कटाक्ष: ये फ्रेंडशिप, वो नहीं छोड़ेंगे!
पूछता है भारत बल्कि पूछता है विश्व कि ये विरोधी, मोदी जी को क्या बिल्कुल वेला ही समझते हैं। बताइए, ट्रंप जी ने अपने सोशल मीडिया पर भारत को जरा सा नर्क कुंड उर्फ हैल होल क्या लिख दिया, बस मोदी जी के पीछे पड़ गए कि इसका जवाब क्यों नहीं देते? जैसे को तैसा जवाब क्यों नहीं देते? अब भी जवाब नहीं देंगे तो क्या कहने पर जवाब देंगे, वगैरह, वगैरह।
फिर यह मानकर कि मोदी जी इस बार भी मुंह नहीं खोलेंगे, इस पर बहस भी करने लगे कि ट्रंप ने इसी बयान में भारतीयों को लैपटॉप वाले आतंकवादी भी कहा था। उसने तो भारतीयों पर इसका भी इल्जाम लगाया था कि वे सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए अमेरिका में जा जाते हैं और इन बच्चों को क्योंकि खुद ब खुद नागरिकता का अधिकार मिल जाता है, बाद में उनकी उंगली पकड़ कर उनके मां-बाप, दादा-दादी सब अमेरिका में आ धमकते हैं! यह तो भारत का घोर अपमान है। मोदी जी अब भी जवाब नहीं देंगे, तो कब देंगे?
जब ज्यादा ही हाय-हाय होने लगी तो मोदी जी के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा पहले तो इसका नोटिस लेने के बाद भी, इस पर दो शब्द तक खर्च करने से इंकार कर के, इशारे में नापसंदगी का इजहार कर दिया। उससे भी काम नहीं चला तो बाकायदा इस सब को अनुचित, अनुपयुक्त बताते हुए, भारत के साथ अमेरिका के असली रिश्ते की याद भी दिला दी। पर विरोधियों को इससे भी संतोष नहीं हुआ। उन्हें तो मोदी जी के जवाब से कम कुछ मंजूर ही नहीं था। जैसे मोदी जी के पास ऐसी बातों के जवाब देने के अलावा और कोई काम ही नहीं हो।
लेकिन, सच इससे ठीक उल्टा है। जिस शाम को ट्रंप का ताजा वाला बयान आया, मोदी जी ने खुद बताया कि वह कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर विशाल रोड शो में व्यस्त थे। और अगली सुबह तो जैसा कि खुद मोदी जी ने वीडियो डालकर पूरे देश को दिखाया, मोदी जी सुबह-सुबह हुबली में नौका की सैर का आनंद ले रहे थे। और उसके बाद, जादवपुर विश्वविद्यालय को छात्र-राजनीति से मुक्त कराने का वादा कर रहे थे। (शुक्र है, छोटा भाई की तरह वह छात्र-कार्यकर्ताओं को उल्टा कर के सीधा करने का वादा करने तक नहीं गए।) और फिर तृणमूल के दीपक के बुझने से पहले फड़फड़ाने की भविष्यवाणियां कर रहे थे।
अब मोदी जी देश और भारतीय संस्कृति की सेवा करें और हिंदुओं की रक्षा करें या सोशल मीडिया में आए इसके-उसके बयानों का जवाब देते फिरें?
विरोधी तो जाहिर है कि यह चाहते ही हैं कि मोदी जी का ध्यान, चुनाव में देश की सेवा की तरफ से हट जाए और मोदी जी के चुनावी अश्वमेध का घोड़ा, इस बार भी कोई छत्रप पकड़ कर ले जाए। और फिर मोदी जी को राज्यपाल से लेकर सारी एजेंसियों के जरिए से, अपना अश्वमेध का घोड़ा छुड़वाने के लिए पांच साल तक लड़ाई लड़नी पड़े।
बेशक, हमेशा मोदी जी को पांच साल इंतजार करना ही पड़ता हो ऐसा भी नहीं है। कई बार जो घोड़ा युद्ध से नहीं छुड़ाया जा सकता है, उसे खरीद-फरोख्त से छुड़ाने का भी जुगाड़ बन सकता है। जैसे इस वक्त पंजाब में बनता लग रहा है। आम आदमी पार्टी के दस में सात राज्यसभा सांसदों के मोदी-पार्टी में आने की मिठाई खाने के बाद, अब देश की सेवा के लिए पंजाब की सरकार आप पार्टी से छुड़ाने की तैयारी है। बंगाल के चुनाव से निपटते ही, मोदी जी-शाह जी पंजाब के रण में लगेंगे।
बेशक, बंगाल के रण में लगे हुए भी, वह पंजाब के लिए समय बिल्कुल ही नहीं निकाल रहे हों, ऐसा भी नहीं है। मोदी जी और शाह जी, कई मोर्चे एक साथ संभालना बखूबी जानते हैं। पर अब पंजाब के रण में फुलटाइम लगेंगे। सीबीआइ, ईडी, आयकर, अदालत, चुनाव आयोग सब के साथ।
महाराष्ट्र में शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस की मिल्कियत का मुकद्दमा तो याद होगा; वैसे ही राज्यसभा के सभापति से लेकर, सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग तक, बंटवारे का मुकद्दमा कम से कम पंजाब में अगली सरकार बनने तक तो मोदी जी-शाह जी को व्यस्त रखेगा ही!
