झारखंड: ‘परीक्षा और पेपरलीक-घोटाला’ कारोबार, कब रोकेगी ‘अबुवा सरकार’!
दिल्ली से लेकर भाजपा शासित उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों समेत पूरे देश में “संस्थाबद्ध परीक्षा और पेपरलीक-घोटाला” के खिलाफ़ जारी आंदोलन की तर्ज़ पर झारखंड के भी छात्र-युवाओं ने आंदोलन की मशाल उठा ली है।
गत 29 जुलाई से राजधानी रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम में जारी धरने और 2 अगस्त से अनशन से लेकर प्रदेश के कई स्थानों पर धरना-प्रदर्शनों व मशाल जुलूस का सिलसिला जारी है।

आक्रोशित छात्र-युवा मांग कर रहे हैं कि हेमंत सोरेन सरकार JPSC और JSSC की परीक्षाओं में हुई पेपर-लीक-धांधली पर तुरंत रोक लगाए व इसके दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने के साथ साथ दोषमुक्त और पारदर्शी-जवाबदेह परीक्षा-प्रणाली लागू करे। साथ ही कई अन्य भी महत्वपूर्ण मांगें हैं जिनपर त्वरित और कारगर क़दम उठाने की आवाज़ उठा रहें हैं।

देर से ही सही लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया है कि उनकी सरकार के आँख-कान हैं और वह पूरे मामले को गंभीरता से देख रही है, न्याय मिलेगा। खबर है की “पेपर-लीक कांड” से जुड़े लोगों पर छापेमारी व धर-पकड़ चल रही है। और छात्रों को भी वार्ता का प्रस्ताव भेजा गया है।
इस मामले में कुछ अद्भुत “खबर-खेला” जैसा मामला भी देखने को मिल रहा है। वह यह कि अभी-अभी दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी छात्र-युवाओं के आंदोलन को केंद्र के सुर में सुर मिलाते हुए “देशद्रोही” तक बताने वाली तथाकथित “मुख्यधारा मीडिया” झारखंड में हो रहे छात्र-युवा आंदोलन को “सुर्ख़ियों” में जगह दे रही है। जो “हृदय-परिवर्तन” तो कत्तई नहीं कहा जा सकता है।
जानकारों के अनुसार चूंकि झारखंड में गैर-भाजपा राज्य सरकार है और विपक्ष में बैठा भाजपा-एनडीए गठबंधन इसे मुद्दा बनाकर “विरोध-राजनीति” में सक्रिय हो गया है। इसीलिए “आदर्श-पत्रकारिता” दर्शाने में कोई कोताही नहीं बरतते हुए उनके नेताओं-प्रवक्ताओं के बयान को “ब्रेकिंग न्यूज़” बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं बल्कि सुदूर असम के मुख्यमंत्री तक के बयान सुर्ख़ियों में हैं।
यह हास्यस्पद ही है कि दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार इत्यादि राज्यों में जहां छात्र-युवाओं पर बर्बर दमन ढाने वाले सत्ताधारी दल के नेताओं के झारखंड में बयान जारी हो रहे हैं कि- “युवाओं के भविष्य के साथ अन्याय स्वीकार नहीं”
यह भी अनोखी घटना है कि जंतर-मंतर से लेकर भाजपा शासित राज्यों में जारी छात्र-युवा आंदोलनों पर पूरी तरह से मौन रहनेवाले छात्र संगठन ABVP ने अचानक से “छात्र-युवा हितों” की ध्वजा लहराते हुए झारखंड में “पेपरलीक और परीक्षा-घोटाला” को झारखंड सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा बना लिया है। स्वाभाविक है कि “भक्त-मीडिया” पूरी वफादारी के साथ “आदर्श-पत्रकारिता” का उच्चतम प्रदर्शन करते हुए अब रांची को “जंतर-मंतर” बनाने-बताने में कोर कसर नहीं छोड़ रही है।
हालांकि इसमें भी अड़चन आ जा रही है कि राज्य सरकार दमन करने की बजाय “धरना-स्थल” पर आंदोलनकारियों को बारिश से बचने के लिए टेंट-व्यवस्था करवा दे रही है।

