्षा संस्थाओं का ध्यान और इसमें ऐसी सबसे प्रतिष्ठित तथा सबसे महंगी शिक्षा संस्थाएं भी शामिल हैं, मुख्यत: रोजगार के बाजार की जरूरतें पूरी करने पर केंद्रित रहता है, न कि छात्रों को आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य के साथ ज्ञान देने पर, व्यावहारिक रूप से हो यह रहा है कि आलोचनात्मक चिंतन को ही नष्ट किया जा रहा है और इसका अर्थ होता है, बुनियादी तौर पर शिक्षा का ही विनाश।

अब सवाल यह है कि एक ऐसी सरकार, जो छोटे से अंग्रेंजी बोलेने वाले अभिजात वर्ग के विरोध की कसमें खाती है और इस तरह के विरोध के आधार पर हमदर्दी हासिल करती है, शिक्षा का जनतांत्रीकरण करने के बजाए उसका विनाश ही करने में क्यों लगी हुई है? 

इस सवाल का जवाब हमें नव-फासीवाद की एक बुनियादी विशेषता में मिलेगा। और वह विशेषता यह है कि नव-फासीवाद अक्सर विशेषाधिकारों का विरोध करने के नाम पर लोगों को लुभाता जरूर है, लेकिन यह अमल में समाज के सबसे विशेषाधिकार -प्राप्त समूह, इजारेदार पूंजीपतियों के ही एजेंडा को लागू करता है। दूसरे शब्दों में फासीवाद और नव-फासीवाद की इमारत, एक बुनियादी छल पर ही खड़ी की जाती है।

फ़ासीवाद और नव-फ़ासीवाद के चरित्र में ही है छल

मिसाल के तौर पर 1930 के दशक का जर्मन फासीवाद खुद को ‘‘नेशनल सोशलिज्म’’ बताता था। वह बड़ी पूंजी के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करता था, जबकि चोरी-छिपे उसके साथ रिश्ते बनाए हुए था। और जब वह सत्ता में आ गया और उसने बड़ी पूंजी के साथ खुल्लमखुल्ला रिश्ते कायम कर लिए, उसने अपने उन अनुयाइयों का सफाया ही कर दिया, जो उसकी पहले वाली लफ्फाजी में आ गए थे और उसके पहले वाले दावों से ही चिपके रहे थे। खून-खराबे भरे सफाए में उनका खात्मा ही कर दिया गया, जिसे इतिहास में ‘लंबे चाकुओं वाली रात’ के नाम से दर्ज किया गया था।

इसी तरह की बेईमानी, आज हमारे यहां शिक्षा के क्षेत्र में चल रही है। नव-फासीवादी तत्वों का प्रभाव, उनके इस अंतर्निति वादे से आता है वे शिक्षा के जनतांत्रीकरण के एजेंडा को लागू करेंगे। लेकिन, इजारेदार पूंजी शिक्षा के विनाश का तकाजा करती है। इसलिए, उनका असली एजेंडा शिक्षा का विनाश करना हो जाता है। लेकिन, इससे आगे यह सवाल उठता है कि इजारेदार पूंजी को शिक्षा का विनाश क्यों चाहिए? और किस अर्थ में आज शिक्षा को नष्ट किया जा रहा है।

इजारेदार पूंजी का शिक्षा के विनाश का एजेंडा

शिक्षा के इस तरह के विनाश का अर्थ इस प्रकार है। तकनीकी ज्ञान तथा कौशल का तो जोर-शोर से प्रसार किया जा रहा है। लेकिन, समाज के संबंध में तमाम ज्ञान से या यथास्थिति की अनालोचनात्मक सराहना को छोड़कर और किसी भी रूप में समाज की गतिकी पर हरेक सोच-विचार से, पूरी तरह से परहेज किया जाता है। वर्तमान की किसी भी आलोचनात्मक पड़ताल के साथ तो बहुत ही हिकारत के साथ पेश आया जाता है।

इजारेदार पूंजी को कुशल मजदूरों की जरूरत होती है और इन्हें इन नयी उभरती हुई निजी संस्थाओं से पैदा करने की अपेक्षा की जाती है और वे पैदा करती भी हैं। लेकिन, समाज के किसी भी अध्ययन को, जो अनिवार्यत: आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य से करना होता है, इजारेदार पूंजी खतरनाक मानती है और इस तरह के अध्ययन को पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिया जाता है। 

जाने-माने मार्क्सवादी अर्थशास्त्री, पॉल बरान ने एक मौके पर ‘‘बुद्धिजीवियों’’ और ‘‘बौद्धिक कार्मिकों’’ के बीच अंतर किया था। हम अपने तर्क को इस अंतर के माध्यम से रख सकते हैं। इजारेदार पूंजी के वर्चस्व के दौर में उच्च शिक्षा संस्थाएं, बजाए ‘‘बुद्धिजीवी’’ पैदा करने के, जो जनता के हितों की सेवा करें और उसे अपनी स्वतंत्रता हासिल करने के रास्ते पर आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएं, ‘‘बौद्धिक कार्मिक’’ पैदा करती हैं, जो इजारेदार पूंजी की (और बहुराष्ट्रीय निगमों की, जिनके साथ घरेलू इजारेदार पूंजी गठबंधन करती है) सेवा करती हैं।

इस अंतर में, आलोचनात्मक चिंतन के आचार का केंद्रीय महत्व है। इजारेदार पूंजी के दौर में शिक्षा संस्थाओं का लक्ष्य, आलोचनात्मक चिंतन का विनाश करना है और चूंकि आलोचनात्मक चिंतन ही शिक्षा का सार है, उसके विनाश का अर्थ, शिक्षा का ही विनाश हो जाता है।