हमें पता है कि विरोधी जरूर कहेंगे कि यह सिर्फ चुनाव में व्यस्तता की बात नहीं है। यह तो मोदी जी का कायदा ही हो गया है। बार-बार उनका डियर फ्रेंड ट्रंप भारत का और भारतीयों का अपमान करता है। और मोदी जी के मुंह से डियर फ्रेंड, डियर फ्रेंड के सिवा दूसरा बोल ही नहीं निकलता है। ट्रंप ने भारत को टैरिफ लुटेरा कह दिया, मोदी जी डीयर, डीयर करते रह गए। ट्रंप ने भारतीयों को हथकड़ी-बेड़ियां लगाकर अपने फौजी जहाजों से वापस भेजा, जब मोदी जी अमेरिका में थे, तब भी ऐसे ही भारतीयों को वापस भेजा, मोदी जी के विदेश मंत्री उसको अमेरिका का अपने नियमानुसार काम करना बताते रह गए। ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर जुर्माने के तौर पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया, मोदी जी रूस से तेल खरीदना करीब-करीब बंद करने के बाद, उसके सोशल मीडिया पोस्ट में मोदी मेरे अच्छे मित्र हैं, पर फूलकर कुप्पा होते रहे। ट्रंप ने भारत पर पूरी तरह से इकतरफा व्यापार समझौता थोप दिया, मोदी जी अमेरिका से सहयोग बढ़ने के सपने देखते और दिखाते रहे। और ट्रंप ने जब ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने का दावा कर दिया, मोदी जी बगलें झांकते रह गए। यह तो मोदी जी की आदत ही हो गयी है– ट्रंप भले अपमान पर अपमान करता रहे, मोदी जी खुशामद ही करते रहेंगे।
पर मोदी जी का डीयर फ्रेंड तो इतने पर भी खुश नहीं है। खुद आरएसएस-भाजपा के साझा थिंक टेंक, राम माधव ने अमेरिका में जाकर पूछ दिया कि मोदी जी अब और क्या करें, जिससे ट्रंप जी खुश हो जाएंगे! अमेरिका ने कहा, रूस से तेल मत खरीदो, मोदी जी ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसद टैरिफ लगा दिया, मोदी जी ने चूं भी नहीं की। व्यापार समझौते में भारत पर 18 फीसद टैरिफ लगा दिया, जो पहले औसतन 3 फीसद था, देश में बहुत विरोध हुआ, पर मोदी जी ने कुछ नहीं कहा। मोदी जी और क्या करें, जिससे ट्रंप को संतोष हो जाए कि भारत उसकी इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ कर रहा है।
पर विरोधियों के इस संतोष वाले आइडिया में ही प्रॉब्लम है। यह फ्रेंडशिप की हमारी प्राचीन संस्कृति के खिलाफ है। मोदी जी और ट्रंप जी की पक्की फ्रेंडशिप है। और पक्की फ्रेंडशिप, फ्रेंड के संतोष करने की तलबगार नहीं होती है। फ्रेंड झुका रहा है, हम झुक रहे हैं; फ्रेंड अपमान कर रहा है, हम हंसी में उड़ा रहे हैं, यही तो सच्ची फ्रेंडशिप की निशानी है। ट्रंप जी भारत को भले नर्क कुंड बताएं, ये फ्रेंडशिप मोदी जी नहीं छोड़ेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)
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