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पंजाब में धर्म परिवर्तन का मुद्दा क्यों उभारा जा रहा है?

“असल में भाजपा पूरे देश की तरह पंजाब में भी सिखों को जज़्बाती तौर पर उकसा कर सिखों और ईसाईयों (खास कर दलितों) को आपस में लड़वाना चाहती है और अपना राजनीतिक मक़सद हासिल करना चाहती है।”
AMIT SHAH PUNJAB
14 मार्च 2026 को पंजाब के मोगा में बदलाव रैली में गृहमंत्री अमित शाह। फ़ोटो सोशल मीडिया से साभार

संविधान के अनुच्छेद 19 से 25 में दी गई नागरिक स्वतंत्रता के तहत हर भारतीय नागरिक को अपनी मर्जी से किसी भी धर्म या विश्वास को अपनाने का अधिकार है। किसी भी विकसित लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म व्यक्ति का निजी मामला होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश की राजनीति में धर्म परिवर्तन का मुद्दा ज़ोर पकड़ता जा रहा है। केंद्र में मौजूदा सत्ताधारी भाजपा इस मुद्दे को उछालकर अपनी ध्रुवीकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रही है। 

भारत के 12 राज्यों में धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बन चुका है। इनमें से अधिकतर राज्य भाजपा शासित हैं। कई राज्यों में धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए इस कानून के तहत कड़ी सज़ाएँ रखी गई हैं।  

धर्मांतरण विरोधी संगठनों द्वारा यह दावा किया जाता है कि दूसरे धर्म के प्रचारक उनके धर्म (बहुसंख्यक धर्म) के लोगों (खासतौर पर गरीब और दलित लोगों) को ज़बरदस्ती या लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। लेकिन इन दावों की हकीकत कुछ और ही सामने आती है। असल में धर्म परिवर्तन के कारण सामाजिक-आर्थिक असमानता, सदियों से चली आ रही जाति-पाति और छुआछूत की व्यवस्था (जिसके अंश अभी भी समाज में मौजूद हैं) में निहित हैं।  

धर्म परिवर्तन का विरोध करने वाले राजनीतिक और धार्मिक समूह अपने धर्म के दलित और हाशिये पर पड़े लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने की बजाय उनका शोषण करने वालों के साथ खड़े नजर आते हैं। वे जाति-पाति को अपनी संस्कृति बताकर उसका महिमामंडन करते हैं और कई जगह दलितों के मंदिरों में प्रवेश का विरोध करते भी दिखाई देते हैं। ये लोग यह तो चाहते हैं कि हाशिये पर पड़े वर्ग उनके धर्म का हिस्सा बने रहें, लेकिन उनके लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने से इनकारी हैं।  

विरोध करने वाले खुद दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म में लालच, दबाव और धोखे से शामिल करते हैंइस तरह की खबरें भी मीडिया में आती रही हैं। जिसे बहुसंख्यक धर्म के नेता पवित्र कामऔर घर वापसीकहकर सही ठहराते हैं। 2016 में पत्रकार नेहा दीक्षित ने आउटलुक में छपी अपनी रिपोर्ट में यह तथ्य सामने लाया था कि हिंदुत्ववादी सोच वाले संगठन कैसे आदिवासी इलाकों से वहाँ की लड़कियों को अच्छी शिक्षा देने के नाम पर देश के अलग-अलग राज्यों में चल रहे अपने कैंपों में ले जाकर उन्हें अपनी विचारधारा की शिक्षा देकर उनका ब्रेनवॉशकर रहे हैं। इस तरह के लोगों पर धर्म परिवर्तन सम्बन्धी कानून के तहत कार्रवाई की कोई खबर सामने नहीं आई। 

अब पंजाब में भी यह मुद्दा चर्चा में है। कहा जा रहा है कि ईसाई प्रचारकों द्वारा लालच देकर दलित, सिखों और हिंदुओं का ज़बरी धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। धार्मिक संगठनों के साथ राजनैतिक पार्टियाँ भी इस मुद्दे पर अपनी बयानबाजी करने लगी हैं। 

हाल के दिनों केन्द्रीय मंत्री अमित शाह ने पंजाब के मोगा में ‘बदलाव’ रैली में इस मुद्दे को बड़े उकसाऊ ढंग से उछालते हुए कहा कि भाजपा पंजाब में एक नए कानून के जरिए धर्मांतरण पर रोक लगाएगी। 

