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ख़बरों के आगे-पीछे: महाराष्ट्र सरकार का यह कैसा फ़ैसला?

अपने साप्ताहिक कॉलम में वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन महाराष्ट्र सरकार के ऑटो-टैक्सी ड्राइवर के लिए मराठी अनिवार्य करके के फ़ैसले की समीक्षा करते हुए चुनावी राज्यों की राजनीति पर चर्चा कर रहे हैं। साथ ही सवाल उठा रहे हैं कि अभी तक लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव क्यों नहीं हुआ।
Maharashtra Marathi

महाराष्ट्र सरकार का समाज तोड़क फ़ैसला! 

हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान का राग अलापने वाली भाजपा की महाराष्ट्र सरकार ने फैसला किया है कि आगामी एक मई से ऑटो रिक्शा और टैक्सी डाइवरों के लिए यह अनिवार्य हो जाएगा कि वे धारा-प्रवाह मराठी बोले और मराठी भाषा को पढ़ सकें। इस सिलसिले में राज्य सरकार का परिवहन विभाग खास सत्यापन अभियान शुरू करने जा रहे हैं। इस अभियान के तहत देखा जाएगा कि ड्राइवर प्रभावी ढंग से मराठी बोलने, लिखने, और पढ़ने में सक्षम है या नहीं। जो डाइवर वेरिफिकेशन में फ़ेल होंगे, उनके लाइसेंस और परमिट रद्द कर दिए जाएंगे। मगर, सवाल है कि क्या ऐसा करना वैधानिक है? 

किसी भी राज्य से लिया गया डाइविंग लाइसेंस पूरे भारत में मान्य होता है। ऐसे में भाषा बोलने-पढ़ने की क्षमता के आधार पर किसी राज्य में उसकी मान्यता खत्म करना निहायत ही आपत्तिजनक काम है। अगर ऐसी ही सोच से दूसरे राज्य भी प्रेरित हुए तो मराठी भाषी सहित तमाम इलाकाई लोगों के लिए अन्य क्षेत्रों में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। 

महाराष्ट्र में 65 से 70 प्रतिशत टैक्सी-ऑटो डाइवर अन्य राज्यों के हैं और वे वहां वर्षों से काम कर रहे हैं तो जाहिर है कि वे महाराष्ट्र के आम जन से संवाद करने लायक भाषा जानते-समझते हैं। महाराष्ट्र सरकार को यह समझना चाहिए कि भाषा जानने और सीखने का संबंध काफी हद तक रोज-रोटी के तकाजों से जुड़ा होता है। इसलिए उसका यह फैसला सिर्फ देश के किसी हिस्से में जाकर रोजी-रोटी कमाने के नागरिकों के मूलभूत संवैधानिक अधिकार के ही खिलाफ नहीं है बल्कि राष्ट्रीय एकता की भावना को भी आघात पहुंचाता है। 

उप सभापति तो ठीक है, उपाध्यक्ष का क्या?

राज्यसभा के उप सभापति का पद खाली होने महज एक सप्ताह के भीतर ही उसका चुनाव भी हो गया और हरिवंश नारायण सिंह लगातार तीसरी बार इस पद के लिए चुन लिए गए। नौ अप्रैल को हरिवंश नारायण सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने की वजह से उप सभापति का पद खाली हुआ था, लेकिन 10 अप्रैल को ही सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें उच्च सदन के लिए मनोनीत कर दिया। हरिवंश नारायण ने मनोनयन के दिन यानी 10 अप्रैल को शपथ भी ले ली और 17 अप्रैल को वे फिर से उप सभापति चुन लिए गए। लेकिन सवाल है कि लोकसभा के उपाध्यक्ष का क्या होगा? सरकार ने जितनी तत्परता उप सभापति के चुनाव में दिखाई है वैसी तत्परता उपाध्यक्ष के लिए क्यों नहीं दिखाई जा रही है? 

गौरतलब है कि लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद सात साल से खाली है। पिछली यानी 17वीं लोकसभा में भी उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हुआ और पूरे पांच साल तक यह पद खाली रहा। 18वीं लोकसभा के भी दो साल पूरे होने वाले हैं। इस तरह सात साल से एक संवैधानिक पद को खाली रखा गया है। संसद और संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखने का दावा करने वाली सरकार इस बार भी उपाध्यक्ष का चुनाव कराने के मूड में नहीं दिख रही है। 

चुनावी राज्यों में पैसा बांटने की होड़

यह बड़ा सवाल है कि क्या चुनाव जीतने के लिए कुछ भी वादा किया जा सकता है? जो सरकार में है वह दोनों हाथों से खजाना लुटा रहा है और जो विपक्ष में है वह उससे ज्यादा खुले हाथों से खजाना लुटाने का ऐलान कर रहा है। इस सिलसिले में पश्चिम बंगाल के चुनाव में भाजपा ने नई मिसाल बनाई है। उसने ऐलान किया है कि उसकी सरकार बनी तो हर महीने महिलाओं को तीन हजार रुपए देगी। ममता बनर्जी ने चुनाव से पहले लक्ष्मी भंडार योजना के तहत सामान्य और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को 1500 और एससी व एसटी समुदाय की महिलाओं को 1700 रुपये महीना देने का ऐलान किया है। उसके जवाब में भाजपा ने राशि सीधे दोगुनी कर दी है। 

