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तिरछी नज़र: गैस की क़िल्लत दूर करने के आसान नुस्ख़े

वैसे सरकार जी और उनके मंत्री मान ही नहीं रहे हैं कि रसोई गैस की कोई कमी है भी। यह किसी भी प्रॉब्लम को सॉल्व करने का आधुनिक तरीका है। तरीका यह है कि उसे प्रॉब्लम मानो ही मत। और जब प्रॉब्लम है ही नहीं तो उसको सॉल्व करना कैसा?
LPG Crisis

इसी हफ्ते की बात है। एक दिन सुबह मेरे क्लिनिक पर एक मरीज आया। नाम उनका मैं लूंगा नहीं। नाम लूंगा तो जाति, धर्म पता चल जायेगा। लोगों की भावनाएं आहत हो जाएंगी। अब देखो राहुल गांधी ने नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेन्द्र मोदी का नाम लिया तो तो गुजरात में किसी मोदी की भावनाएं आहत हो गईं। कोर्ट केस हुआ और जज साहब ने दो साल की सजा भी सुना दी। सच्ची में, आजकल भावनाएं आहत होने के लिए ही होती हैं। और भावनाएं आहत होने पर कोर्ट कचहरी तो छोड़ो, दंगा तक हो जाता है।

आप बस इतना ही जान लें कि वे पुराने मरीज हैं और गैस की तकलीफ से परेशान रहते हैं। 

मैंने उनसे पूछा, "आजकल गैस कैसी है"। 

वे बोले, "पेट की गैस तो ठीक है डॉक्टर साब। पर रसोई गैस की बहुत किल्ल्त है। गैस का सिलेंडर मिल ही नहीं रहा है। बहुत लम्बी लम्बी लाइन लग रही है। उसके बाद भी गैस एजेंसी पर ब्लैक में मिल रही है"।

मैंने उसे समझाया, "इस काल में इसे ब्लैक नहीं कहते हैं। वह पिछले जमाने में कहते थे। आज कल नया काल है, अमृत काल और अमृत काल में इसे 'आपदा में अवसर' कहा जाता है। कहो कि गैस एजेंसी वाला देशभक्त है, आपदा में अवसर पैदा कर रहा है। सरकार ने भी तो आपदा में अवसर तलाशा है। वैसे तो सरकार कहती है, गैस की कोई कमी नहीं है, पर गैस के दाम घरेलू सिलेंडर पर एकदम से ही साठ रुपये बढ़ा दिये हैं और कमर्शियल की तो सप्लाई ही बंद है। सरकार अपना और अपने दोस्तों का घर भर रही है, गैस एजेंसी का मालिक अपना घर भर रहा है। आपदा है, तो अवसर है। इसमें शिकायत कैसी"।

वह मिमिया कर बोला, "डॉक्टर साब, कोई ऐसी दवा नहीं होती है जिससे गैस की बीमारी बढ़ जाये। पेट में खूब गैस बनने लगे"।

मैं हंसा, "ज्यादा गैस क्यों चाहिए। हर समय तो गैस कम करने की दवाई मांगते हो। आज गैस ज्यादा करने की दवा लेने आए हो! मेरी जानकारी में तो कोई ऐसी दवा है भी नहीं"।

मेरा उत्तर सुन कर वह उदास हो गया, "मैं सोच रहा हूँ, अपने पेट की गैस से ही चाय बनाने लगूं। ज्यादा गैस बने तो घर की रोटी-सब्जी मेरे पेट की गैस से ही बनने लगे। पकोड़े भी तलने लगें। अगर ऐसी कोई दवा आती होती तो मैं अपने लिए तो लेता ही, बीबी-बच्चों के लिए भी ले लेता। घर में ही इतनी गैस बन जाती कि आसपास के लोगों को भी सप्लाई कर देता"।

वह बेचारा मायूस हो कर चला गया। जब से गैस की किल्लत हुई है, सरकार जी का नाले की गैस वाला वीडिओ दुबारा वायरल होने लगा है। अगर कोई चौथी पास चाय वाला नाले की गैस से चाय बनाने लगता है तो उन मरीज महोदय द्वारा पेट में बनने वाली गैस से खाना बनाने की कल्पना करना गलत कैसे हो सकता है। और कहते हैं, मुसीबत ही अविष्कार की जननी है। तो हमारे सरकार जी इस मुसीबत की घड़ी में यह भी अविष्कार कर दें कि मुंह से निकलने वाली डकार और पीछे से छोड़ी जाने वाली गैस (पाद) से भी चाय-पकोड़ी बनाई जा सकती है तो आश्चर्य की बात नहीं है। सरकार जी हैं तो मुमकिन है। सबकुछ मुमकिन है, और वे कुछ भी बोल सकते हैं।

