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तिरछी नज़र: ईरान की अब्बा और अमेरिका की कुट्टी

खाड़ी में अब्बा होते होते रह गई। नहीं समझे! जब हम छोटे बच्चे थे, बड़ी शरारत करते थे, तब हम लड़ाई होने को कुट्टी कहते थे और सुलह होने को अब्बा।
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कार्टून, कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

खाड़ी में अब्बा होते होते रह गई। नहीं समझे! जब हम छोटे बच्चे थे, बड़ी शरारत करते थे, तब हम लड़ाई होने को कुट्टी कहते थे और सुलह होने को अब्बा। तो खाड़ी में ईरान- अमेरिका की अब्बा होनी थी जो नहीं हो पाई। हो सकता है आप लोग बचपन में इसे कुट्टी और अब्बा नहीं, कुछ और कहते रहे हों पर हम तो लड़ाई होने को कुट्टी और सुलह को अब्बा ही कहते थे।

यह कुट्टी और अब्बा बिल्कुल हमारे बचपन के जैसी ही रही। पहले कुट्टी, फिर अब्बा, फिर कुट्टी। मेरे लेख लिखते लिखते ही, या इसके छपने से पहले ही, या फिर आपके इसके पढ़ने से पहले ही फिर अब्बा हो जाए। और हो यह भी सकता है कि अब कुट्टी लम्बी चले। लम्बी चली तो सबके के लिए बुरा है।

अमेरिका बिल्कुल ऐसे ही करता है जैसे हम अख़लाक़ के साथ करते हैं। अख़लाक़ याद तो है ना आपको। कैसे उसके घर में, फ्रिज में रखे मीट को बीफ (गौवंश का मीट) बता कर उसे मार दिया गया। अमेरिका ने बिल्कुल ऐसा ही इराक के साथ किया था। कहा, सारी दुनिया से कहा कि इराक के पास रासायनिक हथियारों का जखीरा है। बहुत सारे जैविक हथियार भी हैं। इराक संसार के लिए खतरा है। और इस बहाने इराक पर कब्जा कर लिया। जब इराक पर कब्जा कर लिया तो पाया कि वहां तो कुछ भी नहीं है। न कोई रासायनिक हथियार और न ही कोई जैविक हथियार। बिल्कुल वही अख़लाक़ वाला केस। जब अख़लाक़ को मारने के बाद उसके फ्रिज में रखे मीट की जाँच की गई तो वह भी बीफ नहीं, साधारण मीट निकला।

अब यही वह ईरान के साथ दोहरा रहा है। कह रहा है, ईरान दुनिया के लिए खतरा है। उसके पास परमाणु बम है। जैसे हम किसी का भी टिफिन खोल चेक कर लेते हैं, किसी भी ट्रक में भरे मवेशियों को चेक के लेते हैं, अमेरिका भी चाहता है कि ईरान भी अपने परमाणु संयन्त्र चेक करवाये। नहीं करवाये तो युद्ध झेले। जैसे हम अपने वालों को आतंकवादी नहीं कह सकते हैं, वैसे ही हम अमेरिका, इजराइल को आतंकवादी नहीं कह सकते हैं। पर हैं दोनों ही आतंकवादी।

खैर, इस लड़ाई के दौरान मैं पूरा देशभक्त बना रहा। बल्कि पहले से अधिक देशप्रेमी बना रहा। सरकार जी ने कहा था कि देश में एलपीजी की कमी नहीं है तो मान लिया। कहीं रसोई गैस के सिलेंडर के लिए लोगों को लाइन में लगा देखा तो उन्हें देशद्रोही मान उधर से निगाहें फेर लीं। पेट्रोल पंपो पर भीड़ देखी तो सरकार जी पर नहीं, लोगों पर गुस्सा आया। सरकार जी से कोई शिकायत नहीं की। 

सरकार जी के प्रताप से देश में इतनी उन्नति हो गई है, इतना पैसा आ गया है कि सरकार जी ने दोनों तरह का सिलेंडर महंगा कर दिया है फिर भी कोई माई के लाल ने विरोध नहीं किया। लोग हज़ार का सिलेंडर चार हज़ार में खरीद रहे हैं पर चूँ भी नहीं कर रहे हैं।

घर में काम करने वाली बाई जब गैस का सिलेंडर न मिलने का रोना रोने लगी तो मैंने उसे डांट दिया। उसे देशद्रोही कह दिया। उससे कहा कि जब सरकार जी अठारह घंटे केवल मशरूम और काजू बादाम खा कर काम कर सकते हैं, तो क्या तुम कुछ दिन बिना खाना पकाये चार छह घंटे काम नहीं कर सकतीं। जब देश का सैनिक सियाचिन में...। तो क्या तुम देश के लिए महंगा सिलेंडर नहीं खरीद सकतीं। वह बेचारा गैस सिलेंडर की एजेंसी वाला तो ब्लैक में सिलेंडर बेच सरकार जी की लाइन पर ही काम कर रहा है। 'आपदा में अवसर' ढूंढ रहा है।

शायद पहली बार हम आक्रमण करने वालों के साथ खड़े हैं। देश की यही नीति बन गई है। देश के भीतर हम अख़लाक़ और पहलू खान की लिंचिंग करने वालों के साथ खड़े होते हैं, इंस्पेक्टर सुबोध को मारने वालों के साथ खड़े होते हैं। देश के बाहर हम अमेरिका, इजराइल के साथ खड़े होते हैं, ईरान में 170 बच्चों को मारने वालों के साथ खड़े होते हैं, ग़ज़ा में हज़ारों बच्चों को मारने वालों के साथ खड़े होते हैं।

बात तो हम अपने बचपन की कर रहे थे पर आ गए खाड़ी युद्ध पर। बचपन में जो भी हमारी कुट्टी को खत्म कर अब्बा करवाता था, बीच बचाव करता था, उसको हमने कभी भी दलाल नहीं कहा। हमने भी कई बार सुलह करवाई थी पर दलाल कभी नहीं माने गए। पर आजकल सुलह करवाने वाले दलाल माने जा रहे हैं। समय के साथ, शासक ही नहीं, शब्दों के अर्थ भी बदल गए हैं।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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