रामशरण शर्मा ने इतिहास को मिथको व गाथाओं से बाहर निकाला
पटना। प्रगतिशील लेखक संघ की पटना ईकाई की ओर से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इतिहासकार रामशरण शर्मा की 15वीं पुण्यतिथि के अवसर पर एक परिचर्चा का आयोजन मैत्री शांति भवन में किया गया। इस अवसर पर शहर के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता आदि मौजूद थे।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए रौशन प्रकाश ने कहा कि ‘रामशरण शर्मा ने उत्पादन प्रणाली को इतिहास लेखन का आधार बनाया। पहले इतिहास को पुराणों और वैदिक ग्रंथों के आधार पर लिखा जाता था लेकिन रामशरण शर्मा ने ऐतिहासिक साक्ष्यों को सामने रखा। जब अयोध्या का विवाद हुआ तो उन्होंने साक्ष्य अपनी बातें रखीं।’’
लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता अभय कुमार पांडे ने अपने संबोधन में कहा ‘रामशरण शर्मा इतिहास लेखन के माइल स्टोन थे। उनकी किताब ‘शूद्रों का इतिहास’, ‘भारतीय सामंतवाद’ ने खूब विवाद पैदा किया। यहां तक कि मार्क्सवाद के अंदर ही विवाद पैदा हुआ। अब जबकि उत्पादन के तरीके बदल डाले वैसे में कल्चर, बोलियों आदि को भी इतिहास लेखन में समाहित करने की जरूरत है। डी. डी कोसांबी से लेकर आर.एस.शर्मा ने भारतीय इतिहास लेखन में बड़ा योगदान किया।’
पटना विश्विद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे जयदेव मिश्रा ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए कहा ‘रामशरण शर्मा पर राहुल सांकृत्यायन, स्वामी सहजानंद सरस्वती और कार्यानंद शर्मा का बहुत प्रभाव था। वे हमेशा तथ्यों और साहित्य को स्रोत के बतौर देखने की बात करते थे। जब तक विश्वसनीय स्रोत को नहीं कहेंगे तब तक इतिहास नहीं लिखा जायेगा। अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए। जब भी मिलते थे कि पूछते थे कि क्या लिख- पढ़ रहे हो, कुछ छपा है या नहीं? 1959 में उनकी किताब आई पॉलिटिकल आइडियाज इन एंशियंट इंडिया आई थी। सामंतवाद को लेकर जबर्दस्त बहस हुई। वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, वर्ल्ड हिस्ट्री कांग्रेस के उच्च पदों पर रहे। उनकी मानवता थी कि कोई आदमी उनके यहाँ जाता था तो वे उसको गेट तक छोड़ने के लिए जाते थे। सामान्य घर से आकर बहुत ऊंचाई तक गए। वे कहा करते थे कि घूमने फिरने के लिए दूसरी जगहें हैं लेकिन रहने की जगह पटना ही है। जहां भी खुदाई होता वे रिक्शा, टैंपो या कुछ भी करके जाते थे। उनकी लेखनी से इतिहास दृष्टि का पता चलता है। उनके पहले कलकता, मुंबई और अहमदाबाद मुख्य केंद्र था। लेकिन पटना स्कूल ऑफ हिस्ट्री भी बहुत महत्वपूर्ण था। सत्य की खोज बिना वैज्ञानिक हुए नहीं अब सकते।’’
पटना विश्विद्यालय में प्राचीन इतिहास के प्रोफेसर रहे कामेश्वर प्रसाद ने कहा ‘मै सौभाग्यशाली हूं कि मैं एम.ए में उनका छात्र था। मुझे उनसे पढ़ने का अवसर मिला। फिर जब वे विभागाध्यक्ष थे मैं वहीं प्राध्यापक नियुक्त हुआ। कभी-कभी मेरे घर भी आ आया करते थे। मुझसे एक गुरु के रूप में उनका निकट का आनंद था। उनकी पहली पुस्तक ‘विश्व इतिहास की झलक’ थी। रामशरण शर्मा और राधाकृष्ण चौधरी इन दोनों के कारण एक दौर में बिहार इतिहास का सबसे लोकप्रिय विषय हो गया था। उन्होंने ए.