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कटाक्ष: विश्व गुरु न सही विश्व मित्र तो मान लो यारो!

मोदी जी और ट्रंप जी तथा नेतन्याहू जी की मोहब्बत की तो मिसालें आज सारी दुनिया देती है। ट्रंप जी और नेतन्याहू जी बार-बार उनकी मोहब्बत का इम्तिहान लेते हैं और मोदी जी हर बार साबित करते हैं कि उनकी दोस्ती नहीं टूटेगी।
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भाई ये तो सरासर चीटिंग है। मोदी जी के साथ बल्कि उनके वाले भारत के साथ ही चीटिंग है। बताइए, ये लोग अब मोदी जी को विश्व मित्र मानने से भी इंकार कर रहे हैं। पहले कहते थे कि विश्व गुरु मानने में दिक्कत है। किसी के कहने भर से किसी को विश्व गुरु थोड़े ही मान लिया जाएगा? फिर खुद हमारे कहने से तो होगा भी क्या? खुद ही अपने मुंह से अपने को विश्व गुरु कहते फिरेंगे तो क्या दुनिया मान लेगी? उल्टे अपने मुंह मियां मिट्ठू कहकर मजाक ही उड़ाएगी। 

वैसे भी विश्व गुरु वह, जिसे दुनिया गुरु माने। घूम-घूमकर दुनिया भर में राजनेताओं के गले पड़ने से और मुलाकातों के सारे वीडियो में ऑडियो वाला हिस्सा या तो म्यूट रखने या खी-खी, खी-खी या हो-हो, हो-हो से भरने से, दुनिया किसी को गुरु थोड़े ही मान लेगी। सिर्फ विरोधियों को ठोक-पीट कर गद्दी पर जमे रहने से भी नहीं। टीवी से लेकर हर सड़क, हर चौराहे, हर खंभे पर, एक देश-एक फोटो का विधान चलाने से भी नहीं। कुछ तो हो जिसमें दुनिया आपको सबसे आगे माने और कहे कि हम आपसे सीख रहे हैं, आपके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं! 

और तो और जब से ट्रंप की अमेरिका की गद्दी पर वापसी हुई है, लंबी फेंकने तक में कोई अब हमें नंबर वन मानने के लिए तैयार नहीं है। उल्टे ट्रंप ने जब से बात-बात पर और बहुत बार तो बेबात भी, जमीन पर नाक रगड़वाना शुरू किया है, उसके बाद से तो विश्व गुरु वाले से सारे डंके फट-फटा ही गए। 

सच पूछिए तो इसी सब को देखकर मोदी जी ने खुद ही विश्व गुरु की गद्दी की तरफ देखना ही छोड़ दिया और विश्व मित्र पर आ गए। इसमें वैसे भी किसी  चीज में सबसे आगे होने टाइप कोई टेंशन ही नहीं है। बस दिल बड़ा होना चाहिए, जिसमें सारी दुनिया समा सके। और दुनिया भर में घूमने का बजट भी होना चाहिए। और बंदे के पास फुर्सत होनी चाहिए, बस। बाकी इकतरफा प्यार की तरह, इकतरफा विश्व मित्र तो कोई भी हो सकता है। 

पर अब भाई लोगों को विश्व मित्र मानने में भी प्राब्लम है। कह रहे हैं कि काहे के विश्व मित्र, पड़ोसी ईरान से मित्रता तो निभाई नहीं गयी। उससे पहले वेनेजुएला से। उससे जरा सा हट के क्यूबा से। दो साल से फिलिस्तीन से। जरूरत पर किसी के काम आने का गूदा नहीं और दावा विश्व मित्र होने का!

लेकिन, यही तो चीटिंग है। कहां तो मोदी जी अपने भारत को विश्व मित्र बनाने में जुटे हुए हैं और कहां विरोधी उनसे इस या उस देश का मित्र बनकर दिखाने की बल्कि मित्रता निभाने की मांग कर रहे हैं! क्या ये विरोधियों की छोटी सोच को ही नहीं दिखाता है। ये छोटे-मोटे देशों से दोस्ती करने, दोस्ती निभाने से बड़ी बात, इससे आगे की बात, सोच ही नहीं सकते हैं। पूरा जोर लगाने पर भी इनकी कल्पना तीसरी दुनिया के मित्र होने की बात से आगे जा ही नहीं सकती है। ये क्या जानेंगे विश्व मित्रता की कठिन साधना?