गौर तलब है कि केन्द्रीय से लेकर विभिन्न राज्यों में वर्षों से जारी “संस्थाबद्ध पेपर-लीक व परीक्षा घोटाला का संगठित कारोबार” का विनाशकारी दंश झारखंड के छात्र-युवा तो राज्य गठन के समय से ही झेल रहें हैं।
मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार के शासन को छोड़ दिया जाय तो राज्य में बनी पहली सरकार से लेकर अबतक सबसे अधिक समय तक भाजपा-एनडीए की ही सरकारें रहीं हैं।
राज्य की सबसे पहली सरकार (भाजपा-एनडीए गठबंधन) द्वारा गठित JPSC संचालित राज्य की पहली ही परीक्षा (2003) भारी विवादों में घिर गयी और मामला हाई कोर्ट तक पहुँच गया। उसके बाद से तो JPSC-JSSC द्वारा आयोजित शायद ही ऐसी कोई परीक्षा अथवा उसके रिजल्ट होंगे, जो विवादों में न घिरे हों अथवा पीड़ित अभ्यर्थी छात्र-युवाओं ने हाई कोर्ट से गुहार न लगाई हो।
हर परीक्षा-रिजल्ट विवाद के बाद सरकारों द्वारा घोषित सीबीआई जांच से लेकर तरह-तरह की कमेटियों की जांच प्रक्रियाओं का आज तक न तो कोई ठोस नतीजा सामने आया है और न ही हाईकोर्ट की डांट-फटकार व फैसलों का असर हुआ है।
JPSC-JSSC की कमेटियों में अधिकांशतः गैर-झारखंडी अधिकारी-कर्मचारियों ही नियुक्त होते रहे हैं, जिनसे झारखंडी मूल के छात्र-युवाओं को कभी कोई सकारात्मक भूमिका की आशा नहीं रही है। वहीं झारखंडी मूल के भी जो अधिकारी-कर्मचारी नियुक्त हुए उनमें से अधिकांश “करप्ट-सिसटम” के हिस्सेदार ही बने रहे। तथापि राज्य में बहालियां होती रहीं हैं और कुछेक अपवादों को छोड़ सब “सेटिंग-गेटिंग” से ही चल रहा है।
निस्संदेह, जंतर-मंतर के आंदोलन ने झारखंड के भी छात्र-युवाओं के वर्षों से दबे हुए विक्षोभ को मुखर बना दिया है। यही कारण है कि इस बार पूरे प्रदेश के छात्र-युवा अपनी अपनी तमाम खेमेबंदियों से निकलकर पहली बार “एक छात्र-समुदाय” बने हैं। अपने भविष्य पर मंडराते “पेपर-लीक और परीक्षा घोटाला” जैसे संकटों से छुटकारा पाने के लिए पूरी एकजुटता के साथ सड़कों पर आंदोलनरत हैं। जिसपर ‘अबुवा सरकार” को पहले ही गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए था।
छात्र-युवाओं के जारी आंदोलन को खुलकर अपना सक्रिय समर्थन दे रही कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा माले द्वारा व्यक्त सुझाव बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हैं।
सुझाव में कहा गया है कि- इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन स्वयं पहल कर आंदोलनरत छात्र युवाओं से मिलें और शिक्षा-व्यवस्था में व्याप्त अनियमितताओं को ज़ल्द से ज़ल्द ठीक करने के लिए सरकार के भीतर ज़िम्मेदारियों को तय करें। क्योंकि यह भी सच है कि राज्य में लचर शिक्षा-व्यवस्था को सुधारने और स्थानीयता के आधार पर रोजगार-नीति लागू करने के मामले में सरकार विफल रही है।
सरकार से यह भी कहा गया है कि- जेपीएससी के अध्यक्ष एल. खियांग्ते पर संलिप्तता के गंभीर आरोपों को देखते हुए जेपीएससी आयोग को अविलंब भंग कर दिया जाना चाहिए और जेपीएससी का पुनर्गठन मानकों के आधार पर पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए।
जेपीएससी द्वितीय द्वारा परीक्षा में घपलेबाजी की जांच में सीबीआई द्वारा किए गए विलंब पर जवाब देने के बजाय, मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री संजय सेठ द्वारा सीबीआई जांच की मांग भाजपा के अपनों को बचाने की कवायद है। मोदी सरकार और भाजपा का छात्र-युवा द्वेष पूरी दुनिया ने जंतर-मंतर में देख लिया है।
इस पहलू को भी उल्लेखित किया गया है कि- हेमंत सरकार आँख मूँदकर मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति और कलस्टर-योजना को लागू कर रही है, जिससे राज्य के व्यापक आदिवासी दलित, पिछड़े तबकों तथा सुदूर इलाकों के छात्र बुरी तरह से प्रभावित होंगे। यदि हेमंत सरकार इस तथ्य को समझ नहीं पाई है, तो यह उसकी बड़ी विफलता है।
हेमंत सरकार को अपने संघीय अधिकारों के तहत राज्य सरकार को केंद्र को मुकम्मल तरीके से ज़िम्मेदारी के लिए मजबूर करना चाहिए और मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहिए।
बहरहाल, देखना है कि कितनी ज़ल्द ज़मीनी धरातल पर राज्य सरकार अपनी भूमिका में नज़र आती है। जबकि राज्य में छात्रों-युवाओं का विक्षोभ और आंदोलन निरंतर विस्तार लेता जा रहा है। 7 अगस्त को विधानसभा घेराव का ऐलान है और जंतर-मंतर की चर्चित छात्र-आंदोलनकारी और AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा भी आंदोलन के समर्थन में रांची पहुँच रहीं हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और एक संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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