झारखंड: ‘अबुवा सरकार’ कब सुनेगी ‘अबुवा जनता’ की फ़रियाद!
एशिया का सबसे बड़ा जंगल क्षेत्र कहे जाने वाले झारखंड स्थित ‘सारंडा जंगल’, ख़बरों के अनुसार विगत दिनों अर्ध सैन्यबलों की घेरेबंदियों और गोलियों की आवाज़ों से थर्राता रहा। स्थापित नैरेटिव यही था कि यह सब इस क्षेत्र में “उग्रवादी हिंसा” समाप्त कर “शांति और विकास” के लिए था। जिसके लिए केंद्र सरकार की ओर से सख्त फरमान भी जारी हुआ था। यह कहाँ तक सच और सही है इसकी वास्तविक पड़ताल ज़मीनी हकीक़त से रु-ब-रु होकर ही की जा सकती है।
फिलहाल सन्दर्भ है एक ऐसे मामले की चर्चा का जो है तो बिलकुल सामान्य सा लेकिन सत्ता-सियासत के साथ साथ प्रशासनिक पेचों से ऐसा जटिल बनता जा रहा है कि इसी सारंडा क्षेत्र की जनता और शासन-प्रशासन आमने-सामने से हो गये हैं।
विडंबनापूर्ण मामला है, इसी सारंडा क्षेत्र के जिला मुख्यालय चाईबासा शहर से जुड़ा। जहां इस नगर के निवासी विगत कई महीनों से शहर से जुड़ी भीड़-भाड़ वाली एक प्रमुख सड़क पर दिन में “नो एंट्री” लगाने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
जिस सड़क पर ‘नो एंट्री’ लगाने की मांग की जा रही है उस पर हर समय भारी-बड़े वाहनों का पूरी रफ़्तार में लगातार आना-जाना लगा रहता है। जिससे वहां हर समय धूल-धुआं तो छाया ही रहता है और कोई न कोई दुर्घटना होती रहती है। क्योंकि घनी आबादी वाला इलाका होने के कारण इस सड़क पर हर समय आम नागरिकों और विशेषकर स्कूली बच्चों का आना-जाना लगा रहता है।
फलतः चौबीसों घंटे तेज़ रफ़्तार से आ-जा रहे भारी वाहनों की चपेट में आकर आये दिन लोग दुर्घटनाओं का शिकार होते रहते हैं। अब तक कई लोग अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं और अनेक घायल। हर दुर्घटना के बाद गुस्साए लोगों द्वारा तात्कालिक ‘सड़क-जाम’ एक एक मज़बूरी सी बन गयी है। लोगों ने स्थानीय प्रशासन से कई बार गुहार लगाई है कि दिन में भारी वाहनों के लिए “नो एंट्री” लगायी जाय।
चर्चा है कि इस सड़क से गुजरने वाले सभी भारी-बड़े वाहन औद्योगिक कॉरपोरेट घरानों के हैं इसलिए प्रशासन उनके खिलाफ जाने और ‘नो एंट्री’ लगाने से कतरा रहा है।
गौरतलब है कि चाईबासा शहर के आसपास थर्मल-पावर और कई बड़े कल-कारखाने लगे हुए हैं। जिसके लिए कोयला समेत कई प्रकार के खनिज़-अयस्क व रॉ-मेटेरियल भारी वाहनों से ही लाये-पहुंचाए जाते है। इलाके में कई प्रकार के खनन कार्य भी होते हैं जिनके खनिज़-अयस्कों को रेल-वैगनों तक भी पहुंचाना रहता है। इस कारण हर दिन सैकड़ों भारी वाहनों के आने-जाने का सिलसिला विगत कई वर्षों से जारी है। फलतः आये दिन सड़क दुर्घटनाओं का होना एक स्थायी संकट बना हुआ है।
हैरानी की बात ये है कि इस क्षेत्र के स्थानीय (झामुमो) विधायक राज्य की सरकार में ‘परिवहन मंत्री’ हैं. जिनका स्वतः संज्ञान लेना तो दूर उन्हें इस मसले से कोई मतलब ही नहीं दीखता। जबकि संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने लोगों से उनके हित में काम करने की घर-घर जाकर कसमें खायीं थीं।
शहर की घनी आबादी से होकर भारी वाहनों के लगातार आने-जाने से हो रही पर्यवरण समस्याओं और आये दिन की जानलेवा दुर्घटनाओं को रोकने के लिए स्थानीय शासन-प्रशासन से अनेक गुहार लगाने से लेकर राज्य सरकार और सम्बंधित विभागों को मांग-पत्र भेजा गया। जिसका कोई नतीजा नहीं निकला।
परेशान-हाल लोगों ने मज़बूर होकर “नो एंट्री आंदोलन समिति” बनाकर शांतिपूर्ण आंदोलन करने के फैसला लिया। जिसकी शुरुआत पिछले साल 2025 के 27 सितम्बर को स्थानीय विधायक सह राज्य परिवहन मंत्री के चाईबासा नगर स्थित आवास पर धरना-प्रदर्शन के माध्यम से उन्हें मांग-पत्र देने की घोषणा से की गयी। इसकी सूचना मंत्री जी को काफी पहले दे दी गयी थी लेकिन ऐन कार्यक्रम वाले दिन वे पहले ही वहां से निकल लिए।
मीडिया से जारी पूर्व सूचना अनुसार नियत तिथि और समय पर सैकड़ों की संख्या में स्थानीय नागरिक अपने परिवार के सदस्यों के साथ धरने पर बैठ गए। जहाँ पहले से ही स्थानीय प्रशासन ने मंत्री जी के आवास और आस-पास में भारी पुलिस की तैनाती कर रखी थी।