वैसे सरकार जी और उनके मंत्री मान ही नहीं रहे हैं कि रसोई गैस की कोई कमी है भी। यह किसी भी प्रॉब्लम को सॉल्व करने का आधुनिक तरीका है। तरीका यह है कि उसे प्रॉब्लम मानो ही मत। और जब प्रॉब्लम है ही नहीं तो उसको सॉल्व करना कैसा? जैसे ऑक्सीजन का सिलेंडर नहीं होने पर ऑक्सीजन की कमी नहीं मानी थी, अब रसोई गैस का सिलेंडर न होने पर रसोई गैस की कमी भी नहीं मान रहे हैं। कहते हैं, शतुरमुर्ग कोई प्रॉब्लम आने पर ऐसा ही करता है। 

और सरकार जी जब इसे प्रॉब्लम मान लेंगे तो हो सकता है विदेश जा कर, और अब जब युद्ध के कारण विदेशी दौरे बंद हैं तो देश में ही कहीं किसी कोने में हमारा मज़ाक़ उड़ाएं। हँस कर, हाथ हिलाते हुए कहें कि बेटी की शादी है, बारात द्वार पर खड़ी है पर उसका स्वागत कैसे करें, मेहमानों को खाना कैसे खिलाएं। गैस का सिलेंडर तो है ही नहीं। 

वैसे मेरे कुछ सुझाव हैं, रसोई गैस के सिलेंडर की कमी के मद्देनज़र। सरकार चाहे तो उन पर अमल कर सकती है।

1. सरकार गैस के सिलेंडर के लिए लाइन में लगना अपराध घोषित कर सकती है। जनता को भी बात बात पर लाइन में लगने की आदत ही पड़ गई है। नोटबंदी में नोट बदलवाने लाइन में लगी। कोविड में ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए लाइन में लगी, अस्पताल में बेड के लिए लाइन में लगी, अपनों के अंतिम संस्कार के लिए लाइन में लगी। अब गैस सिलेंडर के लिए लाइन में लग रही है।

2. सरकार गैस के सिलेंडर के लिए लाइन में लगे लोगों की फोटो लेना, उन पर कार्यक्रम करना, आदि देशद्रोह घोषित कर सकती है। सरकार ऐसे अखबारों पर, ऐसे चैनलों पर जो रसोई गैस की कमी पर खबर दिखाते हैं, लाइन में लगे लोगों की तस्वीर दिखाते हैं, उनसे बातचीत करते हैं, बैन लगा सकती है।

3. सरकार या गोदी मीडिया गैस पर खाना बनाने के नुकसान गिना सकते हैं। वैसे सच कहें तो पका कर खाना बनाने के नुकसान बता, कच्चा खाना खाने के लाभ बता सकते हैं।

4. सरकार जी रसोई गैस के अन्य विकल्प सुझा सकते हैं, जैसे नाले से निकलने वाली गैस, पेट में बनने वाली गैस। वैसे बाद वाली गैस का श्रेय मेरे उस मरीज को जाता है, जिसका जिक्र मैं पहले ही कर चुका हूँ।

5. गोबर के उपले से बने खाने को श्रेष्ठ घोषित किया जा सकता है। गाय के गोबर के उपले पर बने खाने से विभिन्न बीमारियों के दूर रहने की और असाध्य बीमारियों के ठीक होने की शर्तिया (मैच फिक्सिंग वाली) रिसर्च करवाई जा सकती है। और बाबा जी गाय के गोबर से बने उपले का व्यापार कर सकते हैं।

मुझ नाचीज को तो अभी यही कुछ उपाय सूझ रहे हैं। वैसे मुझे यह सब सुझाने की जरूरत भी क्या है। पीएमओ तो है ही, नीति आयोग भी है। पहले जब वह योजना आयोग कहलाता था, ऐसी कठिनाइयों से निपटने के लिए योजनाएं बनाता था। अब उसका नाम नीति आयोग कर दिया गया है। अब उसका काम सरकार जी को सेफ करने के लिए, विरोधियों और जनता को ब्लेम करने के लिए नीति बनाना हो गया है।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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