Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

ख़बरों के आगे-पीछे: अब प्रदर्शनकारियों को डराने का अभियान

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन बता रहे हैं कि कैसे देश में नए आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है। साथ ही वे जेन ज़ी आंदोलनकारियों के साथ मोदी सरकार की बदले की कार्रवाई पर भी बात कर रहे हैं।
protest

कॉकरोच के बाद अब ई-20 पार्टी तैयार 

सरकार अभी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से मिले जख्मों को सहला ही रही है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 पेट्रोल के खिलाफ आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए ई-20 पार्टी का गठन हो गया है। इस पार्टी को सोशल मीडिया में पर्याप्त समर्थन भी मिल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी की तरह तो नहीं लेकिन इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से माइलेज और इंजन की परेशानी झेल रहे आम लोग इसके खिलाफ आवाज उठाने को तैयार है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में ई-20 पार्टी के लोग भी प्रदर्शन कर सकते हैं। हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन ने सरकार को आगाह कर दिया है। इसलिए संभव है कि उनको जंतर मंतर पर प्रदर्शन की इजाजत नहीं मिले। लेकिन ई-20 पार्टी की तैयारी पूरे देश में आंदोलन की है। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल भी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के खिलाफ सर्वाधिक मुखर होकर केंद्र सरकार पर हमले कर रहे हैं। बहरहाल इस मुद्दे आंदोलन भी सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द साबित होने वाला है। पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में ऐसे अनेक लोग सामने आ रहे हैं, जो बता रहे हैं कि कैसे उनकी 20 लाख या 50 लाख या डेढ़ करोड़ की गाड़ी ई-20 पेट्रोल की वजह से खराब हो गई। यह आम लोगों से जुड़ा मामला है। इसीलिए सरकार अभी से डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। लोगों को समझाने से लेकर डराने तक के उपाय किए जा रहे हैं।

अब प्रदर्शनकारियों को डराने का अभियान

छात्रों और युवाओं के आंदोलन से घबरा कर केंद्र सरकार ने फौरी तौर पर उनकी मांगे तो मान ली लेकिन लगता है कि उन मांगों पर पूरी तरह अमल करने का सरकार का इरादा नहीं है। अब कई तरह के अगर-मगर किए जा रहे हैं और दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता व अन्य छात्र नेता परेशान हैं कि अब क्या करें? असल में आंदोलनकारियों की अनुभवहीनता का सरकार ने फायदा उठाया। इसलिए कांस्टीट्यूशन क्लब में दूसरी बार की वार्ता से पहले जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया और सरकार ने नीट यूजी परीक्षा पेपर लीक के बाद जान गंवाने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा देने और प्रदर्शनकारियों पर से मुकदमे हटाने की सहमति दी तो छात्र नेता खुश हो गए और उन्होंने प्रदर्शन खत्म करने का ऐलान कर दिया। उसके बाद 24 घंटे में सरकार ने जंतर मंतर से इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के नामोनिशान मिटा दिए। अब समस्या यह आ रही है कि अभी तक न तो मुआवजा देने के मामले में कोई पहल हुई है और न छात्रों पर से बिना शर्त मुकदमे वापस हुए हैं। उल्टे सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई शर्त के बाद अब सरकार भी आनाकानी कर रही है। अभी 18 साल से कम उम्र के ऐसे प्रदर्शनकारियों की रिहाई हो रही है, जिनके ऊपर पहले से कोई मुकदमा नहीं है। 

सवाल है कि 18 साल से ऊपर के उन लोगों का क्या होगा, जिनके ऊपर पहले से कोई मुकदमा नहीं चल रहा है

प्रधान ने जवाबदेही कुबूल नहीं की 

धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से आखिरकार इस्तीफा दिया। लेकिन उन्होंने इस्तीफा देश के युवाओं और प्रदर्शन कर रहे लोगों पर एहसान करने के अंदाज में दिया। उन्होंने किसी बात की जवाबदेही नहीं ली। प्रधानमंत्री को लिखा इस्तीफे का पत्र तो सामान्य फॉर्मेट में था, लेकिन 'युवा साथियोके नाम दो पन्नों की चिट्ठी में उन्होंने बताया कि शिक्षा के मामले में और युवाओं के मामले में उनका कितना बड़ा योगदान है। प्रधान ने इस्तीफा देने का कारण यह बताया कि छात्रों और युवाओं के आंदोलन का दुरुपयोग हो सकता है। यानी उनसे कोई गड़बड़ी नहीं हुई फिर भी इस्तीफा इसलिए दे रहे हैं क्योंकि यह आशंका है कि प्रदर्शन का बेजा इस्तेमाल कर अराजक गतिविधियों को अंजाम दिया जा सकता है। 

