कटाक्ष: अब तो विश्व गुरु मान लो, भाई!
दुनिया वालो, अब तो तुम्हें झख मारकर मानना पड़ेगा कि मोदी जी का भारत ही विश्व गुरु है! और किसी के विश्व गुरु होने का तो पहले भी कोई चांस नहीं था। कोई वास्तविक कंपटीशन तो कभी था ही नहीं। और अब, जो नयी-नयी शिक्षाएं भारत दुनिया के सामने हर रोज पेश कर रहा है, उसके बाद मोदी जी के भारत के सामने कोई और विश्व गुरु बन जाए, इसका तो सवाल ही नहीं उठता है।
हां! फिर भी अगर दुनिया बाकायदा मोदी जी को विश्व गुरु का आसन नहीं देती है, तो अपना ही नुकसान करेगी। मोदी जी का तो क्या जाता है, ये दुनिया वाले ही निगुरे रह जाएंगे। और निगुरे रह गए तो अज्ञानी तो अपने आप रह ही जाएंगे। हमारे संतों ने तो पहले ही चेता दिया था--बिन गुरु ज्ञान कहां से पावें!
अब प्लीज यह बचकानी मांग कोई न करे कि ये नयी-नयी शिक्षाएं क्या हैं, जिन्होंने विश्व गुरु के आसन पर मोदी जी के भारत का दावा एकदम मोहर लगाकर पक्का कर दिया है। नयी शिक्षाएं बताने से हमें हर्गिज इंकार नहीं है। कोई पूछेगा तो हम जरूर बताएंगे और छाती ठोककर बताएंगे। चीज ही बताने वाली है। बचकानी मांग सिर्फ इसलिए कहा कि नयी शिक्षाएं क्या हैं, कोई अगर उनका बखान करना भी चाहे तो कर नहीं सकता है।
शिक्षाएं हैं ही इतनी सारी कि उनका पूरा बखान असंभव है। हरि अनंत है, सो उसकी कथा भी अनंत होगी ही। खैर! दुनिया वालों के लिए पेश करते हैं, नमूने की दो-तीन नयी शिक्षाएं कि सारी दुनिया देखे और सीखे। और मोदी जी के भारत की उदारता देखिए, कोई फीस नहीं लगायी है, न देखने पर और न सीखने पर!
पहले, सब का साथ सब का विकास की सीख। जम्मू-कश्मीर नाम के प्रदेश में, जब सारे विभाजन पट गए और लोहे के रस्सों से प्रदेश को सीधे मोदी जी की राजगद्दी के साथ बांध दिया गया, तब जो विकास की सुनामी आयी, उसमें जम्मू के वैष्णो देवी ट्रस्ट के हिस्से में एक यूनिवर्सिटी आ गयी और यूनिवर्सिटी के हिस्से में पचास सीटों का एक मेडिकल कालेज आ गया। मेडिकल कॉलेज और अस्पताल चल भी पड़ा। मेडिकल कालेज का पहला साल ठीक-ठाक गुजर भी गया। पर जब दूसरे साल के एडमिशन का समय आया और नीट की अखिल भारतीय परीक्षा में मैरिट के आधार पर दाखिले के योग्य पाए गए छात्रों की सूची आयी, तो वैसे भी हमेशा खतरे में रहने वाला सनातन एकदम खतरे में पड़ गया। पचास में से कुल 7 उम्मीदवार हिंदू, जबकि 42 मुसलमान और एक सिख।
सत्य सनातन का अपमान अब क्यों सहेगा भारत महान! मोदी जी की पार्टी समेत, उनके विचार परिवार के तमाम संगठन आंदोलित हो उठे। विचार परिवार आंदोलित हुआ, तो मीडिया आंदोलित हुआ। मीडिया भी आंदोलित हुआ, तो सरकार विचलित हुई। डबल इंजन वाली सिचुएशन नहीं थी, सो पहले एलजी विचलित हुआ। एलजी विचलित हुआ तो उसका कंपन दिल्ली के तख्त तक पहुंचा। पर एक समस्या थी। विचार परिवार की बोली में दिल्ली की सरकार कैसे कहे कि जिस कॉलेज के नाम में वैष्णो देवी लगा है, उसमें मुसलमान ज्यादा भर्ती नहीं हो सकते। यह तो एडमीशन जिहाद हो जाएगा। तब विश्व गुरु ने अपना कटोरा दांव लगाया। दिल्ली ने इशारा किया और मेडीकल कालेज ही वर्तमान से भूतपूर्व हो गया। जब बांस ही नहीं रहा, तो बांसुरी कैसे बजती। न सरकार ने एडमीशन की प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया, न मुसलमानों के खिलाफ कोई एक्शन हुआ और सनातनियों का जीत का जश्न भी मन गया। माता वैष्णो देवी के नाम की पवित्रता की रक्षा भी हो गयी और सर्वधर्म समभाव को कोई शिकायत करने का भी मौका नहीं मिला। और यह सब सिर्फ एक मेडिकल कालेज की छोटी सी कुर्बानी से! है और कोई दुनिया को ऐसी अद्ïभुत सीख देने वाला!
