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विमर्श: हमारे लिए आज बांगडुंग स्पिरिट की आवश्यकता है

ऐप्सो द्वारा 'बांगडुंग सम्मेलन के 70 साल, नेहरू और समकालीन दुनिया' विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
Discussion: Bandung Conference and Nehru

पटना। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की 62वीं पुण्यतिथि के अवसर पर अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन (ऐप्सो)  की ओर से बांगडुंग  सम्मेलन के 70 साल पूरे होने पर विमर्श का आयोजन किया गया। विषय था " बांगडुंग सम्मेलन के 70 साल , नेहरू और समकालीन दुनिया"। 

(फ़ाइल फ़ोटो)

ऐप्सो के राज्य महासचिव अनीश अंकुर ने अपने संबोधन में कहा कि "1955 में 29 नवस्वाधीन देशों ने इंडोनेशिया के बांगडुंग में इकट्ठा होकर ऐतिहासिक मोड़ लाने वाला काम किया। पहली बार नए स्वतंत्र हुए देशों ने सामूहिक रूप से साम्राज्यवादी देशों को चुनौती देते हुए कहा कि अपने देश के भाग्य का निर्धारण हम करेंगे कोई दूसरा नहीं। हमारे संसाधनों का शोषण, उत्पीड़न अब बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।  इस सम्मेलन को बनाने में  भारत के जवाहर लाल नेहरू, इंडोनेशिया के सुकरणों, मिश्र के अब्दुल गमाल नासिर और युगोस्लाविया के मार्शल टीटो का योगदान प्रमुख था। बांगडुंग ने  भारत चीन के पंचशील सिद्धांतों की तर्ज पर दसशील  सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। बांगडुंग की भावना आगे चलकर 1961 बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन, 1966 में ट्राई कॉन्टिनेंटल कॉन्फ्रेंस के रूप में आगे बढ़ी। लेकिन सी.आई.ए, और अन्य देशों के इंटेलीजेंस एजेंसियों ने 1960 में कांगो के राष्ट्रपति पैट्रिस लुमुंबा के हत्या कराई और जिस सुकरणों ने बांगडुंग सम्मेलन कराया उनका तख्तापलट कराकर दस लाख कम्युनिस्टों की हत्या की गई। बांगडुंग सम्मेलन कराने की यह सजा दी गई थी। 

बांगडुंग सम्मेलन के बहुत सफल न होने का कारण यह था कि बांगडुंग के नेतागण साम्राज्यवाद से तो लड़ना चाहते थे पर उसके सामाजिक आर्थिक ढांचे से पार नहीं पाने का उनके पास कार्यक्रम न था। नवउपनिवेश देशों के पास इंफ्रास्ट्रक्चर न था। पर आज लगता है भौतिक परिस्थितियां तैयार हो रही है। इसका इस्तेमाल करने की जरूरत है।  साथ ही तीसरी दुनिया में थोपे गए ऋण संकट ने भी बांगडुंग के सफल होने में बाधा पहुंचाई।"

शिक्षाविद् कुमार सर्वेश ने अपने संबोधन में कहा " आज का अंतर्राष्ट्रीय समय पहले की तुलना में ज्यादा कठिन व जटिल है।  हमारे लिए आज बांगडुंग स्पिरिट की आवश्यकता है। बांगडुंग के मंच ने चीन को रिस्पेक्टिबिलिटी दिलाई। 2014 तक भारत की विदेश नीति में अमेरिका की ओर झुकने के बावजूद एक संतुलन कायम करने की कोशिश की थी लेकिन पिछले दस ग्यारह साल से अमेरिका की ओर झुकाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अभी अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि में हमें उसकी कीमत चुकानी पड़ी है। यूक्रेन में हमने थोड़ा संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। आज के जो अमेरिकी राष्ट्रपति हैं ऐसा अनप्रीडिक्टेबल है जो सुबह कुछ बोलते हैं शाम में कुछ। तीसरी दुनिया के देश संयुक्त राष्ट्र में जिस लोकतांत्रिकरण की बात कर रहे हैं वह साउथ-साउथ सहयोग के बगैर नहीं संभव है। तीसरी दुनिया के देशों को उनके साम्राज्यवाद से खतरा है। चीन का ट्रेड सरप्लस उसके रणनीतिक स्पेस को बढ़ाते हुए उसके प्रभाव को बढ़ाने की ओर ले जा रहा है।"

