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सोनम वांगचुक और युवाओं का अनशन, छात्र राजनीति और ख़ामोश सरकार !

“जब जवाबदेही सरकार और तंत्र के लिए आउट ऑफ़ सिलेबस हो जाए तो आंदोलन को हमें सिलेबस में लाना ही होता है''
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दिल्ली की उमस भरी गर्मी में स्टेज पर सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक निढाल पड़े थे, लेकिन चेहरे पर हमेशा की तरह मुस्कुराहट थी, सामने समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज थी जो उन्हें समर्थन देने के लिए पहुंची थीं। 

दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक मामले के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन चल रहा है। और मंगलवार को जिस दिन मैं यहां पहुंची उस दिन सोनम वांगचुक के अनशन का 17वां दिन था। बुधवार, 15 जुलाई को उनके अनशन का 18वां दिन हो गया। 

कहां गुम है मेन स्ट्रीम मीडिया ?

सोनम वांगचुक का वजन लगातार घट रहा है और सेहत बिगड़ रही है, लेकिन वे अब तक अनशन ख़त्म करने के मूड में नज़र नहीं आ रहे, मेन स्ट्रीम मीडिया की तरफ से बिल्कुल नज़र अंदाज़  वांगचुक का अनशन बीच में ग़ायब सा हो गया था लेकिन उनकी बिगड़ती सेहत ने सोशल मीडिया पर तूफ़ान मचा दिया। 

और एक बार फिर जंतर-मंतर का माहौल बदलने लगा, सिविल सोसाइटी के लोग, नेता,अभिनेता और सोशल मीडिया एन्फ़्युलेंसर यहां नज़र आने लगे। जब हम यहां पहुंचे तो माहौल बहुत कुछ याद दिला रहा था। 

2011 से 2026 के बीच कितने बदल गए दिल्ली वाले !

साल था 2011 और रामलीला मैदान में लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे का अनशन चल रहा था स्टेज पर एक चेहरा अपनी सफ़ेद शर्ट की तरह चमक रहा था, ये थे अभिनेता आमिर ख़ान। मैदान में अच्छी ख़ासी भीड़ थी और लगभग सभी न्यूज़ चैनल लगातार लाइव फीड काट रहे थे। एक लंबी और थका देने वाली ऑफ़िस की शिफ्ट के बाद मैं भी इस आंदोलन में पहुंची थी। रास्ते में लोगों का एक रेला साथ चल रहा था, एक पिता ने अपने बच्चे को कंधे पर बैठा रखा था और उस बच्चे के हाथ में तिरंगा झंडा था, ये तस्वीर मेरे ज़ेहन ने हमेशा के लिए क्लिक कर ली। मैं सोच रही थी कि आज़ादी की लड़ाई के लिए गांधी जी की पुकार पर लोग ऐसे ही घरों से निकले होंगे, हाथों में तिरंगा लिए। 

उस आंदोलन का हासिल क्या था हम सबने देखा। उस दौरान जो हीरो लग रहे थे आज वे क्या हैं और कहां हैं, सबकुछ समाज के सामने है। वहीं फिल्मों में विलेन का किरदार निभाने वाले सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं, जो समाज के लिए एक सबक़ है कि रील और रियल लाइफ़ हीरो में कितना बड़ा अंतर होता है।  

बहरहाल, यहां बात मौजूदा आंदोलन की जो जंतर-मंतर पर चल रहा है, जैसे ही हम यहां पहुंचे जगह-जगह पोस्टर और बैनर लगे थे, छात्रों की टोलियां देशभक्ति तराने गा रही थीं, और सोनम वांगचुक के साथ ही लगातार अनशन कर रहे आइसा के छात्र एक अलग टैंट में बैठे थे। इसके अलावा लगातार धरना दे रहे छात्र अलग-अलग जमा थे। कई जगह पन्नियों के नीचे कैंप से लगे थे। ये छात्र सोनम वांगचुक के साथ शिक्षा व्यवस्था बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं। साथ दे रहे हैं भीषण गर्मी, बारिश और अब शदीद उमस में। 

सोनम वांगचुक का अनशन तय करेगा आगे की दिशा ? 

जंतर-मंतर पर हमेशा धरना-प्रदर्शन होते रहते हैं, लेकिन ये प्रदर्शन कुछ अलग है और इसके परिणाम भी ( चाहे वो जो भी हो ) आगे के लिए एक बड़ा संदेश साबित होने वाले हैं।

यहां हमने देखा कि हर तरफ भगत सिंह और बाबा भीम राव आंबेडकर की तस्वीरे लगी थीं और साथ ही मौजूद थे (अप्रत्यक्ष रूप से) आज़ादी की लड़ाई में योगदान देने वाले वे लोग जिनके लिखे नारे और तराने तो दोहराए जाते हैं लेकिन उन्हें भुला दिया गया,ऐसा ही एक नारा है 'इंक़लाब ज़िन्दाबाद' जिसे लिखा था हसरत मोहानी ने। 

 

अब भी उम्मीद बाक़ी है 

आज जब ये साबित करने की पुरज़ोर कोशिश चल रही है कि आज़ादी की लड़ाई में किसका योगदान था और किसका नहीं उस दौर में जंतर-मंतर पर 'इंक़लाब ज़िन्दाबाद' और 'बोल की लब आज़ाद हैं तेरे'  जैसे तराने गाते हुए लोगों ने साबित कर दिया कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों को कभी नहीं भूला जा सकता। 

ये तमाम पोस्टर, नारे और क्रिएटिव तरीक़े, और  ख़ुद को व्यक्त करते ये युवा याद दिला रहे थे कि आंदोलन का हासिल सिर्फ़ किसी मांग की पूर्ति नहीं होती बल्कि ये अभिव्यक्ति की आज़ादी की याद दिलाती है। वे भी उस वक़्त जब इसे हर तरह से दबा दिया गया हो।  

जिस दौर में छात्र राजनीति करना मुश्किल हो गया है, छात्रों पर FIR दर्ज हो रही हैं उस दौर में अगर छात्र सोनम वांगचुक के साथ धरने पर बैठे हैं तो ये बड़ी बात है। 

क्या हो सकते हैं छात्र राजनीति के परिणाम ? 