निजीकरण और शिक्षा की प्रकृति में बदलाव

भारत में शिक्षा के विनाश की प्रक्रिया बाकायदगी से नव-उदारवादी नीतियों के अपनाए जाने के साथ शुरू हुई थी। शिक्षा का विनाश वास्तव में नव-उदारवादी एजेंडा में केंद्रीय स्थान रखता है। यह एजेंडा देश से इसका तकाजा करता है कि स्वास्थ्य रक्षा तथा शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं का निजीकरण किया जाए। शिक्षा के निजीकरण का अर्थ इतना भर नहीं होता है कि शिक्षा नाम की जो ‘‘वस्तु’’ पहले सरकार मुहैया कराती थी, उसे अब निजी क्षेत्र द्वारा मुहैया कराया जा रहा होता है। इसका अर्थ है, जो मुहैया कराया जाता है, उसकी प्रकृति का ही बदल दिया जाना। निजी दातव्य संस्थाओं को छोड़कर, जिस तरह की संस्थाएं भारत में ऐतिहासिक रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काफी रही हैं, शिक्षा के निजीकरण का बुनियादी तौर पर अर्थ होता है, शिक्षा का एक ‘‘माल’’ के रूप में पैदा किया जाना, जिससे मुनाफा कमाया जा सके। बेशक, इस मुनाफे का उसी संस्था में पुनर्निवेश भी हो रहा हो सकता है, लेकिन इससे इन संस्थाओं का चरित्र नहीं बदलता है और इनका चरित्र एक माल बेचने वाली, मुनाफा कमाने वाली संस्थाओं का ही रहता है। शिक्षा के माल बनाए जाने का अर्थ है, शिक्षा व्यवस्था के उत्पाद का ही माल बना दिया जाना। इसलिए, इस शिक्षा व्यवस्था से जो उत्पाद निकलकर आते हैं, उन्होंने जो ज्ञान हासिल किया होता है उससे जनता की सेवा करने की कोशिश करने के बजाए वे ऐसे आत्मकेंद्रित, अपने स्वार्थों की ही चिंता करने वाले, ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं तथा बनने के लिए प्रशिक्षित किए जाते हैं, जो अपना कौशल सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेचते हैं। इस तरह, शिक्षा की प्रकृति में ही एक बुनियादी बदलाव आ जाता है, जिसमें इसकी सचेत कोशिश की जाती है कि हर प्रकार के आलोचनात्मक चिंतन को शिक्षा के क्षेत्र से गायब ही कर दिया जाए।

नव-फासीवाद इसे आगे ले जाता है। यही वह हश्र है जिस पर नव-उदारवाद अंतत: पहुंचता है। चूंकि नव-उदारवादी निजाम की चारित्रिक विशेषता है, आय तथा संपदा की असमानता की खाई का बहुत चौड़ा हो जाना और चूंकि अमीर, मेहनतकश जनता की तुलना में, अपनी आय के अपेक्षाकृत छोटे हिस्से का ही उपभोग करते हैं, नव-उदारवादी पूंजीवाद अपरिहार्य रूप से अर्थव्यवस्था में अधि-उत्पादन की प्रवृत्ति पैदा करता है और इसकी अभिव्यक्ति आर्थिक गतिरोध और बेरोजगारी के बढ़े हुए स्तर में होती है। ठीक यही परिस्थिति संयोग है, जहां इजारेदार पूंजी को नव-फासीवाद के साथ गठजोड़ करने की जरूरत होती है, ताकि  अपने वर्चस्व को सहारा दे सके और इस तरह नव-फासीवाद को उभार हासिल होता है।

नव-फ़ासीवाद में जुर्म हुआ आलोचनात्मक चिंतन

शिक्षा के विनाश को, जिसकी बाकायदगी से शुरूआत नव-उदारवाद ने की थी, नव-फासीवाद बहुत आगे ले जाता है। नव-उदारवाद, सार्वजनिक शिक्षा संस्थाओं को फंड के लिए तरसाने के जरिए, इन संस्थाओं का गला घोंटने का जो प्रयास करता है, उसे अब छात्रों के दिमाग में हिंदुत्व के कंकड़ बैठाने के जरिए आगे बढ़ाया जाता है। इसके लिए आलोचनात्मक चिंतन को, जुर्म तक बना दिया जाता है। वास्तव में आलोचनात्मक चिंतन को, सिर्फ सार्वजनिक संस्थाओं में ही अपराध बनाने की कोशिश नहीं की जाती है बल्कि निजी संस्थाओं में भी अगर संयोग से अप्रत्याशित रूप से वह अपना सिर उठाता है, तो जुर्म बनाकर कुचल दिया जाता है।

नव-फासीवाद का दोमुंहापन इस तथ्य में निहित है कि वह पुराने अंग्रेजी-भाषी अभिजन के खिलाफ गर्जन-तर्जन तो बहुत करता है, लेकिन वह ऐसे अभिजन के बोलबाले का खत्म नहीं करना चाहता है। इसके बजाय वह तो इस तरह के बोलबाले को एक वैकल्पिक अनालोचनात्मक तथा विचारहीन अंग्रेजी-भाषी अभिजन के बोलबाले से प्रतिस्थापित करने की ही कोशिश करता है।  

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित यह आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें—

Neo-Fascism’s Rise and Dismantling of Education

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