मुम्बई में एक और जगह गुरु तेग बहादुर जी के 350 वें शहीदी दिवस पर सिखों से अपनेपन का दिखावा कर धर्मांतरण विरोधी अपनी सियासी विचारधारा को शाह इस तरह पेश करते हैं, “यह कहा जाता है रहा है कि पंजाब में धर्म परिवर्तन हो रहे हैं। गुरु तेग बहादुर जी ने दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए अपने आप को कुर्बान कर दिया पर यदि किसी भी तरह के लालच के  कारण धर्म परिवर्तन हो रहे हैं तो यह हमारे गुरुओं की शिक्षा का अपमान हैं।”     

साल 2011 की जनगणना में पंजाब में ईसाइयों की जनसंख्या 1.5 प्रतिशत थी। स्वाभाविक है कि यह पहले से बढ़ी है, लेकिन कितनी बढ़ी है इसके सही आंकड़े नहीं हैं क्योंकि 2011 के बाद सरकारी जनगणना नहीं हुई। गैर-सरकारी स्तर पर इस संख्या के 15 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान लगाया जाता है,  कुछ दावे इसको और भी ज्यादा बताते हैं लेकिन यह तथ्य वास्तविकता से मेल खाते नहीं दिखते।  

पंजाब में चर्चों की संख्या पहले की तुलना में बढ़ी हुई दिखाई दे रही है, खासकर दोआबा और माझा क्षेत्र में, जो पारंपरिक कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट चर्चों से अलग पादरियों द्वारा स्वतंत्र रूप से चलाए जाते हैं। ऐसे चर्च में हर हफ्ते लोगों का एकत्र होना होता है। पंजाब के सीमावर्ती इलाकों, खासकर गुरदासपुर और अमृतसर के कई गांवों में गिरजाघर बन गए हैं, जिनमें दलित समुदाय के बाल्मीकि और मज़हबी सिख अधिक जाते हैं। इन चर्चों को चलाने वाले अधिकतर धार्मिक गुरु तथाकथित उच्च जातियों से हैं। 

पेंडू मजदूर यूनियन के अध्यक्ष तरसेम पीटर बताते हैं, “धर्मातरण के मामले में विचार करने वाली बात यह है कि इस मुद्दे को चुनाव के समय ही क्यों उभारा जाता है। पंजाब में अभी तक जबरदस्ती धर्म परिवर्तन का एक भी मामला सामने नहीं आया, न कोई पर्चा दर्ज हुआ है। अपनी मर्जी से किसी को भी किसी धर्म को अपनाने का हक है।”

पीटर कहते हैं, “असल में भारतीय जनता पार्टी पूरे देश की तरह पंजाब में भी सिखों को जज्बाती तौर पर उकसा कर सिखों और ईसाईयों (खास कर दलितों) को आपस में लड़वाना चाहती है और अपना राजनीतिक मकसद हासिल करना चाहती है। यह पंजाब में वैसे तो जीत हासिल करने योग्य नहीं है पर लोगों को धर्म-जाति के नाम पर लड़वाकर और दूसरी पार्टियों के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर पंजाब में राज करने की सोच रही है।” 

तरसेम पीटर बातचीत में हमें बताते हैं, “भाजपा दलितों को भी आपस में लड़वाने का काम कर रही है। जैसे बाल्मीकी और रविदासी को, मजहबी और रामदासी भाईचारे को। पहले ईसाई मिशनरियों को अंतरराष्ट्रीय फंडिंग आती थी, लेकिन केंद्र सरकार की रोक के बाद कुछ पादरियों ने स्वतंत्र संस्थाएं शुरू कर दी। जैसे पंजाब में अंकुर नरूला मिनिस्ट्री, बरजिंदर देओल मिनिस्ट्री आदि शामिल हैं। यहाँ समाज के कमज़ोर वर्गों से आये लोग जाते हैं क्योंकि उन्हें अपने पुराने धर्म में इज्ज़त नहीं मिलती, जाति भेद-भाव सहना पड़ता है। एक तरफ तो भाजपा सिख समुदाय को इन संस्थायों के विरुद्ध भड़काती है दूसरी तरफ भाजपा के कई दलित राजनीति करने वाले नेता भी इन संस्थाओं में जाते हैं।”