यहां हमें आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा मिली वे भी अपने साथियों के साथ पिछले 18 दिन से अनशन पर बैठी हैं, उनके साथ ही इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मनीष कुमार और अंबेडकर यूनिवर्सिटी के छात्र अमीन भी अनशन कर रहे हैं । इन छात्रों की भी सेहत हर दिन बिगड़ती जा रही रही है, वजन घट है। 

जब हमने नेहा से पूछा कि एक न एक दिन ये आंदोलन ख़त्म हो जाएगा और उसके बाद जैसा की होता आया है, पुलिस-प्रशासन के निशाने पर आंदोलन में हिस्सा लेने वाले छात्र आ जाते हैं तो क्या वे इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं? 

इसके जवाब में वे कहती हैं कि ''हम छात्र इस चीज़ से वाक़िफ़ हैं कि छात्र राजनीति की एक क़ीमत है''  वे आगे कहती हैं कि ''हम समझते हैं कि एक सोनम वांगचुक पर NSA लग सकता है, एक उमर ख़ालिद पर लोकतंत्र और समान नागरिकता के लिए प्रोटेस्ट करने पर UAPA लग सकता है, तो स्टूडेंट एक्टिवज़्म के क्या परिणाम हो सकते हैं'' 

शिक्षा पर बुलडोज़र चला दिया 

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी के छात्र और आइसा एक्टिविस्ट मनीष कुमार भी पिछले 18 दिन से अनशन पर बैठे हैं जब हमने उसने पूछा कि वे क्या सोचते हैं छात्र राजनीति के बारे में और वे क्यों इस अनशन पर बैठे हैं तो उनका जवाब था ''नीट का सवाल ज्वलंत सवाल था, जिसने देश को झकझोर दिया, लेकिन उसके साथ ही देश के विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( NEP) के द्वारा बर्बाद किया जा रहा है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी की फ़ीस जो पांच सौ रुपए थी मैं उसी फ़ीस पर अपनी पीएचडी कर रहा हूं, अब वो फ़ीस बढ़कर 20 हज़ार रुपए हो गई है, और सालाना फ़ीस अलग से, साथ ही पब्लिक फंडड यूनिवर्सिटीज़ को बर्बाद किया जा रहा है, तो इस देश के जो शिक्षा मंत्री है उनसे सिर्फ़ नीट के स्टूडेंट परेशान नहीं हैं, हम विश्वविद्यालय के छात्र भी परेशान हैं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र इनके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं, लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र इनके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं, इसी सरकार का आंकड़ा है पिछले 10 सालों में 94 हज़ार स्कूल बंद हो गए, लाखों नौकरियां ख़त्म हो गई हैं, इस देश में शिक्षा और रोज़गार पर भाजपा की जो डबल इंजन की सरकार है उसका बुलडोज़र चल रहा है उन सब से हम पीड़ित हैं, नीट पेपर लीक के सवाल पर 22 छात्रों ने जो आत्महत्या की उनको न्याय दिलाने के सवाल पर, धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ेगा इस सवाल पर, NTA जैसी एज़ेंसी जिसे पेपर लीक करवाने के लिए ही लाया गया है, उसे बंद किया जाए यही हमारा कहना है'' 

आंदोलन को सिलेबस में लाना पड़ा 

वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और KYS की एक्टिविस्ट मुदिता का कहना है कि ''25 दिन से हम यहां दिल्ली के जंतर-मंतर पर हैं, जिस देश में 25 दिन से छात्र और युवा सड़कों पर सो रहा है, जग रहा है, आंधी, तूफ़ान, बारिश के बीच वहां की सरकार के पास 25 मिनट भी नहीं हैं। इतने दिन में आज हमें ये बात समझ में आ गई है कि जब जवाबदेही सरकार और तंत्र के लिए आउट ऑफ सिलेबस हो जाए तो आंदोलन को हमें सिलेबस में लाना ही होता है''

वैसे ये बात हैरान करने वाली है कि जिस आंदोलन को क़रीब-क़रीब एक महीना होने जा रहा है और जिसमें 18 दिन से सोनम वांगचुक समेत कई युवा छात्र अनशन पर बैठे हैं आख़िर अब तक सरकार की तरफ से उनसे कोई बातचीत क्यों नहीं की गई? आख़िर अपने ही देश के लोगों से बातचीत न करने की क्या वजह हो सकती है। 

20 जुलाई को संसद चलो की अपील

इस बीच सिविल सोसाइटी और चर्चित चेहरे सोनम वांगचुक से अनशन ख़त्म करने की अपील कर रहे हैं, उधर सीजेपी ने सोनम वांगचुक और छात्रों के समर्थन में 16 जुलाई को सामूहिक भूख हड़ताल का आह्वान किया है।

इससे पहले सोनम वांगचुक 20 जुलाई को संसद चलो का आह्वान कर ही चुके हैं-

कितनी अजीब बात है जिस देश ने अपने आंदोलनों और अनशन से अंग्रेजों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था आज उस देश में दुनिया भर में देश का नाम रौशन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद और छात्रों की जान पर बन आई है लेकिन सरकार की तरफ से बातचीत तो दूर उसकी कोई कोशिश भी दूर-दूर तक नज़र नहीं आती । 

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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