आधुनिक युद्ध: अमेरिका-इज़राइल के ख़िलाफ़ ईरान की अलग रणनीति की जंग
अमेरिका-ईरान युद्ध को अब लगभग दो महीने हो रहे हैं, और इस्लामाबाद की शांति वार्ता अटकी हुई है। दोनों पक्षों के बीच एक असहज युद्धविराम है, लेकिन दक्षिणी लेबनान में इज़राइल के हमले जारी हैं, जो पूरी तरह इस युद्धविराम का उल्लंघन हैं। दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा युद्धविराम है जिसमें अमेरिका मानता है कि उसे फ़ारस की खाड़ी में ईरान जाने वाले जहाज़ों को रोकने का अधिकार है—और इन कार्रवाइयों को युद्ध की कार्रवाई नहीं माना जाना चाहिए, भले ही अंतरराष्ट्रीय कानून इन्हें युद्ध की कार्रवाई मानता हो।
ईरान ने कहा है कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नाकेबंदी लगाना, जैसा कि अमेरिका ने किया है, युद्धविराम का उल्लंघन है, और वह ऐसे ख़तरों के बीच बातचीत नहीं करेगा। उसने हॉर्मुज़ पर अपनी पहले की नाकेबंदी भी फिर से लागू कर दी है, जिसे उसने युद्धविराम की घोषणा के साथ हटा लिया था।
इस युद्ध ने असममित (Asymmetric) यानी अलग रणनीति के युद्ध की प्रकृति को भी उजागर किया है। मैंने पहले लिखा था कि कैसे ड्रोन ने युद्ध की प्रकृति बदल दी है और देशों या समूहों को ताकतवर सेनाओं के ख़िलाफ़ असममित तरीके से लड़ने में सक्षम बनाया है। ऐसे ड्रोन युद्ध की कुंजी यह है कि एक साधारण मोबाइल फोन में मौजूद खुफिया क्षमता को मूल रूप से शौक़िया इस्तेमाल होने वाले मॉडल हवाई जहाज़ के साथ जोड़ दिया जाए। ईरान की मिसाइलें भी बेहद प्रभावी रही हैं, और अपने ड्रोन के साथ मिलकर उन्होंने चार THAAD AN/TPY-2 रडार सिस्टम (जिनकी कीमत आधा से 1 अरब डॉलर के बीच है) और क़तर के अल-उदीद एयर बेस पर मौजूद AN/FPS-132 अर्ली वार्निंग रडार (जिसकी कीमत 1.1 अरब डॉलर है) को नष्ट किया है।
यमन के हूतियों ने ड्रोन युद्ध के महत्व को दिखाया जब उन्होंने सऊदियों का सामना किया और सिर्फ़ उनके सैन्य ठिकानों ही नहीं बल्कि उनकी रिफाइनरियों और हवाई अड्डों पर भी हमले किए। हूती न केवल अमेरिका के उन प्रयासों को झेलने में कामयाब रहे हैं जिनका मकसद इज़राइल जाने वाले जहाज़ों पर लाल सागर की नाकेबंदी हटवाना था, बल्कि उन्होंने महंगे MQ-9 रीपर ड्रोन (करीब 15-22) भी मार गिराए हैं और अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत यूएसएस हैरी एस ट्रूमैन पर भी हमला किया है।
हूतियों द्वारा लाल सागर की नाकेबंदी—जो हॉर्मुज़ की तरह एक अहम संकीर्ण मार्ग (चोक पॉइंट) है—का मतलब यह हुआ कि बहुत कम जहाज़ लाल सागर के रास्ते इज़राइल पहुंचने की हिम्मत कर पाए, जिससे उसके प्रमुख बंदरगाह ईलात को बंद करना पड़ा। इस समय अमेरिकी विमानवाहक पोत जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश अफ्रीका के केप ऑफ़ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाकर फ़ारस की खाड़ी जा रहा है और छोटे रास्ते—लाल सागर—से बच रहा है, शायद इसलिए कि वह हूतियों को उनके इलाके में चुनौती नहीं देना चाहता।
मौजूदा युद्ध को समझने के लिए—एक ऐसा युद्ध जिसकी तैयारी इज़राइल और अमेरिका लंबे समय से कर रहे थे—हमें तीन पहलुओं को देखना होगा। पहला, पश्चिम एशिया की राजनीति और कैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे इस तरह बनाया गया कि इस क्षेत्र पर पश्चिमी नियंत्रण इज़राइल के ज़रिये बना रहे।