उसके बाद, ज्ञान-विज्ञान को हमेशा आगे रखने की सीख। मध्य प्रदेश में जबलपुर में नानाजी देशमुख के नाम से एक वैटनरी साइंस यूनिवर्सिटी खुली। नानाजी संघ विचार परिवार के तो यूनिवर्सिटी का ज्ञान-विज्ञान भी विचार परिवार का। उस पर गोरक्षा से प्राचीन संस्कृति तथा परंपरा तक की रक्षा का जोश। सनातनी वैज्ञानिकों ने शोध की एकदम नयी दिशा में क्रांतिकारी कदम बढ़ा दिए। गाय के गोबर और गोमूत्र से कैंसर की दवा बनाने का शोध। शोध के मैदान में विचार परिवार का पहलवान, तो विचार परिवार की सरकार मेहरबान। गोबर और गोमूत्र से कैंसर की दवा के शोध के लिए साढ़े तीन करोड़ रु0 का फंड मिल गया। शोध के क्रम में जहां पौने दो करोड़ रु0 गोबर और गोमूत्र पर खर्च किए गए, वहीं करीब पच्चीस लाख गाड़ी की खरीद पर और बाकी डेढ़ करोड़, गोवा के दौरों पर। शोधकर्ताओं ने गोवा के 23-24 दौरे किए। आखिर, गोवा के नाम में भी तो गो आता ही है। इस कनेक्शन पर गहन शोध जरूरी था, सो हुआ। क्या हुआ कि कैंसर की दवा नहीं बन पायी, पर गोबर, गोमूत्र के साथ गोवा का कनैक्शन तो पूरी तरह से साबित हो गया। है दुनिया में कोई और जो ऐसे-ऐसे मोर्चों पर विज्ञान को आगे रखने की प्रेरणा दे सकता हो?
और हर स्ट्रोक को मास्टर स्ट्रोक बनाने की सीख! नमस्ते ट्रंप का ईवेंट किया, मास्टर स्ट्रोक। ट्रंप-2.0 के लिए चुनाव प्रचार नहीं किया, वह भी मास्टर स्ट्रोक। ट्रंप ने बार-बार, बार-बार, व्यापार की गाजर दिखा कर ऑपरेशन सिंगूर रुकवाने का दावा किया और मोदी जी ने एक शब्द नहीं कहा, मास्टर स्ट्रोक। बाद में विदेश मंत्रालय के मंझले अधिकारियों से खंडन कराया, वह भी मास्टर स्ट्रोक। यह प्रचार कराया कि मोदी जी ट्रंप का फोन उठा ही नहीं रहे, मास्टर स्ट्रोक। अब ट्रेड डील अपनी अकड़ से बिगड़वाने के इल्जाम के जवाब में, ट्रंप को आठ बार फोन करने का ब्यौरा दे रहे हैं, वह भी मास्टर स्ट्रोक। गज़ा पर इस्राइल की तरफ ज्यादा, मास्टर स्ट्रोक। वेनेजुएला पर चुप, वह भी मास्टर स्ट्रोक। कहां मिलेगा कोई और ऐसा, मास्टर आफ मास्टर स्ट्रोक!
अंत में सिर्फ एक चिंता! इससे पहले कि ट्रंप का ध्यान विश्व शांति नोबेल से हटकर, विश्व गुरु के आसन की ओर खिंच आए, मोदी जी को जल्दी से भारत के लिए विश्व गुरु का आसन नक्की करा लेना चाहिए। वर्ना कहीं ऐसा न हो कि ट्रंप विश्व गुरु की दावेदारी की लाइन में भी लग जाए और शांति के नोबेल की तरह, भारत को विश्व गुरु की लाइन से भी बाहर होना पड़ जाए। आखिर, पाकिस्तान के साथ लड़ाई यकायक रोकने के लिए, शांति का नोबेल तो हमारा भी बनता ही था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)
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