कटाक्ष: मास्टर स्ट्रोक ही मास्टर स्ट्रोक, गिन तो लें!
ये लो कर लो बात। कहां तो मोदी जी डाइरेक्ट ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियां से बात कर रहे हैं। ईद तो ईद, नौरोज तक की बधाइयां दे रहे हैं और वह भी सिर्फ राष्ट्रपति को ही नहीं, ईरान की सरकार और जनता को भी। जिनके सिर पर दिन-रात बम बरस रहे हैं, उनके लिए नये वर्ष के शांति से भरा होने की कामनाएं कर रहे हैं।
और हां! अगर यह सब फोन पर ही झप्पी-पप्पी करने के बराबर ही मान लिया जाए तब भी, मोदी जी इतने पर ही रुक नहीं गए हैं। वह पश्चिम एशिया में तनाव और टकराव बढ़ने पर गहरी चिंता भी जता रहे हैं।
इस इलाके में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर तमाम हमलों की निंदा कर रहे हैं। चेता रहे हैं कि ऐसी हरकतों से सारी दुनिया की खाद्य तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिए और दुनिया भर में कृषि निर्यातों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। होर्मुज की खाड़ी की सुरक्षा बनी रहना सुनिश्चित करने और फारस की खाड़ी में नौवहन की आजादी सुनिश्चित करने का महत्व समझा रहे हैं। इस सिलसिले में विभिन्न विश्व नेताओं से अपनी बातचीत होने का हवाला भी दे रहे हैं। और तो और इसका ज्ञान भी दे रहे हैं कि युद्ध का रास्ता चुनना किसी के भी हित में नहीं है। आखिर में इसका उपदेश भी दे रहे हैं कि सभी पक्षों को जितना जल्दी हो सके, शांति की ओर बढ़ना चाहिए। और ये नासमझ बल्कि नालायक विपक्षी उसी बीती बात पर अटके हुए हैं--क्या मोदी जी ने ईरान पर अमरीका-इस्राइल के हमले की निंदा की? क्या मोदी जी ने ईरान के सुप्रीम लीडर समेत कई नेताओं की चुन-चुनकर हत्या किए जाने की निंदा की? क्या मोदी जी ने बच्चियों के एक स्कूल समेत, ईरान में हजारों नागरिक ठिकानों पर अमरीकी-इस्राइली हमलों की निंदा की? नहीं की!
पहले हफ्ते न बात की न निंदा की। दूसरे हफ्ते में बात की पर निंदा नहीं की। तीसरे हफ्ते के आखिरी दिन फिर बात की, पर निंदा फिर भी नहीं की। तीन हफ्ते निकाल दिए, पर निंदा फिर भी नहीं की!
अब मोदी जी का विरोध करने वाले इन पप्पुओं को कोई कैसे समझाए कि यह कोई चूक नहीं, मास्टर स्ट्रोक है, मोदी जी का नया मास्टर स्ट्रोक! देखा नहीं, कैसे हमले के दो दिन पहले, जब मोदी जी ने इस्राइल का दौरा किया, नेतन्याहू के साथ झप्पी-पप्पी की, इस्राइल की संसद में भाषण दिया और बदले में उससे एकदम नया-निकोरा मैडल वसूल किया, तब यही विरोधी क्या कह रहे थे--मोदी जी ने भारत को नेतन्याहू के पाले में भर्ती करा दिया। और जब अमरीका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया और उसके कई नेताओं को चुन-चुनकर मार दिया और मोदी जी ने फिर भी निंदा का एक शब्द तक नहीं कहा, तब वही विरोधी शर्म-शर्म के नारे लगा रहे थे। जब मोदी जी ने पहले हफ्ते में नेतन्याहू समेत, खाड़ी देशों के नेताओं से बात की और उन पर हमले की निंदा की, पर ईरान के नेताओं से न बात की और न ईरान पर हमले की निंदा की, तब यही विरोधी इसे विश्वासघात बता रहे थे। लेकिन, जब दूसरे हफ्ते में मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति से बात तो की, पर बाकी सब किया लेकिन अमरीकी-इस्राइली हमले की निंदा नहीं की, तब वही विरोधी गैस की तंगी, तेल की तंगी का शोर मचा रहे थे और होर्मुज के फंदे से टैंकर छुड़ाने की गुहार लगा रहे थे।
