ख़बरों के आगे-पीछे: हर राज्य में तोड़-फोड़ की बिसात बिछी
भारत में कम नहीं होंगे तेल के दाम!
अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने से सबको उम्मीद है कि अब होर्मुज की खाड़ी खुल जाएगी और कच्चा तेल आसानी से आने लगेगा तो तेल की कीमतें कम होगी। लेकिन ऐसा नहीं होगा। इसके दो कारण है। पहला कारण तो यह है कि भारत सरकार, तेल कंपनियों और सरकार समर्थक मीडिया की ओर से यह बात स्थापित कर दी गई है कि युद्ध के दौरान तीन महीने में तेल कंपनियों को बहुत बड़ा घाटा हुआ है। सो, यह धारणा बनाई गई है कि कंपनियां अपने घाटे की भरपाई करेंगी, जिसमें बहुत समय लगेगा। दूसरा कारण यह है कि भारत के लोग अब बढ़ी हुई कीमत के अभ्यस्त हो गए हैं। इसलिए वे दाम कम नहीं किए जाने का विरोध नहीं करेंगे, बल्कि इस बात पर खुश होंगे कि अब और कीमत नहीं बढ़ेगी।
बहरहाल, समस्या सिर्फ पेट्रोलियम कंपनियों के घाटे की भरपाई की नहीं है। सरकार ने भी ईरान युद्ध शुरू होने के बाद पेट्रोल और डीजल पर आयात शुल्क में कटौती की थी, जिससे सरकारी खजाने को अच्छा खासा नुकसान हुआ है। सो, जब होर्मुज की खाड़ी खुलेगी, तेल की कीमत कम होगी और तेल की आवाजाही सुचारू हो जाएगी तो सबसे पहले सरकार अपने खजाने को भरेगी। दरअसल मोदी सरकार के लिए हर आपदा अवसर की तरह रही है। कोरोना के समय इसी तरह उत्पाद शुल्क बढ़ा कर सरकार ने पैसे कमाए थे और अंतरराष्ट्रीय बाजार मे कीमत कम होने का लाभ लोगों को नहीं दिया था।
केसीआर का दांव आजमाएंगे केजरीवाल!
संकेत है कि अरविंद केजरीवाल चौंकाने वाला फैसला करते हुए पंजाब में समय से पहले चुनाव करा सकते हैं। वैसे तो पंजाब में अगले साल मार्च में चुनाव होना है, लेकिन बताया जा रहा है कि केजरीवाल उससे पहले नवंबर में चुनाव कराना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने अचानक पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को अगले चुनाव के लिए भी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया है। अभी ऐसा करने की जरुरत नहीं थी। इसलिए यह चर्चा शुरू हुई कि अब विधानसभा भंग करने की सिफारिश भगवंत मान कर सकते हैं। अगर अभी विधानसभा भंग होती है तभी छह महीने के भीतर यानी नवंबर या दिसंबर तक चुनाव होगा। अगर इसमें देरी होगी तो फिर चुनाव आयोग अगले साल मार्च में होने वाले अन्य राज्यों के चुनाव के साथ ही चुनाव कराएगा। ऐसा लग रहा है कि केजरीवाल तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव का दांव आजमाना चाहते हैं। चंद्रशेखर राव मई 2014 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। उनके राज्य में चुनाव लोकसभा के साथ मई 2019 में होना था लेकिन उन्होंने 2018 के मध्य में विधानसभा भंग करा कर अक्टूबर में चुनाव कराया था और जीत गए थे। उनका मानना था कि लोकसभा और कई राज्यों के चुनाव कराने पर उनके एजेंडे का असर भी चुनाव पर होता है। केजरीवाल को भी ऐसा लग रहा है कि अगर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के साथ पंजाब का चुनाव होगा तो उन राज्यों का असर पंजाब पर भी हो सकता है। इसलिए वे इसी साल अलग और अकेले चुनाव कराने का दांव चल सकते हैं।
ओवैसी उत्तर प्रदेश में काम पर लग गए
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन यानी एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश में अपना काम शुरू कर दिया है। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई क्योंकि चुनाव से ऐन पहले हुमायूं कबीर का एक स्टिंग वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वे कह रहे थे कि भाजपा के साथ उनकी डील हो गई है और वे भाजपा के कहने पर वोट काट रहे हैं। उन्होंने कई सौ करोड़ रुपये की डील होने की बात कही थी। हालांकि इसके बावजूद ईडी ने उनकी जांच नहीं की। लेकिन उनके स्टिंग वीडियो के बाद ओवैसी ने उनसे तालमेल खत्म कर लिया। कुछ सीटों पर उनकी पार्टी लड़ी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले ओवैसी की पार्टी ने अपना अभियान शुरू किया है। इस बार बहराइच से अभियान शुरू हुआ है और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को निशाना बनाया गया है। ओवैसी की रैली से पहले ही सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह का विवाद शुरू हो गया। उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने कहा है कि सुहेलदेव कोई राजा नहीं थे, राजा होते तो बहराइच में कोई किला होता। उन्होंने यहां तक कहा कि सुहेलदेव की पूरी कहानी काल्पनिक है।
