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झारखंड: केंद्र की ‘सखी निवास’ योजना का ऐलान, आदिवासी वर्किंग विमेंस हॉस्टल को खाली करने का फ़रमान

राजधानी रांची स्थित राज्य के एकमात्र “वर्किंग विमेंस हॉस्टल” को मरम्मत के नाम पर अचानक खाली करने का फ़रमान जारी कर दिया गया है। यहां 200 से भी ज़्यादा दूर-दराज़ से आईं छात्राएं और महिलाएं रहती हैं। अब सवाल है कि वे कहां जाएं…
ranchi

आवश्यक सूचना, माननीय उच्च न्यायालय झारखंड में दयारवाद  के आलोक में ‘कार्यकारी महिला आवास/ सखी निवास का नगड़ा-टोली , रांची का मरम्मती एवं पुनर्रक्षण का कार्य कराया जाना है। कोर्ट ने दो बार नोटिस दिया है आज दिनांक 23 जून को अंतिम रूप से सूचित किया जाता है कि अगले तीन दिनों के अन्दर इस छात्रावास को खाली कर दें। तीन दिनों बाद छात्रावास नहीं खाली करने वाली महिलाओं के विरुद्ध विधि-सम्मत कारवाई की जायेगी!”—                 

प्रशासनिक धमकी भरे इस फरमान को रांची जिला समाज कल्याण विभाग की भद्र महिला कर्मचारी माइक से ज़ोर-ज़ोर से सुनाती हैं। इस दौरान खुद एक महिला होकर वहाँ सुन रही महिलाओं-छात्राओं से कोई संवाद नहीं करतीं हैं और न ही किसी की कुछ सुनती हैं। उनकी बेटी की उम्र की छात्राओं को भी इस अंदाज़ में देखतीं हैं, मानो वे किसी दुश्मन देश की हों और वहां जबरन कब्जा करके रह रहीं हों। कहा जाय तो धमकी भरा फरमान सुनाना ही उनका “कल्याण कर्म” था। (मौके पर लिए गए वीडियो रिकार्डिंग के अंश से)

फ़िल्मी सीन टाइप का यह दृश्य झारखंड की राजधानी रांची स्थित राज्य के एकमात्र “वर्किंग विमेंस हॉस्टल” परिसर में घटित होता है। जहाँ 200 से भी अधिक संख्या में रह रहीं राज्य के सुदूर इलाकों से आयीं गरीब आदिवासी महिलायें और छात्राएं, जो सरकार की योजना-प्रकिया के तहत ही विगत कई वर्षों से उस हॉस्टल में रहकर अपनी ज़िन्दगी की ज़द्दोजहद से जूझ रहीं हैं।

सरकारी फरमान सुनने के बाद थोड़ी देर के लिए वहां अफरा-तफरी जैसा का माहौल बन जाता है। क्योंकि बरसात के इस मौसम में उनके लिए रांची में टिकने का कोई ठिकाना नहीं। फिर संकट रोज़ मजदूरी करने और कॉलेज पढ़ने जाने का, तो हॉस्टल से उजड़ने के बाद क्या होगा!   

आनन-फानन तय किया जाता है कि फ़ौरन राज्य के मुख्यमंत्री के पास जाकर गुहार लगाई जाय। एक प्रतिनिधि मंडल ज्ञापन लेकर मुख्यमंत्री आवास पहुँच जाता है। मुख्यमंत्री जी कहीं बाहर गए होते हैं सो वहां मौजूद उनके ‘तथाकथित पीए” को ज्ञापन दिया जाता है कि मुख्यमंत्री जी जब आयें तो उन्हें ये ज्ञापन दे दिया जाय। लेकिन वह ज्ञापन लेने से इंकार करते हुए उन्हें हड़का देता है- जाओ, चुपचाप जगह खाली कर दो!

अपने वर्षों के आशियाने से उजाड़े जाने की आसन्न विपत्ति से परेशान-हाल आदिवासी छात्राएं फिर झारखंड माले के विधायक अरूप चटर्जी को अपनी फ़रियाद सुनातीं हैं। जिसपर वे तत्काल संज्ञान लेकर वहाँ पहुँच जाते हैं। वहाँ की स्थिति और आदिवासी छात्राओं-महिलाओं से मिलकर पूरे मामले को समझते हैं। वहां पहुंची हुई मीडिया को बताते हैं- सिर्फ छात्रावास के मरम्मती के नाम पर वर्षों से यहाँ रह रहीं 200 आदिवासी कामकाजी महिलाओं, कॉलेज और रिसर्च छात्राओं को वहां से बेदख़ल कर “एनजीओ” के हवाले करने की साज़िश है। जिसे नहीं होने दिया जाएगा। इनकी जो मांग है कि- परिसर के एक ओर मरम्मत का काम हो और दूसरी ओर बाकी लोगों शिफ्ट हो जाएँगी, बिलकुल सही है। ज़रूरत पड़ी तो इनके लिए बड़ा आन्दोलन भी किया जाएगा। 