याद करें कि कैसे नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लिया था। उन तीन कानूनों के खिलाफ किसान एक साल से आंदोलन कर रहे थे और करीब सात सौ लोग उसमें अपनी जान गंवा चुके थे। सरकार ने इसका कोई संज्ञान नहीं लिया था। लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब का चुनाव नजदीक आया तो प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय टीवी पर आकर देश को संबोधित किया और तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया। उस समय भी उन्होंने नहीं स्वीकार किया कि कानूनों में कोई कमी है। उन्होंने कहा कि तपस्या में कोई कमी रह गई होगी कि किसान समझ नहीं पाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि तीनों कानून किसानों की भलाई के लिए थे। लेकिन किसानों को गुमराह किया जा रहा है, जिसकी वजह से वे इसका विरोध कर रहे है। इसलिए सरकार इसे वापस ले रही है। 

क्या स्थिति है जस्टिस यशवंत वर्मा की?

यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? सवाल यह भी है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से होली के दिन कथित रूप से जले हुए नोट बरामद होने की घटना को डेढ़ साल हो गया, लेकिन यह पता ही नहीं चल रहा है कि इस मामले मे क्या होना है

सुप्रीम कोर्ट ने घटना के तुरंत बाद एक कमेटी बना कर जांच कराई थी, जिसने कहा था कि नोट उनके घर से बरामद हुए थे। उसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया। उन्हें बिना कोई काम दिए अदालत में रखा गया। इधर संसद में महाभियोग का प्रस्ताव स्वीकार कर जजेज इन्क्वायरी एक्ट के हिसाब से स्पीकर ने जांच कमेटी भी बना दी। कुछ दिन पहले जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा भी दे दिया। सवाल है कि क्या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है

एक रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट और भारत सरकार के न्याय विभाग के रिकॉर्ड में वे आज भी जज हैं। अगर ऐसा है तो इसका अर्थ है कि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है। इसीलिए सवाल है कि क्या वे महाभियोग के जरिए हटाए जाएंगे? यह भी सवाल है कि अगर इस्तीफा स्वीकार हो जाएगा तो क्या महाभियोग की प्रक्रिया समाप्त कर दी जाएगी?

मोदी के शिक्षा मंत्रियों का हाल

धर्मेंद्र प्रधान नरेंद्र मोदी सरकार के चौथे शिक्षा मंत्री हैं, जो बड़े बेआबरू होकर सत्ता के कूचे से निकले हैं। इससे पहले के तीन मंत्रियों की विदाई भी सम्मानजनक नहीं थी और न विदा होने के बाद किसी का पुनर्वास हुआ। 2014 में सरकार बनने के बाद स्मृति ईरानी पहली शिक्षा मंत्री बनी थीं, जिनकी अपनी शिक्षा का कोई खास रिकॉर्ड नहीं था। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे खूब विवादों में रहीं और शिक्षा मंत्रालय से विदा हुईं तो थोड़े समय कपड़ा मंत्रालय में रहीं और फिर 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद से अब तक राजनीतिक बियाबान में हैं। जब वे शिक्षा मंत्रालय से हटी तो उनकी जगह प्रकाश जावडेकर को शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे करीब तीन साल तक शिक्षा मंत्री रहे। मई 2019 में शिक्षा मंत्री से हटने के बाद करीब दो साल सूचना व प्रसारण मंत्री रहे। लेकिन 2021 के बाद वे राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो गए। उनके बाद रमेश पोखरियाल निशंक को शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे शिक्षा मंत्रालय से हटे तो सरकार से ही विदा हो गए और पिछले लोकसभा चुनाव में तो उन्हें टिकट तक नहीं मिली। 

उनके बाद धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री बने। अब वे भी विदा हो गए हैं। वे ओडिशा से लोकसभा का चुनाव जीते हुए हैं। इसलिए 2029 तक सांसद रहेंगे ही। इस बीच देखना होगा कि नई दिल्ली या ओडिशा में उनका पुनर्वास होता है या नहीं। इसीलिए नए शिक्षा मंत्री को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। शिक्षा मंत्रियो के ऐसे हश्र को देखते हुए कौन मंत्री बनना चाहेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest