तिरछी नज़र: लोकतंत्र की पंचवर्षीय फिटनेस परीक्षा
पांच राज्यों में चुनाव सम्पन्न हो गए हैं। लोकतंत्र ने फिर से अपनी पंच वर्षीय फिटनेस परीक्षा दे दी है। अब वोट ईवीएम में विश्राम कर रहे हैं—जैसे किसी सरकारी दफ्तर में फाइलें, जिन्हें चार मई तक जब मर्जी बदला जा सकता है। और इन ईवीएम का भविष्य चार मई को ही खुलेगा। तब तक जनता, दल और चैनल—तीनों एग्जिट पोल के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। असली परिणाम आने तक अनुमान ही हमारा राष्ट्रीय मनोरंजन है। और जिन्हें इसमें मनोरंजन नहीं मिल रहा हो, उनके लिए आईपीएल तो है ही।
देश में चुनाव हुए, होने भी चाहिए। राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़े, लड़ने भी चाहिए। परिणाम आएंगे, आने भी चाहिए। आखिर लोकतंत्र का यही सौंदर्य है कि हर पांच साल में जनता को यह अवसर दिया जाता है कि वह तय करे कि अगले पांच साल तक उसकी कौन अनसुनी करेगा और कौन उसके कष्टों का कारण बनेगा।
इस बार पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हुए। वैसे वहां चुनाव हर पांच साल में होते हैं, और तब तक होते रहेंगे जब तक कि लोकतंत्र को किसी और प्रयोगशाला में तब्दील न कर दिया जाए। बंगाल के चुनाव हमेशा महत्वपूर्ण होते हैं, और सरकार जी के लिए तो वे इतने नाक का सवाल होते हैं कि मानो देश की जीडीपी, विदेश नीति और मौसम, सबका भविष्य वहीं से तय होना हो। 2016 में भी उन्होंने पूरा जोर लगाया था, 2021 में भी। हर बार उनका चुनावी रथ बंगाल की सीमा तक पहुंचता है, खूब धूल उड़ाता है, और फिर वहीं का वहीं खड़ा रह जाता है।
इस बार भी जोर कम नहीं लगाया गया। लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रशासनिक, अर्ध-प्रशासनिक और परा-प्रशासनिक प्रयास किए गए। पहले एसआईआर करवाई गई। लाखों वोटों को लोकतंत्र से जबरन रिटायर कर दिया गया। बिहार मॉडल जब इतना सफल रहा तो उसका फ्रेंचाइज़ी विस्तार बंगाल तक तो होना ही था। आखिर सफल प्रयोगों का विस्तार ही तो सुशासन की पहचान है।
फिर अफसरों का स्थानांतरण हुआ। चुनाव में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए वही अफसर लगाए गए जो निष्पक्षता को इतनी कुशलता से निभा सकें कि वह सीधे सत्ता पक्ष के पक्ष में जा गिरे। यूपी, बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में ऐसे प्रतिभाशाली अफसरों की कोई कमी नहीं है। वे लोकतंत्र के ऐसे कारीगर हैं जो मतपेटी से मनचाहा परिणाम निकालने की कला में निपुण होते हैं। बंगाल, केरल और तमिलनाडु के अफसर भी कम योग्य नहीं, पर उनकी योग्यता का सम्मान इसी में समझा जाता है कि चुनाव के समय उन्हें सम्मानपूर्वक किनारे कर दिया जाए।
वैसे चुनाव आयोग भी पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभा रहा है। अपने नियोक्ता का वफादार बना हुआ है। पर सरकार जी का स्वभाव थोड़ा आत्मनिर्भरता का है। वे चाहते हैं कि जीतें तो अपनी मेहनत से जीतें, और हारें तो इतनी मेहनत के बाद हारें कि शिकायत करने का मौका न रहे। इसी आत्मनिर्भरता के कारण वे इस बार बंगाल में लगभग पंद्रह दिन डेरा डाले रहे। दुनिया में कहीं युद्ध हो, देश में गैस संकट हो, लोग सिलेंडर के लिए कतारों में खड़े हों, ये सब स्थानीय समस्याएं हैं। राष्ट्रीय समस्या तो यह थी कि बंगाल में चुनाव कैसे जीता जायेगा।
वैसे देशहित में एक सुझाव है। सरकार जी की पार्टी को चुनाव लड़ना बंद कर देना चाहिए। इससे सरकार जी को देश चलाने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। अभी तो साल के तीन-चार महीने चुनावों में ही निकल जाते हैं। बाकी समय अगले चुनाव की तैयारी में। ऐसे में शासन कब हो, कैसे हो, यह बस एक अकादमिक प्रश्न बनकर रह जाता है।
और जहां तक राज्यों में अपनी सरकार बनाने का प्रश्न है, उसके लिए चुनाव ही एकमात्र उपाय तो नहीं हैं। हमारे पास ईडी है, सीबीआई है, आयकर विभाग है। लोकतंत्र के ये आधुनिक औजार किसी भी चुनाव परिणाम को अधिक व्यावहारिक बना सकते हैं। और फिर विधायक खरीदने के लिए संसाधनों की भी कोई कमी तो नहीं है। लोकतंत्र में पूंजी का भी अपना योगदान होता ही है।
सरकार जी यह कला पहले भी प्रदर्शित कर चुके हैं और हाल में भी। पंजाब से राज्यसभा सदस्य खरीदने की घटना इसका ताजा उदाहरण है। जहां आपके अपने विधायक उंगलियों पर गिने जा सकें, उस राज्य से राज्यसभा सदस्य हों, साधारण राजनीतिक उपलब्धि नहीं, यह संसदीय रसायनशास्त्र है। जहां आलू डालो और सोना निकल आए। पैसा डालो और राज्यसभा सांसद मिल जाएं।
आखिर जब मिठाई सीधे बाजार में उपलब्ध हो, तो पहले दूध खरीदना, उसे उबालना, खोया बनाना, चीनी मिलाना, कड़ाही चलाना—इतनी मेहनत कौन करे? और फिर भी गारंटी नहीं कि मिठाई ठीक बने। इससे अच्छा है कि सीधे तैयार मिठाई खरीद ली जाए। न खराब बनने का डर, न मेहनत की झंझट। जितनी चाहिए, उतनी खरीदिए। समय भी बचेगा, धन भी। और जो तन-मन-धन बचेगा, उसे देश की उन्नति में लगाया जा सकता है। मतलब अगले चुनाव में लगाया जा सकता है।
(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)
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