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तिरछी नज़र: यूनिवर्सिटी हो तो गोटिया जैसी…

सरकार का कर्तव्य है कि शिक्षा की उन्नति के लिए, देश की प्रसिद्धि के लिए, जेएनयू, जामिया, जाधवपुर जैसे विश्वविद्यालयों को बर्बाद करे और गोटिया जैसी यूनिवर्सिटी को 'सेंटर फॉर एक्सीलेंस' घोषित करे।
AI SUMMIT

यूनिवर्सिटी हो तो गोटिया जैसी हो, नहीं तो हो ही नहीं। जी हाँ आपने ठीक ही पढ़ा। मैंने यही कहा है, यूनिवर्सिटी गोटिया जैसी ही होनी चाहिए। ऐसी यूनिवर्सिटी जो विश्व प्रसिद्ध हो। ऐसी यूनिवर्सिटी जो देश का नाम दुनिया भर में रोशन कर सके। ऐसी यूनिवर्सिटियां ही देश को विश्व गुरु बना सकती हैं। 

गोटिया यूनिवर्सिटी ने कुछ ऐसा किया कि वह विश्व प्रसिद्ध हो गई। यूनिवर्सिटी ने पहले भी कोशिशें की थीं पर उनमें कोई न कोई कमी रह गई थी कि यूनिवर्सिटी विश्व प्रसिद्ध नहीं बन पाई। पत्र पत्रिकाओं में पूरे पूरे पेज के, दो दो पेज के विज्ञापन छपवाये। उनके बल पर प्राइवेट यूनिवर्सिटियों की रैंकिंग में उच्च स्थान प्राप्त किया पर वह बात नहीं बन पाई जो बननी चाहिए थी।

बहुत सारे पेटेंट भी रजिस्टर करवाए। ढाई तीन हज़ार तो करवा ही दिये होंगे। सारी महान प्राइवेट यूनिवर्सिटियां इतने ही पेटेंट रजिस्टर करवाती हैं। जबकि किसी भी आईआईटी के पेटेंट कुछ सौ में ही होते हैं। तो इस मामले में भी गोटिया टॉप के विश्वविद्यालयों में रही। पर यह पराक्रम भी केवल विज्ञापनों में लिखने के काम ही आया। न तो प्रसिद्धि ही मिल पाई और न ही पेटेंट स्वीकृत हो पाए। विश्व की निगाहों से भी दूर ही रही।

अपने छात्रों को सरकार की विरोधी पार्टी के प्रचार में भी भेज दिया। छात्रों को मुद्दा तक नहीं बताया गया पर अच्छे नंबर का भरोसा तो दिलाया ही गया होगा। कुछ पत्रकार ने छात्रों की 'बाइट' ली और कार्यक्रम में चला दी। प्रसिद्धि तो मिली पर जरा कम रह गई।

फिर आया एआई समिट। ग्लोबल समिट। नाम था– इंडिया एआई इम्पेक्ट समिट। समिट में प्रसिद्धि लायक बहुत कुछ हुआ। सरकार जी का फोटो सेशन हुआ। समिट में भाग लेने वाले लोगों के स्टाल से सामान चोरी हो गया। समिट एआई की थी पर वाइफाई नहीं था, इंटरनेट नहीं था। 'डिजिटल इंडिया' में एआई समिट में डिजिटल लेन देन गायब था। घोर अव्यवस्था का आलम था। कांग्रेस का टी शर्ट उतार प्रदर्शन हुआ। इन सब की चर्चा तो हुई पर उतनी नहीं कि एआई समिट विश्व प्रसिद्ध हो पाती।

इस समिट को विश्व भर में प्रसिद्धि मिली गोटिया यूनिवर्सिटी से। खबर है कि चार पांच आईआईटीयों को मिला कर इतना बड़ा पेवेलियन नहीं मिला था जितना बड़ा अकेले गोटिया यूनिवर्सिटी को मिला। एआई के फील्ड में गोटिया ने काम ही इतना अधिक किया है कि इतना बड़ा पेवेलियन तो बनता ही था। गोटिया ने आर्टिफिशल इंटेलिजेंट और डाटा साइंस के लिए साढ़े तीन सौ करोड़ खर्च करने की बात कही। 

गोटिया यूनिवर्सिटी ने वह किया जो आजकल देश भर में हो रहा है। 'मेक इन इंडिया' के नाम पर हो रहा है। डिब्बे और लेबल अधिक बन रहे हैं, सामान कम बन रहा है। बाहर से सामान मंगवा कर उसे अपने डिब्बे में, अपना लेबल लगा पैक करना हो रहा है। सब यही कर रहे हैं और गोटिया ने भी यही किया। उसने चीन से एक रोबोट कुत्ता मंगवा कर उसे अपने यहाँ बना बता दिया। इससे एआई समिट को ही नहीं, गोटिया यूनिवर्सिटी को भी पूरे देश में ही नहीं, विश्व भर में प्रसिद्धि मिली।

तो देश की सरकार का, सरकार जी की सरकार का कर्तव्य है कि शिक्षा की उन्नति के लिए, देश की प्रसिद्धि के लिए, जेएनयू, जामिया, जाधवपुर जैसे विश्वविद्यालयों को बर्बाद करे, आईआईटी और ऐसे उच्च संस्थानों में गोमूत्र और गोबर पर अनुसंधान करवाए और गोटिया जैसी यूनिवर्सिटी को 'सेंटर फॉर एक्सीलेंस' घोषित करे। देश इसी से आगे बढ़ेगा और विश्व गुरु बनेगा। इसीलिए तो में कहता हूँ, यूनिवर्सिटी हो तो गोटिया जैसी हो, नहीं तो हो ही नहीं। 

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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