पश्चिम बंगाल की करीब 10 करोड़ आबादी में से अगर दो करोड़ महिलाओं को भी तीन-तीन हजार रुपये हर महीने दिए जाते हैं तो साल में सरकार को 72 हजार करोड़ रुपये की जरुरत होगी। महाराष्ट्र जैसा राज्य 1500 रुपये महीना दे रहा है और उसमें उसकी हालत ऐसी हो गई है कि सारी बड़ी योजनाएं ठप पडी हैं और सरकार को अपना काम चलाने के लिए अपने सागवान के पेड गिरवी रखना पड़ रहे हैं। भाजपा ने बेरोजगार युवाओं को भी तीन हजार रुपये महीना देने का ऐलान किया है। हालांकि भाजपा के इस वादे पर बंगाल में लोगों को यकीन नहीं ही होगा क्योंकि दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी ने महिला दिवस पर आठ मार्च 2025 से मुख्यमंत्री महिला सम्मान राशि देने का ऐलान किया था, जो एक साल बीत जाने के बाद भी नहीं दी जा रही है। 

अखंड जोत की जगह कृत्रिम 'ज्योति स्वरूप’

अयोध्या के राममंदिर में एक 'ज्योति स्वरूप’ स्थापित करने की जानकारी देने वाला पोस्टर सोशल मीडिया में आया है। इसे राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से पोस्ट किया गया है। इसमें दिखाया जा रहा है कि पूरे वैदिक मंत्रोच्चार के साथ साधु, संत, प्रशासक आदि मिल कर एक कृत्रिम 'ज्योति स्वरूप’ स्थापित कर रहे हैं। यह बिजली से जलने वाला है या कह सकते है कि जलने का आभास देने वाला दीपक है। इसे लेकर रामभक्तों और भाजपा समर्थकों की ओर से भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया में इसे लेकर विवाद छिड़ा है। 

संघ और भाजपा के ज्यादातर समर्थक इस बात से नाराज है कि घी का अखंड जोत जलाने की बजाय 'चाइनीज कृत्रिम ज्योति स्वरूप’ क्यों स्थापित किया जा रहा है? यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या कोई पुजारी नहीं है, जो स्थायी रूप से दीपक जलाने का बंदोबस्त करे और उसकी देखरेख करे? यह भी पूछा जा रहा है कि क्या राममंदिर के प्रशासक वामपंथियों से डरे हुए है कि अगर दीपक जलाया तो कहा जाएगा कि उसके धुएं और ताप से अंटार्कटिका की बर्फ पिघल जाएगी? 

इसी प्रकरण में यह सवाल भी उठा है कि राममंदिर में ऐसी जगह नहीं है, जहां बैठ कर लोग रामचरितमानस का पाठ कर सके। यूजीसी की ओर से सवर्ण छात्रों को अपराधी बनाने वाली नियमावली जारी होने के बाद से इस तरह के मुद्दे खुद राइट विंग के लोग ज्यादा उठाने लगे हैं।

केजरीवाल ने क़ायम की नई मिसाल

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल राजनीति में कई विचारों के जनक माने जाते हैं। उनके वे विचार अच्छे हैं या बुरे, यह अलग मसला है। जैसे उन्होंने विचारधारा विहीन राजनीति की शुरुआत की। उनकी पार्टी की कोई विचारधारा नहीं है। उन्होंने कहा कि गवर्नेंस अपने आप में एक विचारधारा है। इसी तरह उन्होंने मुफ्त में सेवाएं और वस्तुएं बांटने की परंपरा उत्तर भारत में शुरू की और स्थापित की। वैसे ही एक नई मिसाल उन्होंने बनाई है। विशेष अदालत में शराब नीति घोटाला रद्द हो जाने के बाद सीबीआई ने उस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी तो उसके खिलाफ केजरीवाल खुद अपनी पैरवी कर रहे हैं। इसके अलावा पहली बार ऐसा हुआ कि किसी आरोपी नेता ने हाई कोर्ट में खड़े होकर पैरवी की और जज को मुकदमे से हटने के लिए कहा। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से कहा कि उन्हें मुकदमे से हट जाना चाहिए। इस मुकदमे के दौरान जस्टिस शर्मा की टिप्पणियों और आदेश का मामला अपनी जगह है। उससे तो केजरीवाल ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया ही लेकिन उन्होंने चौकाने वाली बात यह कही कि आरएसएस से जुड़े संगठन अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा चार बार गई हैं। केजरीवाल ने कहा कि वे और उनकी पार्टी आरएसएस की विचारधारा का विरोध करते हैं और चूंकि जस्टिस शर्मा आरएसएस के कार्यक्रम में चार बार गई हैं इसलिए केजरीवाल को भरोसा नहीं है कि उनकी अदालत में न्याय मिलेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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