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‘मज़दूरों और बौद्धिकों की गिरफ़्तारी असहमति की आवाज़ दबाने की साज़िश’

देश के कई प्रमुख बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लेखक संगठनों के प्रतिनिधियों ने सत्यम वर्मा समेत अन्य गिरफ़्तार लोगों की तत्काल रिहाई की मांग की।
SATYAM VARMA

देश की राजधानी दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में “सत्यम वर्मा रिहाई मंच” द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में वरिष्ठ पत्रकार, अनुवादक और जनबुद्धिजीवी सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। मंच ने इसे पूरी तरह अवैध, मनगढ़ंत और असहमति की आवाज़ को कुचलने की कोशिश करार दिया। 

मंगलवार को हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के कई प्रमुख बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लेखक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सत्यम वर्मा समेत अन्य गिरफ्तार लोगों की तत्काल रिहाई की मांग की।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मंच की संयोजक कविता कृष्णपल्लवी ने विस्तार से बताया कि सत्यम वर्मा, जो ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़’ किताब के संपादक और कई विश्व प्रसिद्ध कृतियों के अनुवादक रहे हैं, को नोएडा के मजदूर आंदोलन से जुड़े एक हिंसा मामले में झूठा फंसाकर गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने कहा कि सत्यम का न तो कभी नोएडा से कोई प्रत्यक्ष संबंध रहा और न ही वे वहां के मजदूरों या कार्यकर्ताओं के संपर्क में थे। इसके बावजूद उन्हें “साजिश का मास्टरमाइंड” बताकर गिरफ्तार किया गया।

कविता कृष्णपल्लवी ने आरोप लगाया कि यह गिरफ्तारी दरअसल सरकार और प्रशासन द्वारा एक मुखर आलोचनात्मक आवाज़ को खामोश करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि सत्यम वर्मा लगातार जन मुद्दों, मजदूरों के सवालों और सरकारी नीतियों की आलोचना करते रहे हैं, और यही उनकी गिरफ्तारी का असली कारण है।

उन्होंने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए बताया कि 11 अप्रैल से ही पुलिस ने बिना किसी नोटिस या वारंट के सत्यम वर्मा और उनके साथियों को परेशान करना शुरू कर दिया था। 13 अप्रैल को सत्यम वर्मा, कवयित्री कात्यायनी और पत्रकार संजय श्रीवास्तव को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया। 17 अप्रैल को पुलिस ने ‘जनचेतना’ परिसर में एक मंजिल के लिए वारंट होने के बावजूद पूरे परिसर की तलाशी ली, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, किताबें और निजी डायरी जब्त कर लीं, और इसके लिए कोई वैधानिक जब्ती सूची (सीज़र मेमो) भी नहीं दी गई।

उन्होंने यह भी बताया कि सत्यम वर्मा को बिना किसी ठोस आधार के उठाया गया, उन्हें जीवन रक्षक दवाइयों से वंचित रखा गया और उनके कानूनी अधिकारों का भी उल्लंघन किया गया। उन्हें दो दिन की गैरकानूनी हिरासत के बाद ही नोएडा की अदालत में पेश किया गया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने इस गिरफ्तारी की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि उन सभी प्रगतिशील और जनपक्षीय आवाज़ों पर हमला है जो मजदूरों और आम जनता के अधिकारों के लिए बोलती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार मजदूर आंदोलनों से डरी हुई है और इसलिए ऐसे बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है जो इन आंदोलनों के साथ खड़े होते हैं।

विनीत तिवारी ने कलाकारों, लेखकों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे इस दमन के खिलाफ आवाज़ उठाएं और सत्यम वर्मा समेत सभी गिरफ्तार लोगों की रिहाई के लिए एकजुट हों। उन्होंने कहा कि दमन का इतिहास जितना पुराना है, प्रतिरोध की परंपरा भी उतनी ही मजबूत रही है और इसे जारी रखना होगा।

पीयूसीएल की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने भी इस कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि पुलिस और प्रशासन ने सभी कानूनी प्रक्रियाओं और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है। उन्होंने विशेष रूप से डी.के. बसु गाइडलाइंस का जिक्र करते हुए कहा कि गिरफ्तारियों के दौरान जिन प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।

उन्होंने बताया कि पीयूसीएल इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने उठाएगा और एक प्रतिनिधिमंडल भेजेगा। कविता श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि पुलिस अब तक यह भी स्पष्ट नहीं कर पाई है कि नोएडा के मजदूर आंदोलन के दौरान कितने मजदूरों को हिरासत में लिया गया है, जो प्रशासन की अपारदर्शिता को दर्शाता है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास गवाह है कि जो भी व्यक्ति मजदूरों और वंचितों के अधिकारों की बात करता है, उसे बदनाम और दमन का शिकार बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि आज जिन लोगों को “साजिशकर्ता” कहा जा रहा है, वे दरअसल मजदूरों के बीच शांति बनाए रखने और उनके अधिकारों के लिए काम कर रहे थे।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि मजदूर अपने “जीने के अधिकार” के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उनकी खराब जीवन परिस्थितियों ने उन्हें सड़कों पर उतरने को मजबूर किया है। उन्होंने कहा कि चार नए श्रम कानूनों के लागू होने के बाद यूनियन बनाना और विरोध करना लगभग असंभव बना दिया गया है, और ऐसे में मजदूरों का यह आंदोलन पूरी तरह जायज है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और प्रशासन सामाजिक कार्यकर्ताओं को “मास्टरमाइंड” और “साजिशकर्ता” बताकर वही भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कभी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन करता था।

गिरफ्तार आदित्य आनंद के भाई केशव आनंद ने बताया कि उनके भाई समेत अन्य कार्यकर्ताओं को भी अवैध तरीके से गिरफ्तार किया गया और हिरासत में उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह दावा किया कि जिन लोगों को साजिशकर्ता बताया जा रहा है, वे लगातार मजदूरों से शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करने की अपील कर रहे थे।

केशव आनंद ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य यह भी दिखाते हैं कि हिंसा भड़काने में पुलिस की भूमिका रही, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने अब तक कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि मुख्यधारा की मीडिया इस सच्चाई को क्यों नजरअंदाज कर रही है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में कविता कृष्णपल्लवी ने सभी पत्रकारों, मीडिया कर्मियों और नागरिकों से अपील की कि वे सच और न्याय के पक्ष में खड़े हों और इस तरह की अवैध गिरफ्तारियों के खिलाफ आवाज़ उठाएं।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या देश में असहमति की आवाज़ों के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यह मामला केवल सत्यम वर्मा या अन्य छह लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर एक व्यापक हमला है, जिसका विरोध जरूरी है।

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