इस रवैये से लोगों में काफी नाराज़गी फ़ैल गयी। धरना-प्रदर्शन शांतिपूर्वक ही चल रहा था लेकिन थोड़ी ही देर में प्रशासन ने ज़बरदस्ती हस्तक्षेप करना चाहा तो लोग भड़क उठे। बातचीत और सुलह-समझौते का कोई रास्ता अपनाने की बजाय लोगों को जबरन तितर-बितर करते हुए पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। क्षुब्ध लोगों ने भी इसका तीखा विरोध किया। 28 लोगों को तत्काल गिरफ्तार कर जेल भेजने के साथ साथ 74 लोगों पर नामज़द और 1500 अज्ञात लोगों पर संगीन धाराएँ लगाकर मुकदमा थोप दिया गया।
इसके खिलाफ अगले ही दिन “चाईबासा बंद” कर व्यापक नागरिक प्रतिवाद प्रदर्शित किया गया।
“नो एंट्री आंदोलन” के मुद्दों में अब सभी आन्दोलनकारियों पर लगाए गए झूठे मुकदमों की वापसी की मांग भी प्रमुख मुद्दा बन गया। ज़ल्द ही चाईबासा शहर के साथ साथ इलाके में एक व्यापक समर्थन का जन अभियान बनने लगा।
सरकार और प्रशासन द्वारा लगातार अनसुना किये पर तय हुआ कि अब “पद यात्रा” निकालकर प्रदेश की राजधानी रांची पहुंचा जाय और मुख्यमंत्री से सीधा मिलकर बात की जाय।
‘नो एंट्री आंदोलन समिति’ के आह्वान पर बीते 26 अप्रैल से 1 मई तक “न्याय-यात्रा/पद-यात्रा” निकाली गयी। जो चाईबासा के ताम्बे चौक से शुरू हुई। इस यात्रा में शामिल आदिवासी युवाओं ने मीडिया को बताया कि कई स्थानों पर पुलिस-प्रशासन ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
चाईबासा से 150 किलोमीटर से भी अधिक की दूरी तय कर लोग जब रांची स्थित मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास तक पहुंचना चाहे तो पुलिस ने बैरिकेड लगाकर उन्हें रोक दिया। वहां तैनात अधिकारी ने कहा कि- आप लोगों ने मिलने की अनुमति नहीं ली है इसलिए वे नहीं मिलेंगे। आंदोलनकारियों ने बताया कि कई दिन पहले ही आकर मुख्यमंत्री सचिवालय को लिखित सूचना दी गयी है। अधिकारी ने कहा कि आप अपना मांग-पात्र मुझे दे दीजिये, उनतक पहुंचा दिया जाएगा।
सनद रहे कि मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे आंदोलनकारियों का नेतृत्व झारखंड समेत कोल्हान क्षेत्र के कई वरिष्ठ आदिवासी नेता कर रहे थे। जिसमें एकीकृत बिहार के समय के विधान सभा पूर्व उपाध्यक्ष देवेन्द्र नाथ चम्पिया और पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रदीप बालमुचू सरीखे राजनेता शामिल थे। लेकिन मुख्यमंत्री नहीं मिले।
“अबुवा सरकार” का ढोल पीटनेवालों द्वारा ‘अबुवा जनता’ के साथ की गयी सार्वजनिक उपेक्षा-अपमान से क्षुब्ध होकर आंदोलनकारी बिना किसी हो-हल्ला के वहां से वापस चल दिए। बाद में राज्यपाल से मिलकर उन्हें अपना मांग-पात्र सौंप दिया।
इस पूरे प्रकरण में “न्याय-यात्रा/पद-यात्रा” में शामिल आदिवासी युवाओं में काफी गहरा क्षोभ और नाराज़गी देखी गयी। जिनकी ये प्रतिक्रिया है- “माननीय मुख्यमंत्री जी, हमलोग गाँधी जी के आदर्शों और विचारों को अमल में लाते हुए उनके सिद्धांतों के अनुरूप पदयात्रा कर आपके समक्ष आये हुए थे, किन्तु आपने हमसे न मिलकर उनके विचारों और संविधान का अपमान किया है!”
ख़बरों के अनुसार झारखंड भाकपा माले के राज्य नेताओं ने कार्यक्रम स्थल पर पहुंचकर “नो एंट्री आंदोलन समिति” की सभी मांगों का समर्थन देते हुए मांगे पूरी होने तक आंदोलन में सक्रिय साथ देने की घोषणा की।
चाईबासा से रांची पहुंचकर “अबुवा सरकार” से अपनी पीड़ा का समाधान की उम्मीदों को खुद मुख्यमंत्री द्वारा तोड़े जाने के बाद भी “नो एंट्री आन्दोलन समिति” ने अपना अभियान जारी रखने पर अडिग है।
जानकारों के अनुसार यदि यह आन्दोलन ज़रा सा भी कड़ा तेवर लेता तो अबतक “उग्रवादी हिंसा” का ठप्पा लगाकर सारंडा क्षेत्र में तैनात केंद्र सरकार के अर्ध-सैन्यबलो के निशाने पर लाया जा चुका होता। क्योंकि अधिकांश आंदोलनकारी आदिवासी हैं।
देखना है कि “अबुवा सरकार” ‘अबुवा जनता’ की फ़रियाद कब सुनती है?
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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