सोशल मीडिया पर आपको पंजाबी में यीशु मसीह की भक्ति से जुड़े कई भजन और गीत मिल जाएंगे, जिन्हें गाने वाले भी सामान्य दलित परिवारों से हैं। कुछ दलित कलाकार ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि इन चर्चों ने उनकी कला को सही दिशा दिखाई और उन्हें पहचान दी है। इन ईसाई सभाओं में गाने वाले दीपक जोहनसन अपना अनुभव कुछ इस तरह साझा करते हैं, “मैं एक गायक बनना चाहता था लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं अपने प्रभू के लिए गायक बनूंगा।” 

यहां जाने वाले दलित श्रद्धालुओं का कहना है कि इन चर्चों में उनका मानसिक और शारीरिक उपचार होता है। ईसाई धर्म गुरुओं द्वारा चलाए जा रहे शैक्षणिक संस्थानों में उनके बच्चों को मुफ्त या बहुत कम फीस पर अच्छी शिक्षा मिलती है। श्रद्धालु यह भी कहते हैं कि जो सम्मान उन्हें अपने पुराने धर्म में नहीं मिलता, वह उन्हें यहां मिलता है। यह बातें हमें तरन तारन जिला  के कुछ दलित ईसाई श्रद्धालुओं ने बताई।

ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित जनगणना आदि में अपना पुराना धर्म ही लिखाते हैं ताकि उन्हें मिलने वाली आरक्षण की सुविधा समाप्त न हो जाए। सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला उन्हें और भी निराश करने वाला है।

चर्चों में जाने वालों में बड़ी संख्या में पगड़ीधारी लोग मिल जाएंगे। कई ऐसे भी हैं जो अपने पुराने धर्म के कर्मकांड या पाठ-पूजा भी करते रहते हैं और पादरी द्वारा यीशु मसीह का दिया मंत्र या पाठभी दोहराते हैं। इसी कारण पंजाब के कई विद्वान इसे धर्म परिवर्तन की बजाय डेरावाद की तरह देखते हैं, जहां लोग डेरा प्रमुख (संत) को भी अपने दुखों से मुक्ति की आशा में मानते हैं और अपने पुराने धर्म से भी जुड़े रहते हैं। माझा इलाके के कई दलित घरों में आपको सिख गुरुओं के साथ-साथ यीशु मसीह की तस्वीर भी मिल जाएगी।

धर्म परिवर्तन करने वाले दलित यह तर्क देते हैं कि उनके पुराने धर्म में उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है। उग्र सिख समूहों द्वारा उन्हें निशाना बनाए जाने का वे विरोध करते हुए कहते हैं कि अन्य लोगों की तरह उन्हें भी अपनी इच्छा से अपने धर्म को मानने का अधिकार है। किसी को यह अधिकार नहीं कि वह उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में बाधा डाले। वे यह भी मांग उठा रहे हैं कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी उनका आरक्षण का अधिकार बना रहना चाहिए। सीमावर्ती इलाके में कब्रिस्तानों के लिए जमीन का मुद्दा इन ईसाई अनुयायियों का मुख्य मुद्दा है।  

पंजाब में दलितों की आबादी 32 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 37 प्रतिशत तक चली जाती है। दोआबा क्षेत्र के कई इलाकों में यह आबादी 45 से 50 प्रतिशत तक चली जाती है, लेकिन दलितों का समग्र वोट बैंक कभी भी एक तरफ नहीं जाता। इसके कई कारण हैं। पंजाब में दलित समुदाय 39 जातियों में बंटा हुआ है जिनके आपसी हित भी टकराते हैं।

हालांकि यह माना जाता है कि पंजाब में देश के अन्य राज्यों (खासकर उत्तर भारत) की तुलना में दलितों की स्थिति बेहतर हैसिख धर्म में भी जात-पात की कोई जगह नहीं हैलेकिन वर्तमान और अतीत की कुछ ऐसी कड़वी सच्चाइयाँ हैं जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता

20वीं सदी के शुरुआत में हरिमंदर साहिब में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता थाउनके लिए दरबार साहिब के दर्शनों के लिए अलग समय और स्नान के लिए अलग जगह निश्चित थीउस समय अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त काबिज़ महंत पुजारी वर्ग दलितों के हाथों से कड़ाह प्रसाद नहीं लेता था और न ही उनके लिए अरदास करता थाइसके खिलाफ सिख समुदाय को खुद लंबा संघर्ष करना पड़ा

