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ख़बरों के आगे-पीछे: इन दिनों भाजपा का हर दांव उलटा पड़ रहा

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन अपने साप्ताहिक कॉलम में कॉकरोच पार्टी के आंदोलन, राहुल गांधी के पीएम आवास पर धरने और फेल रही भाजपा की रणनीति का विश्लेषण कर रहे हैं।
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कार्टून, कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

प्रधानमंत्री आवास पर धरने का इतना हल्ला क्यों?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री आवास से थोड़ी दूरी पर प्रदर्शन किया। इसे लेकर ऐसा हल्ला मचा, जैसे यह पहली बार हुआ हो। भाजपा से ज्यादा टीवी चैनलों ने हल्ला मचाया। भाजपा के नेताओं को सब पता है कि पहले भी प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन होते रहे हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी को भाजपा और मीडिया ने ऐसी ऊंचाई पर बैठा दिया है कि उनके खिलाफ प्रदर्शन को सब गलत मिसाल बता रहे है। 

ऐसा प्रोजेक्ट किया जा रहा है, जैसे राहुल गांधी ने बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। अतीत में खुद भाजपा नेताओं ने भी प्रधानमंत्री आवास के सामने प्रदर्शन किया है। अटल बिहारी वाजपेयी नेता प्रतिपक्ष रहते 1998 में प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठे थे, जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार बरखास्त कर दी थी। कल्याण सिह सरकार की बरखास्तगी के विरोध में भाजपा ने प्रधानमंत्री आवास का घेराव किया था। उस समय लोकसभा मे नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे और प्रधानमंत्री आईके गुजराल थे। वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा नेता प्रधानमंत्री आवास सात रेसकोर्स रोड के बाहर धरने पर बैठे। सबसे अच्छी बात यह थी कि खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री गुजराल बाहर आए थे। उन्होंने वाजपेयी से मिल कर उनकी बात सुनी और उनका धरना खत्म कराया था। 

इसके बाद भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आवासों के बाहर प्रदर्शन हुए। 2012 में तो निर्भया कांड के बाद युवाओं ने इंडिया गेट पर कब्जा कर लिया था और घंटों तक राष्ट्रपति भवन के दरवाजे झकझोरते रहे थे। तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे लगातार पुलिस को निर्देश देते रहे थे कि युवाओं पर कोई कार्रवाई नहीं करनी है। इस बार तो सरकार ने छात्रों से बात भी नहीं की और उनके प्रदर्शन पर लाठीचार्ज करा दिया था। तब राहुल गांधी पीएम आवास गए तो ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे उन्होने कोई पाप कर दिया हो।

भाजपा का हर दांव उलटा पड़ रहा 

इन दिनों भाजपा और उसकी सरकार का हर दांव उलटा पड़ रहा है। सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठवाने की रणनीति हो या छात्रों पर लाठीचार्ज की रणनीति हो, दोनों का उलटा असर हुआ है। ऐसे ही राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने के खिलाफ भाजपा की ओर से राज्यों में कांग्रेस कार्यालयों पर प्रदर्शन की रणनीति भी उलटी पड़ती दिख रही है। इससे यह मैसेज जा रहा है कि भाजपा को किसी भी मुद्दे पर अपनी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन पसंद नहीं है। कांग्रेस कार्यालयों पर भाजपा के प्रदर्शन को छात्र और युवा अपने खिलाफ प्रदर्शन मान रहे हैं। वे भाजपा से पूछ रहे है कि क्या वह छात्रों और युवाओं से लड़ना चाहती है? 

उनका कहना है कि राहुल उनकी बात लेकर प्रदर्शन करने गए थे और वह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं था, फिर क्यों भाजपा उसे राजनीतिक रंग दे रही है। पटना में इसकी गूंज सबसे ज्यादा सुनाई दी। 

प्रधानमंत्री आवास पर राहुल गांधी के प्रदर्शन के खिलाफ बिहार में भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ता कांग्रेस मुख्यालय पर प्रदर्शन करने पहुंचे। लेकिन वहां कांग्रेस के कार्यकर्ता भी तैयार थे, उनकी भिड़ंत हो गई। जिस समय यह प्रदर्शन हो रहा था उसी समय हजारों छात्र पटना में अलग-अलग जगह प्रदर्शन कर रहे थे। छात्रों के साथ ही भाजपा का प्रदर्शन भी जुड़ गया। ऐसा लगा, जैसे भाजपा छात्रों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने कांग्रेस कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। वहां भी भाजपा के इस प्रदर्शन का सकारात्मक संदेश नहीं है।

