नोएडा में पुलिस पहरे के बीच मनाया गया मई दिवस
नई दिल्ली/नोएडा: अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर गौतम बुद्ध नगर ख़ासकर नोएडा के औद्योगिक इलाकों में इस बार मई दिवस सिर्फ एक औपचारिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह श्रमिक अधिकारों, राज्य दमन और उभरते वर्ग-संघर्ष के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक घटना के रूप में सामने आया। भारी पुलिस बंदोबस्त, निगरानी और प्रशासनिक सख्ती के बीच मजदूरों ने न केवल मई दिवस मनाया, बल्कि अपने अधिकारों और एकजुटता का स्पष्ट संदेश भी दिया।
सुबह से ही नोएडा, ग्रेटर नोएडा और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में पुलिस की असामान्य तैनाती देखी गई। कई फैक्ट्रियों के बाहर पुलिस बल तैनात था, ताकि मजदूर इकट्ठा न हो सकें और किसी तरह का सामूहिक कार्यक्रम आयोजित न किया जा सके। मजदूर नेताओं के अनुसार, कई जगहों पर उन्हें नजरबंद किया गया, बैनर और पोस्टर लगाने से रोका गया और यहां तक कि नारे लगाने पर भी पाबंदी लगाने की कोशिश की गई। प्रशासन की यह रणनीति साफ़ तौर पर इस उद्देश्य से जुड़ी दिखी कि मई दिवस जैसे प्रतीकात्मक और राजनीतिक महत्व के दिन मजदूरों की एकजुटता सार्वजनिक रूप से सामने न आ सके।
लेकिन इन तमाम बाधाओं के बावजूद, मजदूर पीछे नहीं हटे। ग्रेटर नोएडा स्थित अनमोल इंडस्ट्रीज़ समेत कई स्थानों पर सीटू (CITU) से जुड़े कार्यकर्ताओं और स्थानीय मजदूरों ने इकट्ठा होकर झंडारोहण किया और सभाएं आयोजित कीं। लाल झंडे के नीचे जुटे मजदूरों ने यह साफ़ किया कि दमन और डर का माहौल उनकी आवाज़ को दबा नहीं सकता।

यह पूरा घटनाक्रम हाल के उस व्यापक मजदूर आंदोलन की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जिसने 9 अप्रैल से नोएडा में जोर पकड़ा था। हजारों की संख्या में मजदूर सड़कों पर उतरे थे, जिनकी मुख्य मांगें थीं न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी, काम के घंटे आठ करना, ओवरटाइम का उचित भुगतान और बुनियादी श्रम अधिकारों की गारंटी। मजदूरों का कहना था कि 11 हज़ार से 13 हज़ार रुपये के बीच का वेतन मौजूदा महंगाई के दौर में जीवन-यापन के लिए बेहद अपर्याप्त है।
इस आंदोलन ने प्रशासन और उद्योग जगत दोनों को असहज कर दिया। 13 अप्रैल को हुई हिंसा के बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। इसके बाद पूरे क्षेत्र में पुलिसिया कार्रवाई तेज कर दी गई कई मजदूरों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया, लगातार छापेमारी हुई और औद्योगिक क्षेत्रों में एक तरह का “सुरक्षा घेरा” बना दिया गया। मजदूर संगठनों का आरोप है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य सिर्फ कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि मजदूर आंदोलन को दबाना था।
मई दिवस के दिन भी इसी दमनात्मक माहौल की झलक देखने को मिली। हालांकि प्रशासन की कोशिश थी कि मजदूर एकजुट न हो सकें, लेकिन कई स्थानों पर छोटे-छोटे समूहों में मजदूरों ने कार्यक्रम आयोजित किए। यह एक तरह का प्रतीकात्मक प्रतिरोध था एक ऐसा संदेश कि मजदूर अपने ऐतिहासिक अधिकारों और परंपराओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।
सीटू के दिल्ली-एनसीआर उपाध्यक्ष गंगेश्वर दत्त शर्मा की पुलिस अधिकारियों से उस समय तीखी नोकझोंक हो गई, जब पुलिस ने उन्हें और उनके साथियों को मई दिवस पर झंडा फहराने और सभा करने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह लोकतंत्र है पुलिस चाहे तो लाठी-गोली चला दे, लेकिन वे मई दिवस जरूर मनाएंगे।
उन्होंने कहा, “पूरे इलाके में डर और आतंक का माहौल बनाया जा रहा है। पुलिस और प्रशासन मजदूरों के असली मुद्दों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दमन के जरिए औद्योगिक शांति स्थापित नहीं हो सकती। शांति तभी आएगी, जब मजदूरों को उनके अधिकार मिलेंगे और शोषण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी।”
उन्होंने यह भी कहा कि आज भी मजदूरों को ओवरटाइम का भुगतान नहीं मिलता, उन्हें साप्ताहिक अवकाश और बोनस जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उन्होंने जोड़ते हुए कहा, “मई दिवस जैसे महत्वपूर्ण दिन को भी रोकने की कोशिश की गई, जो पूरी तरह गलत है।”

गौतम बुद्ध नगर में सीटू के जिलाध्यक्ष मुकेश ने न्यूनतम वेतन में क्षेत्रीय असमानता को बड़ा मुद्दा बताया। वो कहते है “दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा तीनों जगहों पर अलग-अलग वेतन है, जबकि जीवन-यापन की लागत लगभग समान है। इससे मजदूरों में भारी असंतोष है। हाल में की गई वेतन वृद्धि भी बहुत कम है और वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं करती।”
मुकेश ने आरोप लगाया कि फैक्ट्रियों में मजदूरों से 10-12 घंटे काम लिया जाता है, लेकिन ओवरटाइम का भुगतान नहीं किया जाता। वो कहते है “पुलिस द्वारा फैक्ट्री गेट पर जाकर मजदूरों को डराना-धमकाना और झूठे केस लगाना बेहद चिंताजनक है।”
सीटू की राष्ट्रीय सचिव ए.आर. सिंधु ने मई दिवस के ऐतिहासिक संदर्भ को जोड़ते हुए कहा कि 140 साल पहले मजदूरों ने 8 घंटे काम के अधिकार के लिए संघर्ष किया था, लेकिन आज भी वही मांगें दोहरानी पड़ रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी “यह दिखाता है कि श्रम अधिकारों की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अगर श्रम कानूनों को और कमजोर किया गया, तो मजदूरों की स्थिति और खराब होगी।”
किसान सभा के जिला सचिव रूपेश वर्मा ने मजदूर-किसान एकता पर जोर देते हुए कहा, “मई दिवस सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि संघर्ष की विरासत है। पुलिस द्वारा इसे रोकने की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन मजदूरों ने यह दिखा दिया कि वे अपने अधिकारों के लिए पीछे नहीं हटेंगे।”
मजदूर संगठनों का आरोप है कि उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन उद्योगपतियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनके मुनाफे की रक्षा के लिए राज्य पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उनके मुताबिक, हालिया मजदूर उभार ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा की चमकदार औद्योगिक छवि के पीछे छिपे शोषण को उजागर कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का औद्योगिक विकास मॉडल श्रमिक अधिकारों की कीमत पर आगे बढ़ रहा है। एक ओर सरकारें निवेश और विकास की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर मजदूर अपने बुनियादी अधिकारों सम्मानजनक वेतन, सुरक्षित काम के हालात और सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मई दिवस 2026 का नोएडा का यह दृश्य इसी विरोधाभास का प्रतीक बनकर उभरा है। दमन, निगरानी और पाबंदियों के बावजूद मजदूरों ने यह साफ़ कर दिया है कि उनका संघर्ष जारी रहेगा।
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