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तिरछी नज़र: संस्कार विहीन जेन ज़ी और संस्कारवान कांवड़िए

सरकारें इनसे ख़ुश रहती हैं। ख़ुश रहती हैं क्योंकि ये महंगाई पर सवाल नहीं उठा रहे होते हैं, ये बेरोज़गारी पर बात नहीं कर रहे होते हैं। इनको शिक्षा से भी कोई मतलब नहीं होता है…
kanwadie
कांवड़ खंडित होने के आरोप में हरिद्वार के पास गाड़ी तोड़ते कांवड़िए। फ़ोटो आज तक से साभार

देश में, पूरे देश में भले ही न हो पर देश के एक बड़े भू भाग में, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, हरियाणा में, राजस्थान और एनसीआर में एक बहुत बड़ा संस्कारी आंदोलन चल रहा है। यह हर वर्ष सावन के महीने में चलता है, मतलब होता है। यह संस्कारी आंदोलन है, कांवड़ यात्रा। यह जंतर मंतर जैसे संस्कार विहीन आंदोलन से बिल्कुल ही अलग है।

ये जो जंतर मंतर पर आंदोलन हो रहा था बिल्कुल संस्कार विहीन था। संस्कारहीन जेन ज़ी (Gen Z) द्वारा किया गया था। उस आंदोलन को करने वाली जेन ज़ी इन सरकार जी के समय में ही समझदार हुई है। सरकार जी के समय में ही आंखें खोलीं और इसने सरकार जी के ही भाषण सुने हैं। उसने देखा है कि सरकार जी स्वयं पहले के सरकारजियों को कितना खुल कर गालियां देते हैं, संसद तक में देते हैं। उसने देखा और सुना कि सरकार जी की पार्टी के नेता कितनी भद्दी भाषा बोलते हैं। और जो उसने देखा और सुना, वही ग्रहण कर लिया।

सरकार जी एक नेता की माता को जर्सी गाय, एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री की विधवा को कांग्रेस की विधवा बोलते हैं। सरकार जी की पार्टी के लोग उसी महिला को बार बाला बोलते हैं। सरकार जी उसी माँ के बेटे को हाइब्रिड औलाद की गाली देते हैं। सरकार जी एक राज्य की चुनी हुई मुख्यमंत्री को मंच से टपोरियों की तरह, दीदी! ओ दीदी! पुकारते हैं। संसद में विपक्ष की किसी नेता को सूपर्णखा बोला जाता है तो किसी सांसद को आतंकवादी। देश के पहले प्रधानमंत्री को अय्याश बोला जाता है। बच्चे तो बच्चे होते हैं। बड़ों को जो करते देखते हैं, सीख लेते हैं। बल्कि उत्साह में और बढ़ कर करते हैं।

लेकिन बात तो हम कांवड़ यात्रा की कर रहे थे। उसकी वजह से देश के उस हिस्से की जान सांसत में रहती है जहाँ जहाँ से ये कांवड़ यात्रा गुजरती है। आप चलते चलते कांवड़ या कांवड़िये से टकरा गए तो आपके व्हीकल की तोड़ फोड़ तो होगी ही, आप की जान भी खतरे में पड़ जाएगी। पुलिस और सेना के जवानों तक को ये लोग नहीं छोड़ते हैं। छात्र-छात्राओं के ले जा रही स्कूल वैन को भी इन्होंने नहीं छोड़ा।

सरकारें इनसे ख़ुश रहती हैं। ख़ुश रहती हैं क्योंकि ये महंगाई पर सवाल नहीं उठा रहे होते हैं, ये बेरोजगारी पर बात नहीं कर रहे होते हैं। इनको शिक्षा से भी कोई मतलब नहीं होता है। इसलिए सरकार इनकी सेवा में जुटी रहती हैं। वह सरकार जिसे सड़क पर दस-पंद्रह मिनट की नमाज से दिक्कत होती है, इनके लिए बाकी लोगों के रास्ते बंद कर देती है। जगह जगह कावड़ शिविर लगाती है। मुफ्त खाना, मुफ्त ठहरना और मुफ्त का नाच गाना। पुलिस के आला अफसर, मंत्री और मुख्यमंत्री इन पर पुष्प वर्षा करते हैं। जिन जिन जिलों से ये गुजरते हैं, सरकार वहाँ के स्कूल कॉलेज आठ दस दिन के लिए बंद कर देती है। क्या पता, इन कांवड़ियों का गुस्सा स्कूल वैन पर ही उतर जाए।

स्कूल बंद होने से ध्यान आया, हमारी सरकार तो एक लाख के करीब सरकारी स्कूल परमानेंटली बंद कर चुकी है। पढ़ना है तो अपने खर्चे से प्राइवेट स्कूल में पढ़ो। सरकार का काम सिर्फ महंगाई बढ़ाना है, जीएसटी और इनकम टैक्स वसूलना है, और हाँ, जरा सी बारिश में बह जाने वाली सड़कों पर टोल टैक्स वसूलना है। बाकी पढ़ाई-लिखाई, रोजगार ढूंढना और इलाज कराना है तो अपने आप करो। और हाँ, सरकार ने एक काम और अपने हाथ ले लिया है। वही काम जो पहले बेईमान व्यापारी किया करते थे, अब सरकार अपने आप करती है। वह काम है मिलावट करना। पेट्रोल में एथनोल और डीज़ल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के बाद खबर है कि अब पीएनजी में बायोगैस मिलाई जाएगी।

यह भटकाव बहुत ही गलत है। बात मैं पढ़ाई की कर रहा था, स्कूलों के बंद होने की कर रहा था, सरकार के द्वारा की जा रही मिलावट पर आ गया। 

किसी भी देश द्वारा शिक्षा के महत्व को मानने पर एक कहानी याद आ रही है। यह कहानी उस देश के बारे में है जिस देश से तकनीकी और पैसा उधार ले कर सरकार जी पिछले दस सालों से बुलेट ट्रैन बना रहे हैं। सरकार जी जो करते हैं योजना बना कर करते हैं। 2019 के चुनाव से पहले पुलवामा-बालाकोट हुआ। 2024 से पहले राम मंदिर और अब 2029 के आम चुनाव से पहले बुलेट ट्रेन चलाई जाएगी।

जी हाँ, आप ठीक समझे। कहानी जापान की है। कहानी ये है कि जापान के एक छोटे से गांव से एक रेलगाड़ी चला करती थी। अधिकारियों ने देखा कि उस रेलगाड़ी में रोज सिर्फ एक मुसाफिर यात्रा करता है। सुझाव आया कि इस रेलगाड़ी को बंद कर दिया जाए। यह फायदे का सौदा नहीं है। जाँच हुई तो पता चला कि उस ट्रेन से सिर्फ एक छात्रा सफर करती है। वह उससे स्कूल जाती है और स्कूल से आती है। अगर वह ट्रेन बंद हो गई तो उसका स्कूल जाना भी बंद हो जायेगा। वह ट्रेन बंद नहीं हुई। तबतक चलती रही जबतक वह स्कूल जाती रही। और हमारे यहाँ, स्कूल बंद कर दिये गए कि इसमें मात्र सौ बच्चे पढ़ते हैं। सरकार जी, जापान से सिर्फ बुलेट ट्रेन की तकनीकी मत उधार लीजिये, कुछ शिक्षा के महत्व के बारे में भी सीखिये।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं)

 

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