सीजेपी पर मेहरबान है सरकार

आम तौर पर यह माना गया है और कांग्रेस इकोसिस्टम के लोग तो अब भी मान रहे है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां छात्रों की नाराजगी का लाभ न उठा सके इसके लिए भाजपा ने योजना के तहत कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का गठन कराया। बहरहाल इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार सीजेपी पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रही है। सोमवार, 20 जुलाई को प्रदर्शन पर हुई पुलिस कार्रवाई पर मत जाइए। वह कार्रवाई सीजेपी के लोगों पर नहीं थी। सीजेपी के लोग तो आराम से बैठे रहे। वह कार्रवाई अपनी प्रेरणा से छात्रों के मुद्दे का समर्थन करने पहुंचे लोगों पर थी, जिनमें भीम आर्मी के लोग थे तो जामिया, जेएनयू और डीयू के छात्र भी थे। 

वास्तविकता यह है कि जिस दिन से आंदोलन शुरू हुआ, उस दिन से सरकार सीजेपी पर मेहरबान है। जैसे दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर पहले प्रदर्शन की अनुमति 15 मिनट के अंदर दी थी। सीजेपी ने छह जून को प्रदर्शन का ऐलान कर दिया लेकिन अनुमति नहीं ली। छह जून की सुबह अभिजीत दिपके दिल्ली हवाईअड्डे पर उतरे और वहीं उनसे आवेदन लिया गया और वहीं मंजूरी दे दी गई थी। दूसरी बार भी उन्हें प्रदर्शन की अनुमति हाथोहाथ मिल गई और 28 जून से वहां सोनम वांगचुक अनशन पर बैठ गए। यही नहीं, 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच पार्टी का मंच टूट गया और पुलिस ने वहां से सब कुछ हटा दिया। लेकिन उसी रात नौ बजे के बाद पुलिस वाले वहां खड़े रहे और मंच फिर से बनवाया। मौजूदा स्थिति में यह सब सामान्य बात नहीं है।

पंजाब में अकेले लड़ेगी भाजपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 17 जुलाई को पंजाब यात्रा के दौरान चंडीगढ़ से लेकर जालंधर तक जो राजनीति हुई उससे यह बात और साफ हो गई है कि भाजपा अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने की तैयारी कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी रविदास समाज के डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख निरंजन दास से भी मिले। पिछले साल केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था। 

गौरतलब है कि पंजाब में करीब 33 फीसदी दलित आबादी है। भाजपा इस बार इनके वोट में अच्छा खासा हिस्सा हासिल करने की उम्मीद कर रही है। पंजाब में हिंदू आबादी करीब 38 फीसदी है और 50 से ज्यादा सीटों पर हिंदू मतदाताओं का खासा असर है। भाजपा इन सीटों पर फोकस करके चुनाव लड़ेगी। कहने को तो भाजपा ने भी प्रदेश अध्यक्ष जाट सिख समुदाय के केवल सिंह ढिल्लो को बनाया है, लेकिन सबको पता है कि भाजपा की राजनीति हिंदू वोटों की होती है। कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरे भी जाट सिख समुदाय के हैं। वारिस पंजाब दे नाम से जो नई पार्टी बनी है उसका भी आधार जाट सिख ही है। जाट सिख समुदाय 22 फीसदी के करीब आबादी वाला है लेकिन मालवा क्षेत्र की 69 सीटों पर अच्छा खासा असर रखता है। 

भाजपा को पता है कि चार पार्टियों के बीच जाट सिख वोट बंटता है तो 38 फीसदी हिंदू आबादी ही भाजपा को सबसे बड़ी या दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बना सकती है। इसलिए वह अपने एजेंडे पर अकेले चुनाव लड़ेगी। 

बंगाल में ममता अब भी सबसे लोकप्रिय

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव हार गई हैं। उनकी पार्टी हारी और वे खुद भी हार कर सत्ता से बाहर हो गई। सत्ता गंवाने के बाद उनकी पार्टी भी टूट गई। लेकिन ममता बनर्जी अब भी जनता के बीच बाकी नेताओं से ज्यादा लोकप्रिय हैं, यह उन्होंने मंगलवार, 21 जुलाई को दिखाया। असल में 21 जुलाई को हर साल वे शहीद दिवस मनाती हैं। 1993 में वाम मोर्चा के शासन के दौरान एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से यूथ कांग्रेस के 13 लोगों की जान गई थी। तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद ममता बनर्जी अपने बैनर तले हर साल यह कार्यक्रम करती हैं। इस बार उनकी पार्टी के दलबदलु विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व मे शहीद दिवस का आयोजन किया। उनकी वजह से प्रशासन ने ममता को आयोजन के लिए एस्प्लेनेड के सामने वाली पुरानी जगह नहीं दी। उन्होंने नई जगह पर रैली का आयोजन किया। ऋतब्रत बनर्जी गुट ने अलग रैली का आयोजन किया और इस बार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने भी अलग आयोजन किया। 

तीनों कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा भीड़ ममता बनर्जी की रैली में जुटी और सबसे कम ऋतब्रत बनर्जी के कार्यक्रम में। ममता बनर्जी ने दिखाया कि सड़क पर लड़ने की बात आएगी तो अब भी उनका कोई मुकाबला नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस के कार्यक्रम में जो भीड़ जुटी वह हैरान करने वाली थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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