दूसरा, कैसे तथाकथित तेल-समृद्ध देशों—बहरीन, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात—को मूल रूप से सऊदी अरब से अलग कर बनाया गया, और कुवैत को इराक और सऊदी अरब से अलग किया गया। यह नक्शानवीसी के ज़रिये किया गया औपनिवेशिक विभाजन था, खासकर ब्रिटिशों द्वारा, ताकि पश्चिम एशिया के तेल पर उनका नियंत्रण बना रहे। बदले में सऊदी अरब को मक्का और मदीना दिए गए, जबकि मक्का के शरीफ़ के बेटों को “इनाम” के तौर पर जॉर्डन और इराक दिया गया।
तीसरा, अमेरिका ने ब्रिटेन और फ्रांस की जगह लेकर इस क्षेत्र में औपनिवेशिक ताकत की भूमिका निभानी शुरू की। सऊदी अरब—जो अब भी पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है—ने अपने तेल की कीमतों को अमेरिकी डॉलर से जोड़ने पर सहमति दी, जिससे डॉलर दुनिया की आरक्षित मुद्रा बन गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ईरान लगभग ब्रिटेन का उपनिवेश था और उसका तेल ब्रिटिश पेट्रोलियम के “कब्जे” में था। मोहम्मद मोसद्देक, जो ईरान के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री थे, ने 1951 में ब्रिटिश पेट्रोलियम का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान की पहली लोकतांत्रिक सरकार को गिरा दिया और उसकी जगह अपने समर्थक रज़ा शाह पहलवी को बैठा दिया, जिन्होंने अमेरिकी समर्थन से एक कठोर तानाशाही चलाई। 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति में शाह को हटा दिया गया, जिसके बाद अमेरिकी दूतावास की 444 दिनों तक घेराबंदी हुई—जिसे अमेरिका आज तक न भूला है, न माफ़ किया है।
भारत के लिए यह समझना ज़रूरी है कि पश्चिम एशिया में ब्रिटिश ताकत काफी हद तक ब्रिटिश भारतीय सेना पर टिकी थी, और नए तेल-समृद्ध देशों की सीमाएं तय करने वाले नक्शे भी भारतीय नक्शानवीसों ने बनाए थे। यह ब्रिटिश उपनिवेशवाद की दूसरी कहानी है, जिसने भारतीय सैनिकों और भारत के सामंती शासकों के सहारे अपना साम्राज्य खड़ा किया। भारत के नवाबों और राजाओं ने ही अपने देश को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया था। आज भी इस क्षेत्र से भारत का गहरा संबंध है, और वहां काम करने वाले भारतीय बड़ी मात्रा में धन भारत भेजते हैं, जो हमारे व्यापार घाटे को कम करने में मदद करता है।
ईरान ने बहुत पहले समझ लिया था कि वह पारंपरिक युद्ध में अमेरिका और इज़राइल का सामना नहीं कर सकता। उसके पास लगभग न के बराबर वायुसेना और नौसेना थी। डोनाल्ड ट्रंप के यह दावे कि उन्होंने ईरान की वायुसेना और नौसेना नष्ट कर दी, उनके बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों का हिस्सा हैं।
वैश्विक व्यापार से अलग-थलग और तकनीकी प्रतिबंधों से घिरा होने के बावजूद, ईरान ने एक अलग तरह का रक्षा ढांचा बनाया। उसने ड्रोन और मिसाइलों पर ध्यान केंद्रित किया और पिछले कई दशकों से सस्ते ड्रोन विकसित किए, जिन्हें युद्ध के लिए ढाला गया।
शाहेद ड्रोन मूल रूप से छोटे प्रोपेलर-चालित ढांचे हैं, जिनमें या तो दहन इंजन (लंबी दूरी के लिए शाहेद-136) या इलेक्ट्रिक मोटर (कम दूरी के लिए शाहेद-131) होता है। इन्हें ट्रकों पर लगाकर 10-15 मिनट में दागा जा सकता है। छोटे और फुर्तीले होने के कारण इन्हें उन्नत रक्षा प्रणालियों के लिए भी पकड़ना और गिराना मुश्किल होता है। रूस और अमेरिका समेत कई देशों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे अधिकांश ड्रोन इन्हीं पर आधारित हैं। रूस ने इन्हें बदलकर “गेरान-1” और “गेरान-2” नाम दिया, जबकि अमेरिका ने मार्च 2026 में संशोधित संस्करण “लुकास” के नाम से पेश किया। हॉर्मुज़ की नाकेबंदी केवल ड्रोन और तोपखाने से नहीं, बल्कि बिना चालक वाली नावों और पानी के नीचे चलने वाले उपकरणों से भी की जा रही है।