और अब जब तीसरे हफ्ते में मोदी जी ने फिर बात की है, पर हमले की निंदा अब भी नहीं की है, तो विरोधी इसकी शिकायतें कर रहे हैं कि हमारे ढाई दर्जन टैंकर अब भी होर्मुज में क्यों अटके पड़े हैं? और इसकी शिकायतें भी कि गैस के बाद अब तेल के दाम बढ़ने वाले हैं। बस जरा विधानसभाई चुनावों का अगले महीने वाला चक्र निकल जाए। देखा, मोदी जी ने कैसे तीन हफ्ते में ही विरोधियों के तीरों को विदेश नीति से हटाकर, तेल-गैस के दाम की तरफ मोड़ दिया।
पर असली मास्टर स्ट्रोक इतना ही नहीं है। सब किया पर मोदी जी ने निंदा का एक शब्द अपनी जुबान से नहीं आने दिया, डियर फ्रेंड ट्रंप और डियर फ्रेंड नेतन्याहू की दोस्ती में, बाल बराबर दरार नहीं आने दी। खाड़ी वाले दोस्तों की भी दोस्ती और पुख्ता कर लिया। पर ईरान के राष्ट्रपति को भी फोन किया और उसे भी बहुत नाराज नहीं किया। नतीजा! होर्मुज में फंसे गैस के अपने दो जहाज भी निकलवा लाए। अमरीका से इसकी इजाजत भी ले आए कि भारत, एक महीने तक वह रूसी तेल खरीद सकता है, जो पहले ही जहाजों पर लदा हुआ है और समुद्र में है।
और अब तक तो अमरीका ने ईरान से भी उसका तेल लेने की इजाजत दे दी है, जो पहले से जहाजों पर लदा हुआ है। बल्कि हम तो कहेंगे कि ईद-नवरोज की मुबारकबाद के बाद, मोदी जी होर्मुज से भारत के दो-चार और कंटेनर तो निकलवा ही लाएंगे। यानी लड़ने वाले भले ही लड़ते रहें, भारत तक तेल और गैस आता रहेगा, रूस और ईरान से भी और वह भी ट्रंप साहब की इजाजत से! इससे बड़ा मास्टर स्ट्रोक क्या होगा!
फिर भी मास्टरस्ट्रोक इतना ही नहीं है। ट्रंप-नेतन्याहू से मोदी जी की दोस्ती बनी ही रही है और ईरान वालों से भी उन्होंने ज्यादा दुश्मनी नहीं होने दी है। फिलहाल ब्रिक्स का अध्यक्ष होने से मोदी जी के भारत ने, उसके मंच से अमरीका-इस्राइल के हमले की निंदा नहीं होने दी है। पर ईरान वालों की इसकी उम्मीद भी बनाए रखी है कि ब्रिक्स कम से कम अपने सदस्य के नाते ईरान पर, हमले की निंदा करेगा। और जल्दी न भी सही, तब भी कभी न कभी तो, सुलह की बात चलेगी ही और सुलह के लिए बीच-बचाव करने वाले की जरूरत भी पड़ेगी ही। उस समय बीच-बचाव करने के लिए मोदी जी से बेहतर स्थिति में कौन होगा--जिसे हमला करने वाला भी अपना संगी माने और हमले का मुकाबला करने वाला भी अपना दुश्मन नहीं माने।
आखिरकार, भागवत जी ने एंवें ही थोड़े कह दिया है कि सारी दुनिया कह रही है कि इस युद्ध को कोई रुकवा सकता है, तो मोदी जी का भारत ही रुकवा सकता है। मोदी जी को युद्ध रुकवाने का वैसे भी काफी एक्सपीरिएंस भी तो है। चौबीस घंटे के लिए ही सही, रूस-यूक्रेन युद्ध तो मोदी जी ने रुकवाया ही था, जैसा राजनाथ सिंह तक कह चुके हैं। ऑपरेशन सिंदूर की लड़ाई भी वैसे रुकवायी तो मोदी जी ने ही थी, यह दूसरी बात है कि मोदी जी ने शांति के नोबेल पुरस्कार के चक्कर में ट्रंप को इसका श्रेय छीन लेने दिया। पर इस बार नहीं। वॉर जब भी रुके इस बार मोदी जी उसे रुकवाना अपने नाम करा के रहेंगे। आखिर, विश्व गुरु की गद्दी का सवाल है। यह होगा सारे मास्टरस्ट्रोकों का मास्टरस्ट्रोक।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)
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