पंजाबी लेखक बलबीर माधोपुरी 25 जून 2020 को 'पंजाबी ट्रिब्यून' में छपे अपने लेख ‘आदि धर्म अते दलितां नाल वापरे साके’ में उल्लेख करते हैं कि 1931 की जनगणना से पहले जब पंजाब में 'आदि धर्म' एक नए धर्म के तौर पर पंजीकृत हुआ तो हिंदुओं और सिखों द्वारा अछूत समझे जाने वाले समाज पर ज़ुल्म का सांगठनिक रूप देखने को मिलाहिंदुओं और सिखों ने इसे अपनी तौहीन समझी कि सदियों से गुलाम रहने वाले लोग हमारे बराबर कैसे हो गएविरोधस्वरूप 'अछूतों' की नाकाबंदियाँ की गईजगह-जगह उन पर हमले हुएपंजाब में कई स्थानों पर जनगणना में अपना धर्म 'आदि धर्म' लिखवाने वाले दलितों को मारा गया

दलितों के साथ पंजाब में होने वाले जातीय भेदभाव को दर्शाती बेहतरीन आत्मकथा 'छांग्या रुख' के लेखक बलबीर माधोपुरी बताते हैं, "पंजाब में निम्न समझी जाने वाली जातियाँ आज़ादी के बाद बेशक कुछ आर्थिक तौर पर ठीक हुई हैंलेकिन सामाजिक गैर-बराबरी की लड़ाई अभी बाकी हैमैंने बचपन से छुआछूत, दलितों की गुरुद्वारों में प्रवेश की मनाही, दलितों की बहन-बेटियों के साथ शारीरिक शोषण आदि ज़ुल्म स्वयं देखे और सहे हैंपंजाब में अभी भी कई गुरुद्वारों में दलितों की मनाही की खबरें मिल जाती हैंइसलिए दलितों के अलग गुरुद्वारे और डेरे अस्तित्व में आएइसीलिए कई दलित ईसाई बन रहे हैंकई गांवों में दलितों के श्मशानघाट अलग हैंगुरुद्वारों से उनके सामाजिक बहिष्कार की घोषणा आज भी होती हैयहाँ तक कि दलित समाज स्वयं भी आपस में ऊँच-नीच का शिकार है।" 

धान के मौसम में धान की बिजाई के रेट धनी किसानों द्वारा खुद ही तय कर दिए जाते हैं। अगर दलित खेत मजदूर इसका विरोध करते हैं तो उनका सामाजिक बहिष्कार करने के मामले सामने आते हैं। प्रमुख पार्टियों के स्थानीय नेता भी इस बहिष्कार में शामिल पाए जाते हैं। इसी तरह एक मुद्दा पंचायती ज़मीन में दलितों के एक तिहाई हिस्स्से का है, जो अक्सर ही दलितों को नहीं मिलती। इस हक को मांगने पर भी कई जगह दलितों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। पंजाब के मालवा में कई वामपंथी संगठनों ने दलितों की इस लड़ाई को बखूबी लड़ा है। मुकेश मलोद इस आन्दोलन का मुख्य चेहरा हैं।

2003 में जालंधर जिले के गांव तल्हण (Talhan)के 'गुरुद्वारा शहीद निहाल सिंह' की प्रबंधक कमेटी में दलितों की हिस्सेदारी को लेकर जट्टों और दलितों के बीच हुआ तनाव उस समय देश स्तर पर चर्चा का विषय बना रहा थाइसके बाद जट्ट समुदाय की ओर से दलितों के बहिष्कार की घोषणा की गई थीइसके चलते दलितों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुएइन प्रदर्शनों के दौरान विजय कुमार नाम के एक दलित कार्यकर्ता की मृत्यु भी हो गई थीतल्हण कांड में से ही भाजपा के नेता विजय सांपला का राजनीतिक उभार हुआ था 