उपरोक्त विस्तृत चर्चा सिर्फ इसीलिए है कि आज झारखंड की जो दशा और दिशा है, जिसमें केंद्र में काबिज़ राजनीतिक सत्ता-राजीनीति एक ओर, “विकास के नाम पर कंपनी-राज” थोपने पर आमादा है। सामाजिक-धार्मिक एकता-सौहार्द की आदिवासी-संस्कृति को “सनातनी-वनवासी” विभाजन के उन्मादी-भगवा रंग में डुबोकर नष्ट-भ्रष्ट कर देना। फिर अंततोगत्वा आदिवासियों को मिले संविधान के “पांचवी अनुसूची के विशेषाधिकारों” और “आरक्षण” को ही अप्रासंगिक बनाकर झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों की वर्षों की स्वायत्तता-अधिकारों को ही ख़त्म कर देना। ताकि अपने हिडेन-प्लान- राज्य में बचे खुचे जल-जंगल-ज़मीन और प्राकृतिक संसाधन-खनिज़ की “कॉर्पोरेट कंपनियों” के बेलगाम लूट का चारागाह बनाने को हर हाल में सफल बनाना। जो इन दिनों छत्तीसगढ़ और ओड़िसा में जारी सरकार प्रायोजित दमन और विस्थापन कांडों में साफ़ देखा जा सकता है। 

तो दूसरी ओर, विडंबना है कि राज्य की सत्ता में बैठी “अबुवा सरकार” भी ज़मीनी धरातल पर राज्य के गरीब-आदिवासी जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में खरा नहीं उतर पा रही है।   

गौर तलब है कि पूर्व की सरकारों द्वारा बनायी गयी पूरे राज्य में गरीब आदिवासी कामकाजी महिलाओं-छात्राओं के इस एकलौते छात्रावास पर मौजूदा केंद्र सरकार वाली पार्टी की बहुत समय से गिद्ध-दृष्टि लगी हुई है। पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में तो राज्य के सभी सरकारी “एकलव्य” स्कूलों को एनजीओ के हवाले भी कर दिया गया। ताकि इस सभी शिक्षा केन्द्रों का “उचित रख-रखाव” के नाम पर “भगवाकरण” किया जा सके।

आदिवासी ‘वर्किंग विमेंस हॉस्टल’ को चुपके से मौजूदा केंद्र सरकार ने गरीब आदिवासी महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर “सखी निवास” घोषित करने का खेल कर दिया। आज उसी के नाम पर गरीब आदिवासी महिलाओं-छात्राओं के उजाड़ने का फरमान उसी खेल के असली सच को दिखला रहा है।

विडंबना है कि “मंईयाँ सम्मान योजना” का नारा देकर राज्य की सत्ता में काबिज़ हुई हेमंत सोरेन सरकार के मुख्यमंत्री का पीए आदिवासी विमेंस हॉस्टल से बेदख़ल की जा रही छात्राओं से ज्ञापन तक नहीं लेता है। “अबुवा सरकार” की ओर से कोई मदद-सांत्वना देने की बजाय “हॉस्टल खाली करने” को कहता है। 

दूसरी बड़ी विडंबना है कि जिस राजधानी रांची में अनेक आदिवासी संगठन और स्थापित नेतागण रहते हैं, जो आये दिन आदिवासी और विशेषकर आदिवासी महिलाओं के हकों की बात करते हैं, आये दिन आदिवासी सेमीनार-सभाएं करते हैं, किसी ने भी आदिवासी ‘वर्किंग विमेंस हॉस्टल’ की 200 पीड़िताओं की गुहार को अभी तक कोई तवज्जो नहीं दी है। 

उक्त परिदृश्य झारखंड के मौजूदा सूरते-हाल को खुलकर दिखला रहा है। जिसमें सबसे चिंताजनक स्थिति है कि प्रदेश के गरीब-गुरबे आदिवासियों, महिलाओं और छात्राओं की। जिनकी ज़िन्दगी के संकटों के समाधान से किसी को कोई मतलब नहीं दीख रहा। 

ध्यानार्थ ताज़ा घटना है- राजधानी की ‘उर्सलाइन कान्वेंट’ में एक हिन्दू छात्रा को स्कूल-प्रबंधन द्वारा स्कूल से निकाल दिया जाता है। तो आनन्-फानन भाजपा का छात्र संगठन अपने पूरे दल-बल के साथ वहाँ आ धमकता है। वहीं आदिवासी ‘वर्किंग विमेंस हॉस्टल’ से बेदख़ल की जा रहीं गरीब आदिवासी छात्राओं के लिए कोई नहीं सामने आ रहा है। जबकि बड़े-बड़े आदिवासी संगठन व उसके नेता-नेत्री, आदिवासी मामलों के चर्चित लेखक-बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट भरे पड़े हैं। 

उक्त चिंताजनक स्थितियों में भी आदिवासी छात्राएं और गरीब कामकाजी महिलायें अपने विस्थापन के ख़िलाफ़ डटी हुईं हैं।  एक ख़बर यह भी आ रही है कि सम्बंधित विभाग के शीर्ष अधिकारियों द्वारा “बीच का रास्ता” निकालने की भी बात कही गयी है।  

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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