पटना विश्विद्यालय में लोक प्रशासन के असिस्टेंट प्रोफेसर सुधीर कुमार ने कहा "  पंचशील समझौतों के आधार पर बांगडुंग ने अपना कार्यक्रम तय किया था। आज फिर से तीसरी दुनिया के देशों के सामने अपने संसाधनों के नियंत्रण के लिए साम्राज्वादी  देशों के खिलाफ मुकाबला किया जा सके।"

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के नेता रामलाला सिंह ने अपने संबोधन में कहा " नेहरू जी ने भारत को पैरों पर खड़ा करने के लिए इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण के उसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में बदला। बोकारो, भेल जैसे उद्योगों का सार्वजनिक क्षेत्र में लाकर पब्लिक सेक्टर को मजबूत बनाया। नेहरू जी के योगदान को हमें समझने के जरूरत है। यदि वे होते तो देश की दुर्दशा नहीं होती। गुटनिरपेक्ष देशों का आंदोलन इतना कमजोर नहीं होता। अमेरिका नहीं चाहता कि कोई उसकी इच्छा के बगैर दूसरा देश किसी से व्यापार करे। वह उसपर प्रतिबंध लगा देता है।"  

सभा को पटना जिला किसान सभा के गोपाल शर्मा ने बताया "बांगडुंग का पहला सिद्धांत यह था कि यू एन चार्टर का सम्मान, क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना, एक दूसरे पर हमला नहीं करना। बांगडुंग का परिणाम था उपनिवेशवाद पर करारा प्रहार।  स्वतंत्र देशों की अपनी स्वाधीन विदेश नीति होगी। नेहरू बहुत बड़े नेता थे।"

सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति सिंह ने बताया " नेहरू जी ने भारत की बहुत मजबूत नींव रखी थी लेकिन आज उसे धराशाई किया जा रहा है। बांगडुंग सम्मेलन में नेहरू जी के नेतृत्व में यह समझ बनी के गुलामी से मुक्ति पाए देशों को एक दूसरे की संप्रभुता की रक्षा करनी होगी। आज हमारा देश इजरायल जैसे गलत देश का साथ दे रहा है। भारत में आंतरिक स्वतंत्रता को समाप्त किया जा रहा है। "

कथाकार चितरंजन भारती ने अपने संबोधन में कहा " इस बहाने हम इतिहास को खंगालने का काम किया है। आज सारे के सारे सार्वजनिक उपक्रम किसी निजी कंपनी को देने के लिए बंद किया जा था है। सरकारी संपत्ति को सुनियोजित ढंग से प्राइवेट कंपनी को दिया जा रहा है। सार्वजनिक उद्यम में प्रशासनिक कमियां थीं उन कमियों को बढ़ाचढाकर दिखाया गया ताकि निजी क्षेत्र के लिए  जगह बनाया गया। आजकल 12 घंटे तक नौकरी करना पड़ता है कैसे फिर किताब पढ़ेंगे, पत्र-पत्रिका देखेंगे या कोई और काम करेंगे। इतना खटने पर भी कितना कम पैसा मिलता है। उनकी माली हालत बेहद खराब है।"

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए ऐप्सो  के राज्य महासचिव रामबाबू कुमार ने कहा " हमलोग नेहरू जवाहर लाल नेहरू वामपंथी रुझान के लिबरल डेमोक्रेट हैं। कांग्रेस के अंदर वामपंथी धारा को मजबूत बनाने में नेहरू और सुभाष चंद्र बोस का प्रमुख योगदान था।  फैजाबाद में कांग्रेस को सोशलिस्ट मोड़ देने की कोशिश की थी। समाजवादी दिशा में देश को ले जाना हमारे संविधान की आत्मा है। 1949 में काउंसिल फॉर म्युचुअल असिस्टेंस बना था। 1955 में  वारसॉ पैक्ट बना। 1956 आते आते जिस गुट निरपेक्ष आंदोलन की जो बुनियाद रखा उसने शीत युद्ध के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । नव आजाद देशों के प्रगतिशील राष्ट्रवाद का मंच यह बना था। 1977 के बाद मोरारजी देसाई ने फिलीस्तीन को छोड़ इजरायल के साथ संबंध बढ़ाया। 1983 में गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन होता है जिसमें इंदिरा गांधी और  यासिर अराफात साथ साथ आते हैं। "

कार्यक्रम का संचालन रौशन प्रकाश ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आनंद शर्मा ने किया। 

कार्यक्रम में शामिल प्रमुख लोगों में रमेश सिंह, आनंद शर्मा, संदीप, विकास, विनय लाल, प्रमोद नंदन , रामजी यादव,  छात्र नेता सुधीर, रोहित शर्मा , प्रिंस राज, भोला पासवान , प्रमोद नंदन , गौरव, विपिन आदि शामिल थे।

 

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