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तिरछी नज़र: मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ

हुआ यह कि जब सरकार जी नोर्वे में थे और वहां वाला कांड हुआ। अरे, वही नोर्वे की पत्रकार वाला फेमस कांड। उसी समय सरकार जी के दिमाग़ की घंटी बजी कि इस समय मेलोडी होती तो कितना अच्छा होता। पत्रकार हेले की ओर एक मेलोडी उछाल देते कि मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ।
helle modi meloni

सरकार जी विदेश गए और वहां मेलोडी गिफ्ट कर आये। जनता के पैसे से मेलोडी क्यों गिफ्ट कर आए, प्रश्न यह नहीं है। विदेश जाते हैं तो वहां पर जनता के पैसे से सरकार जी पता नहीं क्या क्या करते हैं और क्या क्या गिफ्ट दे कर आते हैं। एक बार तो सरकार जी ने मिसेज बाईडेन को इतनी महंगी गिफ्ट दी थी कि ट्रंप जी इतने नाराज हो गए कि सरकार जी को अपने दोबारा राष्ट्रपति बनने की शपथ ग्रहण समारोह में भी नहीं बुलाया। फिर देश के हितों की गिफ्ट दे कर सरकार जी ने ट्रंप जी को ख़ुश किया।

मेलोडी इतनी महान कैसे बनी कि मेलोनी को गिफ्ट दी जाये। मेलोडी न तो इतनी महंगी है और न ही इतनी स्वादिष्ट कि गिफ्ट दी जाती। वजह मात्र एक है, मेलोडी के विज्ञापन की टैग लाइन। 'मेलोडी खाओ–खुद जान जाओ' यही वह लाइन है जिसने सरकार जी को इटली में मेलोडी गिफ्ट देने के लिए प्रोत्साहित किया।

दरअसल सरकार जी ने जवानी में यह लाइन सुनी थी, 'मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ'। उनके बचपन में तो मेलोडी थी नहीं। जब जवान हुए तो मेलोडी आई। मतलब मेलोडी टॉफी आई। मेलोडी आई तो उसका विज्ञापन भी आया। विज्ञापन में आया, 'मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ'। भिक्षावृति करते हुए, इधर से उधर घूमते हुए, रेडियो से, टीवी सेट से, निकलती आवाज़ कानों में पड़ ही जाती थी। 'मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ'। बस वही बात दिमाग़ के किसी कोने में बस गई।

हुआ यह कि जब सरकार जी नोर्वे में थे और वहां वाला कांड हुआ। अरे, वही नोर्वे की पत्रकार वाला फेमस कांड। वही जब पत्रकार हेले लिंग ने एक प्रश्न पूछ लिया था और सरकार जी बिना उत्तर दिये निकल गए थे। उसी समय सरकार जी के दिमाग़ की घंटी बजी। घंटी बजी कि इस समय मेलोडी होती तो कितना अच्छा होता। पत्रकार हेले की ओर एक मेलोडी उछाल देते। कि मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ। हेले मेलोडी खाती और खुद जान जाती कि सरकार जी पत्रकारों के प्रश्न क्यों नहीं लेते हैं।

सरकार जी ने सोचा कि नोर्वे में तो भद्द पिट गई पर कहीं इटली में भी ऐसा ही न हो। तो सरकार जी ने तुरंत इंडिया से स्पेशल हवाई जहाज से मेलोडी का एक पैकेट मंगवाया। पैकेट इटली पहुंचा। जिन लोगों को यह पता है कि नेहरू का सिगरेट का पैकेट हवाई जहाज से गया था उन्हें अब यह भी खबर होनी चाहिए कि सरकार जी के लिए मेलोडी का एक पैकेट हवाई जहाज से दिल्ली से इटली गया था। 

सरकार जी जब इटली पहुँचे तो जरा घबराये हुए थे। अगर नोर्वे जैसी स्थिति इटली में भी हो गई तो। किसी पत्रकार ने कुछ पूछ लिया तो। जब मेलोडी का पैकेट इटली पहुंच गया तो सरकार जी की जान में जान आई। और जान तब आ गई जब मेलोनी ने बता दिया कि यहाँ पत्रकारों से वार्ता की कोई सम्भावना नहीं है। वैसे भी इटली नोर्वे जैसा नहीं है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 56वें स्थान पर है। तो सरकार जी की घबराहट कम हुई।  

तो इटली में कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई। किसी पत्रकार ने कोई सवाल भी नहीं पूछा। मेलोडी बच गई। जरा भी खर्च नहीं हुई। तो मेलोडी का वह बचा हुआ पैकेट सरकार जी मेलोनी को दे आए। बस इतनी छोटी सी बात है जिसके हम तरह तरह के अर्थ निकाल रहे हैं और तरह तरह के मीम बना रहे हैं।

और हाँ, सरकार जी अब यहाँ भी निडर हो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते हैं। उन्हें किसी भी पत्रकार से डरने की कोई जरूरत नहीं है। कोई बेरोजगारी पर सवाल करे तो उसकी और एक मेलोडी उछाल दें। कोई महंगाई पर प्रश्न पूछे तो उसकी तरफ भी एक मेलोडी उछाल दें। कोई भ्रष्टाचार पर बात करे तो उसके लिए भी मेलोडी है ना। कोई अम्बानी अडानी पर पूछ ले तो एक नहीं, दो मेलोडी दे दें। सब प्रश्नों का एक ही उत्तर- 'मेलोडी खाओ और खुद जान जाओ'।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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