इज़राइल पर मिसाइल हमलों ने भारी नुकसान पहुंचाया है और उसकी “अभेद्य” मानी जाने वाली मिसाइल रक्षा प्रणाली को भी भेद दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, “...युद्ध की शुरुआत में केवल 5% मिसाइलें इज़राइल तक पहुंचती थीं, लेकिन अंत तक यह आंकड़ा 27% हो गया।”
इज़राइल की मुश्किलें बढ़ाते हुए, ईरान अब ऐसे मिसाइल दाग रहा है जिनमें कई वारहेड होते हैं, जिन्हें रोकने के लिए और ज़्यादा मिसाइलें खर्च करनी पड़ती हैं। लगता है कि ईरान ने अपने उन्नत हथियारों को युद्ध के बाद के चरणों के लिए बचाकर रखा, ताकि इज़राइल के पास बची हुई एंटी-मिसाइलें कम पड़ जाएं। इससे उसकी रक्षा क्षमता कमजोर होती जा रही है।
अमेरिका और इज़राइल ने इतने लंबे युद्ध की योजना नहीं बनाई थी। ईरान ने अपनी रणनीति गैर-पारंपरिक या अलग रणनीति के युद्ध पर आधारित की है और अपने उत्पादन व भंडारण को ज़मीन के नीचे सुरक्षित रखा है। हां, अमेरिका और इज़राइल नागरिक ढांचे—जैसे स्कूल, बिजली संयंत्र और पुल—पर बम गिरा सकते हैं, जो युद्ध अपराध हैं, लेकिन इससे युद्ध की दिशा नहीं बदलेगी। हिज़्बुल्लाह के शामिल होने से पूर्वी लेबनान में इज़राइल को भारी नुकसान हुआ है। पहली बार इज़राइल ऐसे प्रतिद्वंद्वी से लड़ रहा है जो उसे बराबरी की चुनौती दे सकता है।
कुछ हफ्ते पहले ही यह चेतावनी दी गई थी कि इज़राइल के हथियार—खासकर एंटी-मिसाइल—तेजी से खत्म हो रहे हैं। Arrow‑3 और THAAD की कमी केवल इज़राइल ही नहीं, अमेरिका को भी झेलनी पड़ रही है। शुरुआती 16 दिनों में 11,000 इंटरसेप्टर दागे जाने के बाद भंडार तेजी से घटा है। ऐसे थकाऊ युद्ध में, जहां ईरान सस्ते ड्रोन बड़ी संख्या में बना सकता है, वह लंबे समय तक लड़ने की बेहतर स्थिति में है।
क्या चीन और रूस ईरान की मदद कर रहे हैं? अगर नहीं कर रहे, तो यह उनके लिए मूर्खता होगी, क्योंकि अमेरिका साफ़ कर चुका है कि वह अपनी सैन्य ताकत के सहारे दुनिया के व्यापार पर नियंत्रण चाहता है। वह अब “नियम आधारित व्यवस्था” का नेतृत्व करने वाले देश से एक आक्रामक वैश्विक शक्ति में बदल रहा है, खासकर तब जब वह चीन, भारत और एशिया के अन्य देशों से आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पीछे पड़ रहा है।
ऐसे हालात में दुनिया के हित में यही है कि ईरान इस युद्ध में टिके और उस गठजोड़ को रोके जो पश्चिम एशिया पर प्रभुत्व चाहता है। इस क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत इस बात में है कि यहां का तेल डॉलर में बिकता है और यह एशिया व यूरोप के बीच एक ज़मीनी पुल की तरह काम करता है।
अमेरिका के लिए पेट्रोडॉलर जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही पश्चिम एशिया पर नियंत्रण भी है। इसी वजह से भारत के प्रधानमंत्री का युद्ध शुरू होने से दो दिन पहले इज़राइल जाकर उसकी संसद (केनेसट) से सम्मान लेना, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज़ से एक बड़ी गलती माना जा सकता है—समय और रणनीति दोनों के स्तर पर।
यह युद्ध दिखाता है कि दुनिया बदल रही है। असममित या गैर पारंपरिक युद्ध और एशिया-अफ्रीका-लैटिन अमेरिका का औद्योगिक विकास वैश्विक संतुलन बदल रहे हैं। अब यह तय करना है कि हम पुरानी दुनिया में रहना चाहते हैं या उस नई दुनिया का हिस्सा बनना चाहते हैं जो पश्चिम एशिया की आग से उभर रही है। शायद भारत को यह भी याद रखना चाहिए कि वह ब्रिक्स का अध्यक्ष है और इस नई दुनिया में उसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।
अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–
अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।
