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तिरछी नज़र: एक फ़रवरी का "कल्याणकारी बजट"

बजट आ गया और हमें समझ आ गया कि इसमें हमारे समझने लायक कुछ है नहीं। पहले बजट जनता को भी समझ में आता था पर अब तो अर्थशास्त्रियों को भी समझ नहीं आता है।
BUDGET CARTOON
तस्वीर प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए। कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

मैं जब रविवार एक फ़रवरी को सुबह सुबह लिखने बैठा तो बादल गरज रहे थे, बिजली कड़क रही थी और बारिश हो रही थी। मैं लिखने के लिए टॉपिक सोच ही रहा था कि पत्नी सुबह की चाय के साथ पकोड़े भी रख गईं। वही पकोड़े जिन्हें तलना सरकार जी रोजगार बता चुके हैं। 

मैं पकोड़े खा रहा था और सोच रहा था कि कोई पकोड़े की ठेली वाला तो इस मौसम में घर पर ही बैठा होगा। एक तो कड़ाके की ठंड और ऊपर से ऐसा मौसम। घर से निकलें तो निकलें कैसे। और निकल भी जाये तो उसकी ठेली का चूल्हा कैसे जलेगा, उसकी कढ़ाई कैसे चढ़ेगी। और अगर ठेली का चूल्हा नहीं जलेगा तो घर का चूल्हा भी ठंडा ही रहेगा।

इस पकोड़े तलने के रोजगार को सरकार जी ने रोजगार तो डिक्लेअर कर ही दिया है पर मैं सोचता हूं पकोड़े तलने और इस तरह के अन्य कामों को राष्ट्रीय रोजगार डिक्लेअर कर देना चाहिए। जब मैं पकोड़े तलने वालों, चाय बनाने वालों, मटर कुलचे बेचने वालों, राजमा चावल और कढ़ी चावल बेचने वालों की संख्या देखता हुँ तो सचमुच में आश्चर्य होता है कि इतने सारे लोग इस तरह के रोजगार में लगे हुए हैं।

एक फ़रवरी का दिन बजट का दिन भी होता है। इस दिन केंद्र सरकार अपना वार्षिक बजट पेश करती है। बताती है कि पैसा कहाँ से आएगा और कहाँ जायेगा। वैसे सब को पता है, पहले से ही पता है, सरकार न बताए तो भी पता है कि पैसा जनता की जेब से आएगा और नेताओं, ठेकेदारों, अफसरों और ‘परम मित्रों’ की जेब में जायेगा। बस हर बार यह फिगर, पैसे की संख्या अलग होती है। हर बार पिछली बार से अधिक पैसे का लेनदेन होता है। बजट में तो बस वह संख्या बताई जाती है।

और हाँ, बजट में यह भी बताया जाता है कि किस किस विभाग के लोगों को मिल बाँटने, खाने पीने के लिए ज्यादा पैसा मिलेगा। हर बार की तरह इस बार भी रक्षा बजट का अधिक 'कल्याण' हुआ। यह अच्छा ही किया। जब चारों ओर दुश्मनों से घिरे बैठे हों तो हथियार खरीदने ही पड़ते हैं। हमने पड़ोसियों से इतनी दुश्मनी पहले कभी नहीं पाली थी जितनी आज पाली हुई है। वैसे सरकार मानती है कि लड़ाई के लिए हथियार आधुनिक और टिकाऊ जरूरी हैं। सैनिक तो सिर्फ चार साल के लिए भी भर्ती किए जा सकते हैं।

'कल्याण' तो एक्सप्रेस वे का भी हो रहा है। अधिक से अधिक संख्या में बनते जा रहे हैं। इनको बनाने में पैसा अधिक खर्च होता है तो जाहिर है खाया भी अधिक जाता है। नेताओं, ठेकेदारों, अफसरों का अधिक कल्याण होता है और जनता भी ख़ुश हो जाती है। जिस सड़क पर रोज चलना है, साईकिल और स्कूटी चलानी है, वह टूटी फूटी पड़ी रहे, उसमें सेकड़ों गड्ढे हों पर जिस पर से दो चार साल में एक बार गुजरें, भारी भरकम टोल दे कर गुजरें, वे सड़कें खूब चौड़ी, गड्ढा मुक्त होनी चाहिएं। सरकार जी यह सोचते हैं और हम भी इसी में अपना कल्याण मानते हैं।

लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी कल्याणकारी चीजों का 'कल्याण' नहीं हुआ। क्यों भई, सरकार ही सब कुछ करे। सरकार जी ही सबका 'कल्याण' करें। पढ़ कर के कौन सा तीर मार लोगे, कौन सा पहाड़ तोड़ लोगे। और वैसे भी तीर मारने के लिए, पहाड़ तोड़ने के लिए पढ़ाई कौन सा जरूरी है। बिल गेट्स कोई खास पढ़ा लिखा नहीं है और ना ही एलेन मस्क। और दूर क्यों जाना। सरकार जी ही कौन सा पढ़े हैं। जीवन में उन्नति के लिए पढ़ाई कोई जरूरी नहीं है। सरकार ऐसा मानती है। जो ऐसा नहीं मानते हैं वे अपनी पढ़ाई पर स्वयं खर्च कर लें। कुछ ऐसा ही स्वास्थ्य के बारे में भी है। 

खैर बजट आ गया और हमें समझ आ गया कि इसमें हमारे समझने लायक कुछ है नहीं। पहले बजट जनता को भी समझ में आता था पर अब तो अर्थशास्त्रियों को भी समझ नहीं आता है। बजट भाषण अब भारी भरकम शब्दों का पिटारा बन गया है। साथ ही बड़ी बड़ी संख्याओं का भी। अब देखो इस बार का बजट पचास लाख करोड़ से अधिक का है। पर हमने जबसे एक भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा से पांच ट्रिलियन में कितनी ज़ीरो होती हैं पूछने वाले गौरव वल्लभ की जो दुर्गति भाजपा में जाकर होते देखी है, किस संख्या में कितने शून्य होते हैं, यह सोचना ही बंद कर दिया है।

कहाँ तो बात घिरते बादल, कड़कती बिजली और बरसती बारिश की हो रही थी। उस मौसम में चाय के साथ पकोड़ों की हो रही थी पर आ गई 'कल्याणकारी' बजट पर। क्या करें, इस बार एक फ़रवरी को मौसम ही कुछ ऐसा था। पर बजट में पकोड़े तलने वालों का भी बहुत 'कल्याण' हुआ है। वह गैस का सिलेंडर, कमर्शियल वाला, इस बजट में उनके लिए पचास साठ रुपये महंगा हो गया है। अब सबकी ऐसी किस्मत कहाँ कि बदबूदार नाले के पास खड़ा हो और उसमें से निकलने वाली गैस से ही पकोड़े तल ले। यही इस कल्याणकारी बजट की सच्चाई है।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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