यह सच है कि अमेरीका-इस्राइल ने ईरान पर हमला किया। बातचीत के बीच में हमला किया। बातचीत के बीच में, साल भर में दूसरी बार हमला किया। लेकिन, यह भी तो सच है कि ईरान ने भी इस्राइल पर और खाड़ी देशों में अमेरिकी अड्डों पर जवाबी हमले किए। हिंसा दोनों तरफ से हुई तो हम किसी को सही और किसी को गलत कैसे कह सकते थे? अब क्या सिर्फ इसलिए कि पहले ईरान पर हमला किया गया था, मोदी जी का भारत, अमेरिका और इस्राइल को हमलावर बताकर, ईरान के साथ खड़ा हो जाता? या सिर्फ इसलिए ईरान के साथ खड़ा हो जाता कि अमेरिका, हजारों किलोमीटर दूर से आकर यहां क्यों फौजी दखल दे रहा है, एशिया के अंगने में अमेरिका का क्या काम है? भारत अगर एक पाले में खड़ा हो जाता, तो फिर विश्व मित्रता का क्या होता? भारत अगर ईरान से दोस्ती निभाने जाता, तो अमेरिका और इस्राइल से मित्रता का क्या होता?

सच्ची बात यह है कि इस बात से हमारा विश्व मित्र होने का  दावा और भी पुख्ता हो जाता है कि हम अब सही-गलत, न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, किसी चक्कर में नहीं पड़ते हैं। हम न किसी का समर्थन करते हैं न किसी का विरोध। न किसी की निंदा करते हैं, न किसी की प्रशंसा। हम बस चुप रहते हैं। कोई किसी के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दे, हम चुप रहते हैं। कोई बच्चियों के स्कूल पर बम मारकर एक साथ पौने दो सौ बच्चियों और उनके शिक्षकों की हत्या कर दे, तब भी हम चुप रहते हैं। वैसे चुप तो हम तब भी रहते हैं, जब हमारा कोई मित्र ग़ज़ा की दस लाख की आबादी में से, 74 हजार लोगों की हत्या कर दे, जिसमें ज्यादा तादाद महिलाओं और बच्चों की ही हो। बेशक, कभी-कभी फोन-वोन कर के बोलते भी हैं, पर सभी को अपनी मित्रता का भरोसा दिलाने के लिए। और सारी दुनिया को यह बताने के लिए कि हम युद्ध के नहीं बुद्ध के देश से हैं!

वैसे इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम मित्र भी सिर्फ फेसबुक फ्रेंड टाइप के हैं, दोस्ती निभाना नहीं जानते हैं। चाहे कोई यह इल्जाम तो लगा भी दे कि मोदी के भारत को पहले वालों की तरह दुश्मनियां पालना नहीं आता है और खासतौर पर पड़ौसियों को छोड़कर, समंदर पार वालों से दुश्मनियां पालना नहीं आता है--मोदी जी को अजात-शत्रु कहा जाए तो भी बेशक बुरा नहीं मानेंगे--पर दोस्ती निभाना नहीं जानने का इल्जाम कोई कैसे लगा सकता है? मोदी जी और ट्रंप जी तथा नेतन्याहू जी की मोहब्बत की तो मिसालें आज सारी दुनिया देती है। ट्रंप जी और नेतन्याहू जी बार-बार उनकी मोहब्बत का इम्तिहान लेते हैं और मोदी जी हर बार साबित करते हैं कि उनकी दोस्ती नहीं टूटेगी। दोस्ती टूटने की छोड़ो, दोस्ती में ना कोई सॉरी और ना कोई थैंक यू! और हां, कोई शिकायत भी नहीं। इस तक की शिकायत नहीं कि ट्रंप जी दो शासनाध्यक्षों की फोन वार्ता में, खरबपति दोस्त एलन मस्क को क्यों घुसा लेते हैं। दोस्ती निभायी भी जाएगी, बस जरा दिल मिलने चाहिए। नफरत के लिए मिलें तब भी चलेगा, पर दिल मिलें तो सही!

रही पाकिस्तान के ईरान और अमेरिका-इस्राइल की जंग रुकवाने के लिए हाथ-पैर मारने की बात, तो इसका मतलब न तो यह है कि अमेरिका-इस्राइल को मोदी जी की दोस्ती पर भरोसा नहीं है और न इसका मतलब यह है कि मोदी जी का भारत नहीं, पाकिस्तान विश्व मित्र है! ऐसा कुछ भी नहीं है। बात असल में सिर्फ इतनी है कि बातचीत से बात बन भी गयी तो क्या होगा– लेन-देन ही तो होगा । और जयशंकर जी ने तो पहले ही बता दिया है कि लेन-देन करना/कराना तो दलालों का काम है। वॉर रुकवाने का हो तो क्या, दलाली का काम आखिर दलाली का काम है। ऐसा काम पाकिस्तान को ही मुबारक, मोदी जी का भारत दलाली का काम नहीं करेगा। अमेरिका- इस्राइल के पाले में गिने जाने के डर से भी नहीं। वॉर चाहे कोई भी रुकवाए, पर विश्व मित्र तो भारत ही कहलाएगा। नहीं क्या? 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)

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