दूसरी ओर अनिल राजभर का कहना है कि गाजी की दरगाह सूर्य कुंड है और इसलिए दरगाह को तोड़ देना चाहिए। शौकत अली और अनिल राजभर के विवाद से जो ध्रुवीकऱण होगा, उससे भाजपा को फायदा होगा और अखिलेश यादव का पीडीए वाले खेल बिगड़ेगा।
सपा सांसदों को लेकर संशय बढ़ा
समाजवादी पार्टी के सांसदों को लेकर संशय बढ़ गया है। सिर्फ इसलिए नहीं कि सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने एक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि पार्टी में टूट हो सकती है। इस सिलसिले में उन्होंने रामगोपाल यादव के अमित शाह से मिलने का जिक्र किया है। हालांकि शिवपाल यादव ने कहा कि इन बातों में कोई दम नहीं है और सैफई परिवार एकजुट है। हो सकता है कि सैफई परिवार एकजुट हो लेकिन पूरी सपा तो सैफई परिवार नहीं है। कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कई नेता संशय में हैं। उन्हें लग रहा है कि भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ तो अगला चुनाव मुश्किल होगा। कई सपा सांसदों के बारे में खबर है कि वे विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं या अपने परिवार से किसी को टिकट दिलाना चाहते हैं और मान रहे हैं कि भाजपा में जीतने के चांस ज्यादा है। हालांकि अखिलेश यादव ने भी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की राजनीति का माहौल बनाया है। वैसे अभी राममंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले से भाजपा बैकफुट पर आई है। फिर भी कहा जा रहा है कि अगर समाजवादी पार्टी नहीं भी टूटती है तो भाजपा की योजना मानसून सत्र में परिसीमन बिल पर कुछ सांसदों को गैरहाजिर कराने की है। पिछली बार अलग अलग पार्टियों के एक दर्जन सांसद गैरहाजिर रहे थे। इस बार 20 सांसदों को गैरहाजिर कराने की योजना है, जिसमे इंडिया गठबंधन की तीन प्रादेशिक पार्टियों सपा, राजद और जेएमएम पर नजर है।
शरद पवार की पार्टी भी संकट में
आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिव सेना को तोड़ने के बाद भाजपा के निशाने पर अब शरद पवार की पार्टी है, जिसके चलते संसद के मानसून सत्र से पहले सबसे बड़े मराठा क्षत्रप शरद पवार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उद्धव ठाकरे के नौ में से छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिव सेना में जा रहे हैं। इस बीच शरद पवार की एनसीपी के आठ सांसदों में से पांच या छह के टूटने की चर्चा शुरू हो गई है। शरद पवार पर उनकी पार्टी के नेता दबाव डाल रहे हैं कि वे अपनी पार्टी का विलय सुनेत्रा पवार की एनसीपी के साथ कर दें। अगर ऐसा नहीं होता है तो कई सांसद और विधायक पाला बदल सकते हैं। उनकी पार्टी के सांसद मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के संपर्क में बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अगर विलय हो जाता है तो शरद पवार खेमे के भी कुछ लोगों को महाराष्ट्र सरकार में जगह मिल जाएगी और उनकी बेटी सुप्रिया सुले को केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बना दिया जाएगा। इस तरह परिवार के सभी सदस्यों की भूमिका स्पष्ट हो जाएगी। सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र में तो सुप्रिया दिल्ली में राजनीति करेंगी। पता नहीं सुनेत्रा पवार इस व्यवस्था में कितनी सहज होंगी। अपने बेटे पार्थ पवार को लेकर उनकी बड़ी योजना है और उनको यह भी लग रहा है कि उसके लिए परिवार का एकजुट होना जरूरी है। जो हो अभी शरद पवार की पार्टी पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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