ख़बरों के आगे-पीछे: बुर्क़े को लेकर 'यूपी वाला मॉडल' बंगाल में भी लागू होगा!
संदेशरा बंधुओं पर यह मेहरबानी क्यों?
गुजरात के संदेशरा बंधु का बैंकों के साथ क्लेम सेटल हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल के अंत में इसकी मंजूरी दी थी। संदेशरा बंधुओं नितिन और चेतन संदेशरा के साथ जांच एजेंसियों और कर्ज देने वाले बैंकों के बीच सहमति बनी थी कि 5100 करोड़ रुपए जमा किए जाएंगे। कहा गया है कि इसे फुल एंड फाइनल सेटलमेंट मान कर स्वीकार किया जाए औऱ संदेशरा बंधुओं के खिलाफ बैंक घोटाले, धोखाधड़ी या लोन डिफॉल्ट सहित तमाम आपराधिक मामले समाप्त किए जाएं। समस्या यह है कि संदेशरा बंधु की स्टर्लिंग बायोटेक पर बैंकों का बकाया 19400 करोड़ रुपए के करीब है।
हैरानी की बात है कि जो डिफॉल्ट की रकम है उसके एक चौथाई के बराबर रकम को फुल एंड फाइनल मान कर सारे आपराधिक मामले समाप्त किए गए हैं। इसके मुकाबले कर्नाटक के कारोबारी विजय माल्या का मामला देखें। विजय माल्या के खिलाफ 6000 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा का डिफॉल्ट था। उन्होंने बैंकों से कोई धोखाधड़ी नहीं की थी। उनकी विमानन कंपनी घाटे में चल रही थी, जिससे वे समय पर कर्ज नहीं चुका सके। गिरफ्तारी के डर से वे भाग गए थे। उसके बाद से वे भगोड़ा कारोबारी हैं और सरकारी जांच एजेंसियां उनसे 14000 करोड़ रुपए से ज्यादा वसूल चुकी है। यानी मूल रकम के दोगुने से ज्यादा वसूली हो गई है। लेकिन ब्याज जोड़ कर रकम 20000 करोड़ पहुंचा दी गई है। एक कारोबारी का 19000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज 5000 करोड़ में सेटल हो रहा है और दूसरे का 6000 करोड़ का कर्ज 14000 करोड़ में भी सेटल नहीं हो पा रहा है।
यूपी वाला मॉडल बंगाल में भी लागू होगा
उत्तर प्रदेश में तो कहा जाता है कि योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने रामपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव में इस मॉडल को लागू किया था लेकिन अब चुनाव आयोग ने वहां से सीख लेकर पश्चिम बंगाल में इसे लागू करने का फैसला किया है। इस मॉडल के तहत बुर्के वाली महिलाओं की जांच मतदान केंद्र के बाहर भी की जाएगी। ऐसे कह सकते है कि उनकी जांच दो बार या उससे ज्यादा बार भी हो सकती है।
आज़म ख़ान के इस्तीफ़े से खाली हुई रामपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव में पुलिस ने मतदान केंद्र से बहुत पहले ही बैरिकेड लगा दिए थे और बुर्के वाली महिलाओं की जांच मतदान केंद्र के बाहर ही की जा रही थी। इतनी जगह बैरिकेड लगाए गए थे और इतनी जांच हो रही थी कि बहुत से लोग रास्ते से लौट गए। बहरहाल, नियम यह कहता है कि बुर्के वाली महिला को मतदान केंद्र के भीतर जाकर ही अपना चेहरा दिखाना है। वहीं पर मतदाता सूची में लगी फोटो से उसका मिलान होगा और वोट डालने के लिए उंगली पर स्याही लगाई जाएगी। लेकिन पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने तय किया है कि मतदान केंद्र के बाहर ही उनकी जांच होगी। सवाल है कि सिर्फ पश्चिम बंगाल के लिए नया नियम क्यों बनाया गया? एक ही वजह समझ में आती है कि ऐसी जांच से बचने के लिए बहुत सी महिलाएं मतदान के लिए जाएंगी ही नहीं, जिसका नुकसान तृणमूल कांग्रेस को होगा।
मोदी के साथ ही ऐसे 'संयोग’ होते रहते हैं!
ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार हो चुका है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं में कोई बच्चा या कोई व्यक्ति उनकी तस्वीर लेकर पहुंचता है और भारी भीड में भी मोदी उसे देख लेते हैं। बाद में उसे मोदी से मिलवाया जाता है। मोदी के काफिले के आगे एंबुलेंस आ जाने और उसे रास्ता दिए जाने का संयोग भी कई बार हो चुका है। हर स्थान से उनका निजी रिश्ता निकल जाना तो सबसे कॉमन संयोग है। लेकिन यह संयोग भी बहुत बार होता है कि वे राज्यों में चुनाव से ठीक पहले वे जिस दिन आखिरी दौरा करते हैं उसके अगले ही दिन चुनाव आयोग चुनाव की तारीखों की घोषणा कर देता है।
देखिए कैसा संयोग है कि प्रधानमंत्री पिछले एक महीने से तमिलनाडु, केरल, बंगाल और असम के दौरे कर रहे थे। अभी बीते 14 और 15 मार्च को उनका असम और बंगाल का दौरा होना था, लेकिन उसे एक दिन पीछे खिसका दिया गया। वे 13 और 14 को असम व बंगाल में रहे, जहां हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। उन्होंने कांग्रेस और ममता बनर्जी पर जम कर हमला किया। वे 14 को वहां से लौटे और 15 मार्च को चुनाव आयोग ने मतदान की तारीखों का ऐलान कर दिया। यह राज तो राज ही रहेगा कि प्रधानमंत्री का कार्यक्रम पहले बनता है और आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस बाद में तय होती है या आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस पहले तय होती है और प्रधानमंत्री का कार्यक्रम उसके हिसाब से बनता है। लेकिन संयोग दिलचस्प है।
केरल के कांग्रेस सांसदों की विधानसभा में जाने की चाह
केरल में विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस को अपनी एक विचित्र अंदरुनी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव की घोषणा हो गई है और कांग्रेस ने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा भी शुरू कर दी है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के कई सांसदों ने विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। कांग्रेस के करीब आधा दर्जन सांसद विधानसभा चुनाव टिकट चाहते हैं। वे अपने परिवार के किसी सदस्य या अपने रिश्तेदार के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए टिकट चाहते हैं। असल में पिछले दो चुनाव से केरल में कांग्रेस के लगभग सभी लोकसभा उम्मीदवार चुनाव जीत रहे हैं, लेकिन दिल्ली में उन्हें कुछ हासिल नहीं हो रहा है। दूसरी ओर इस बार कांग्रेस के ज्यादातर नेता मान रहे है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनेगी। दो बार से लगातार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा चुनाव जीत रहा है और पिनरायी विजयन मुख्यमंत्री बन रहे हैं। 10 साल की एंटी इनकम्बेंसी की वजह से भी कांग्रेस नेताओं को लग रहा है कि वाम मोर्चा हारेगा और कांग्रेस की सरकार बनेगी। ऐसे में विधायक रहने पर राज्य सरकार में मंत्री बनने की संभावना रहेगी। इसीलिए कई सांसदों पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से इस बारे में बात की। हालांकि राहुल गांधी का स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी सांसद को विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ाना है। सो, वेणुगोपाल कुछ नहीं कर पाएंगे।
अमृतसर में हारने वालों को बड़ा फायदा
यह कमाल का संयोग है कि पिछले 12 साल में भाजपा के टिकट पर जो भी नेता अमृतसर लोकसभा सीट से लड़ा, वह चुनाव हारा लेकिन हारने के बाद उसे बहुत बड़ा फायदा हुआ। एक के बाद एक तीन नेताओं के साथ यह संयोग हुआ है। ताजा संयोग तरनजीत सिंह संधु का है, जिन्हें दिल्ली का उप राज्यपाल बनाया गया है। वे 2024 में अमृतसर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और कांग्रेस के गुरजीत सिंह औजला से चुनाव हार गए थे। अमेरिका में भारत के राजदूत रहे तरनजीत संधु हारने के बाद से बियाबान में भटक रहे थे, लेकिन उन्हें दिल्ली का उपराज्यपाल बना कर उनका पुनर्वास किया गया है। उनसे पहले 2019 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव हरदीप सिंह पुरी लड़े थे। उन्हें भी कांग्रेस के औजला ने हरा दिया था और उसके बावजूद पुरी केंद्र में मंत्री बने। उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में लाया गया। वे शहरी विकास मंत्री रहे और अभी एपस्टीन फाइल्स को लेकर विवादों में घिर जाने के बावजूद पेट्रोलियम मंत्री बने हुए हैं। उनसे भी पहले भाजपा के बड़े नेता अरुण जेटली भी अमृतसर में चुनाव हारे थे। उन्हें कांग्रेस के दिग्गज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हराया था। बाद में तो कैप्टन खुद ही भाजपा मे चले गए। लेकिन 2014 में अमृतसर सीट पर हारने के बाद अरुण जेटली देश के वित्त और रक्षा मंत्री बने। सो, जेटली से शुरू हुआ सिलसिला पुरी से होते हुए संधु तक जारी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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