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तिरछी नज़र: सोने का त्याग करें, न…न नींद का नहीं

नहीं, नहीं, उन्होंने सोने मतलब नींद के त्याग का जिक्र नहीं किया है। वे आपको जगाना नहीं चाहते हैं। वे तो चाहते हैं कि आप सोते रहें। आप जब तक सोयेंगे, सरकार जी सुरक्षित रहेंगे…
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कार्टून, कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

सरकार जी ने देश की जनता से अपील की है। अपील की है कि सोने का त्याग करें। नहीं, नहीं, उन्होंने सोने मतलब नींद के त्याग का जिक्र नहीं किया है। वे आपको जगाना नहीं चाहते हैं। वे तो चाहते हैं कि आप सोते रहें। आप जब तक सोयेंगे, सरकार जी सुरक्षित रहेंगे। जिस दिन आप जाग गए, उनकी सीट असुरक्षित हो जाएगी। तो आप नींद में रहें, जागें नहीं। सरकार जी आपको जगाने की बात नहीं कर रहे हैं। वह तो सोना धातु, स्वर्ण यानी गोल्ड, की बात कर रहे हैं।

देश मुश्किल में है। यह मुश्किल में तो दो महीने से ज्यादा से है पर तब सरकार जी जरा बिजी थे। जब देश में कहीं भी चुनाव हों तो सरकार जी को सिर्फ चुनाव ही दिखता है। बाकी सबकुछ सरकार जी भूल जाते हैं। सरकार जी की आंख अर्जुन की आंख बन जाती है। इस बार सरकार जी बस बंगाल ही देख रहे थे, बाकी सब धुंधला गया था। सरकार जी को न तो देश दिख रहा था और न ही जनता। 

जनता को गैस का सिलेंडर मिल नहीं रहा है पर सरकार जी कह रहे थे कहीं कोई कमी नहीं है। जनता पेट्रोल पंपो पर लाइनों में लगी थी पर सरकार जी लाइन लगा कर रैलियां कर रहे थे। सरकार जी को तो बस चुनाव ही दिख रहे थे।

यह संकट आया क्यों। लड़ाई की वजह से। अमरीका इजराइल-ईरान की लड़ाई की वजह से। पर असली जिम्मेदार नेहरू हैं। अब यह तो आप जानते ही हैं कि जिम्मेदारी, जिम्मेदार लोगों की ही होती है इसलिए हमारे सरकार जी किसी भी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। न तो सरकार जी बढ़ती महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं और न ही बेरोजगारी के लिए। वे तो दो समुदायों के बीच में वैमन्स्य बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार नहीं हैं। जब सरकार जी किसी भी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं हैं तो देश के इन हालात के लिए जिम्मेदार कैसे हो सकते हैं। इन हालात के लिए भी नेहरू ही जिम्मेदार हैं। नेहरू ने दशकों पहले कह दिया था कि कोरिया के युद्ध की वजह से महंगाई बढ़ रही है। तो इस अमरीका, इजराइल-ईरान युद्ध से भी महंगाई बढ़ेगी ही।

ऐसा नहीं है कि सरकार जी ने इस संकट को टालने के लिए कुछ नहीं किया। बहुत कुछ किया। सरकार जी ने क्या क्या नहीं किया। अमरीका को तो बाप पहले से ही बना दिया था, इजराइल को भी वहां जा कर बाप (फादर लैंड) बना लिया। ईरान से भी सदियों पुरानी दोस्ती तोड़ दी। सरकार जी ने उससे ऐसी कुट्टी की कि वहां के सदर की हत्या के अवसर पर, एक सौ साठ से अधिक बच्चों पर बम गिरने के दुःख पर भी दुःख नहीं जताया। सरकार जी ने यह किसके लिए किया। देश के लिए ही ना। बताओ सरकार जी इससे ज्यादा कर ही क्या सकते थे। इतिहास सरकार जी के इस कारनामे का सदा जिक्र करेगा। पर फिर भी देश पर संकट आ ही गया।

सरकार जी तो कहना चाहते हैं कि लोग सोना नहीं खरीदें। वैसे तो सोने चांदी की कीमत इतनी बढ़ चुकी हैं कि कोई सोना खरीदने के बारे में बस सोच ही सकता है। इससे आगे की क्रिया मुश्किल ही है। सोना न खरीदने की सलाह के बाद सरकार जी ने सोने के आयात पर शुल्क भी बढ़ा दिया। जिससे सोना और महंगा हो गया और सोच से भी बाहर हो गया। 

उस पर देश में गरीबी इतनी जबरदस्त है कि अस्सी करोड़ लोग फ्री के राशन पर जिन्दा हैं। गरीबों की संख्या को सरकार जी ने पिछले छः साल से स्थिर रखा है। थोड़ी भी कम की हो तो बताओ। आज भी अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त पांच किलो अनाज मिल रहा है। छः साल पहले भी इतने ही लोगों को मुफ्त अनाज मिल रहा था। अब बताओ भला इतना गरीब आदमी सोना खरीदे तो कैसे खरीदे। 

अब आप यह मत कहना कि सरकार जी ने तो हमारा मंगलसूत्र ही छीन लिया। अरे भई, छीना नहीं है, और विकल्प दे दिये हैं। मंगलसूत्र बनवाओ पर सोने का मत बनवाओ। पीतल का बनवा लो, लोहे का बनवा लो, एल्युमीनियम का बनवा लो। ज्यादा अमीर हो तो चांदी का बनवा लो। वैसे चांदी भी पहुंच से बाहर ही है। हमारे आदिवासी भाई-बहन तो सदियों से इन्हीं चीजों के ज़ेवर पहनते हैं। इसमें शर्माना कैसा। आदिवासियों को जंगल से उजाड़ कर आपको ही तो आदिवासी बनाना है।

सरकार जी ने तो सोना न खरीदने को कह कर हम पर उपकार ही किया है। सरकार जी एक कनक (गेहूं, अनाज) की मादकता अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त में ही दे रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि जनता दूसरे कनक (सोने) की मादकता में भी पड़ जाये। कवि बिहारी तो बहुत पहले ही कह गए हैं,

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।।

वैसे सरकार जी ने छः और सलाह दी हैं। पर उन पर कभी और बात करेंगे। हाँ, उन में से एक है, विदेश यात्रा न करें। और सरकार जी हम सबको यह सलाह दे खुद विदेश भाग गए। इस बात पर एक और पुरानी कहावत याद आ रही है,

पर उपदेश, कुशल बहुतेरे।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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