2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा 'घर वापसी' अभियान चलाया गया जिसके तहत गरीब ईसाइयों और मुसलमानों का हिंदू धर्म में परिवर्तन करवाया गयाउस समय पंजाब के बठिंडा जिले में भी विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों के लोगों ने कुछ दलित ईसाइयों का (दलितों में भी वे मजहबी सिख थे) सिख धर्म में परिवर्तन करवाया गयाधर्म परिवर्तन करवाते समय उनके गले में भाई जेता जी का लॉकेट पहनाया गया था (वंचित तबके से सबंध रखने वाली ऐतिहासिक सिख हस्ती जिन्हें गुरु गोबिंद सिंह जी ने ‘रंग्रेटा गुरु का बेटा’ का खिताब दिया था)इस घटना के बाद सिख धार्मिक संस्थाओं और उस समय पंजाब में सत्ताधारी और भाजपा सहयोगी अकाली दल ने इसकी आलोचना की थी और इस कार्रवाई को सिख धर्म में दखलअंदाजी कहा थातत्कालीन जत्थेदार ने अपने बयान में कहा था कि इस तरह किसी का जबरन धर्म परिवर्तन करना सिख सिद्धांतों के विपरीत हैइसके अलावा कई सिख विद्वानों ने भी इस घटना की आलोचना यह कहकर की थी कि सिख धर्म में धर्म परिवर्तन का मुद्दा कोई मुद्दा ही नहीं हैआरएसएस और उससे जुड़े संगठन अपनी परंपराओं और सोच को सिख धर्म में घुसपैठ कराना चाहते हैं 

इसके बाद पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटना ने सिख मनों को ठेस पहुँचाईफिर इस तरह की सिलसिलेवार घटनाएँ हुईं जिसका पूरा सच सामने नहीं आ सकाधीरे-धीरे पंजाब की राजनीति में धार्मिक और भावनात्मक मुद्दे जोर पकड़ते गएपिछले कुछ वर्षों से दलितों द्वारा हो रहे ईसाई धर्म में प्रवेश का सिख नेताओं ने भी विरोध करना शुरू कर दियाशिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने तो इसे रोकने के लिए अपना धर्म प्रचार का काम भी शुरू किया हैउग्र सिख समूहों और निहंग दलों ने ईसाई धर्म प्रचारकों के खिलाफ पिछले समय में नफरती बयान दिए और ईसाइयों के आयोजनों में जाकर हुड़दंग और तोड़फोड़ कीअमृतपाल सिंह जेल जाने से पहले ईसाई धर्म और यीशु मसीह के खिलाफ भी नफरती बयानबाजी करता रहावोट बैंक को ध्यान में रखते हुए अन्य राजनीतिक पार्टियाँ भी इस मुद्दे पर राजनीति करने लगीं। 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान केजरीवाल ने भी दलितों द्वारा ईसाई बनने के मुद्दे पर बयान दियाइस तरह पंजाब की राजनीतिक पार्टियों और सिख संस्थाओं ने हिंदुत्व के मुद्दे को अपना मुद्दा बना लिया

सिख चिन्तक और लेखक जसपाल सिद्धू इस मामले पर अपने विचार कुछ तरह देते हैं, “धर्म परिवर्तन का विरोध करना या इसे जबरदस्ती रोकना किसी भी तरह सिखी सिद्धांत का हिस्सा नहीं है सिख धर्म इस विचार पर खड़ा है कि अपने धर्म पर अटल रहो लेकिन यदि कोई छोड़कर जाता है तो आप उसके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते असल में भाजपा पंजाब में सिखों के जरिए अपने हिन्दुत्व के विस्तारवादी एजंडे को आगे बढ़ा रही है। जो सिख संगठन दलित ईसाईयों का विरोध कर रहे हैं असल में वह जाने-अनजाने भाजपा की साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का मोहरा बन रहे हैं।” 

धर्म परिवर्तन का विरोध करने वाले बार-बार यह दलील देते हैं कि लालच और डरावे से दलितों का धर्म परिवर्तन करवाया जाता है, जिसका कोई ठोस सबूत वह अभी तक सामने नहीं ला सके। आखिर डर और लालच के मामले से कौन-सा धर्म बचा है? 84 लाख जून, स्वर्ग-नर्क, आवागमन से मुक्ति, स्वर्ग में मिलने वाली ‘हूर परियां’ आखिर यह सब डर और लालच ही तो हैं? फिर इंसान चुनाव करते समय उस लालच को मुख्य रखेगा जो उसको इस संसार में ही चाहिये। दूसरा संसार किसने देखा? अपनी मर्जी से धर्म के चुनाव पर रोक लगाना व्यक्ति की आज़ाद सोच पर ही रोक लगाना है। असल में धर्म परिवर्तन के पीछे के सामाजिक और नाबराबरी के कारणों को समझना जरूरी है। 

(पंजाब स्थित लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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