एल.बाशम के अंदर पी.एच.डी किया था। वे न सिर्फ खुद शोध करते थे बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते थे। उन्होंने कहा कि संस्कृत ही नहीं बल्कि पुरातत्व के आधार पर रिसर्च किया करो। जब वे आई.सी.एच आर में थे तो लोगों को संसाधन मुहैया कराते थे। बिना राजनीतिक पृष्ठभूमि के आप सामाजिक आर्थिक इतिहास नहीं लिख सकते। जो पैटर्न इंडियन फ्यूडलिजम में उभरता है वही बाद में सब जगह दिखाई पड़ता है। वैसे ही वे बताते हैं कि तंत्रवाद की उत्पत्ति ट्राइबल क्षेत्रों से हुई जहां से ब्राह्मणों ने उसे अपनाया। इतने विदेशी शासक आए लेकिन सबों को वर्णव्यवस्था में समाहित कर क्षत्रिय बना दिया गया। रामशरण शर्मा ने साहित्यिक स्रोतों के साथ साथ पुरातात्विक साक्ष्यों को भी आधार बनाया। उनके पहले इतिहास के उतने ज्यादा स्रोत उपलब्ध नहीं थे।’’
पटना विश्विद्यालय में लोक प्रशासन के प्रोफेसर सुधीर कुमार ने बताया ‘हर व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता। समाज का निर्माण सामूहिकता से होता है। श्रम का विभाजन उत्पादन के साधनों का नियंत्रण होता है। समाज, अर्थव्यवस्था आदि का विश्लेषण किया है। भारत और इतिहास यूरोप से बहुत अलग नहीं था। उनके पहले की किताबों में यह थोड़ा कम मिला करता था। उन्होंने अपने विचार के आधार पर चलने के लिए बहुत लोगों को तैयार किया।’
माकपा नेता अरुण मिश्रा ने बताया ‘रामशरण शर्मा मार्क्सवादी इतिहासकार थे। मार्क्स के पहले राजा-रानी की कहानियों की चर्चा होती थी लेकिन मार्क्स ने उत्पादन संबंधों के आधार पर लिखने की बात की थी। कम्युनिस्ट पार्टी में आने के बाद ‘शूद्रों का इतिहास’, ‘भारतीय सामंतवाद’, नगरों का पतन जैसी किताबों को पढ़ने का मौका मिला तब हमें उनकी दृष्टि का पता चलता है। पहले जो इतिहासकार हाशिये पर थे वे आज मुख्यधारा में आये हैं। वे छोटे-छोटे उदाहरणों के जरिए इतिहास को जीवंत बना देते थे। उनके आलोचक मार्क्सवाद को यूरोप से आयातित मानकर उसकी वैज्ञानिकता को खत्म कर देने की बात करते थे। आज बगैर तथ्य के झूठ का सहारा लिया जा अहा है। वे ज्योति पुंज की तरह थे।’’
प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव अनीश अंकुर ने बताया ‘रामशरण सांप्रदायिक ताकतों के उभार से काफी दुखी रहा करते थे। वे ऐतिहासिक भौतिकवाद को सुगम भाषा में समझाते हुए कहते ‘नो प्रोडक्शन, नो हिस्ट्री’। आज उनकी यह प्रस्थापना कि आर्य बाहर से आए थे इसपर जबसे भाजपा सरकार बनी तबसे हमला बढ़ा गया है। शूद्रों की उत्पत्ति के संबंध में आंबेडकर की अवधारणा को दुरुस्त किया वहीं मार्क्स की एशियाटिक मोड ऑफ प्रोडक्शन संबंधी समझ को भी ठीक किया था कि धातु और नमक के लिए बाहर निर्भर रहना पड़ता है। रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के समय राष्ट्र के नाम इतिहासकारों की रपट लिखा था जिसका पालन न करने का परिणाम आज पुरा देश भुगत रहा है।’’
सभा को संस्कृतिकर्मी अनिल अंशुमन और विजयेंद्र कुमार ने भी संबोधित किया। अध्यक्षीय वक्तव्य रामलाला सिंह ने किया।
परिचर्चा में शामिल प्रमुख लोगों में महेश प्रसाद, रजत घोष, शगुफ्ता राशिद, रमेश सिंह, अनिल लोधीपुरी, आनंद शर्मा, गौतम गुलाल, लदेव वर्मा, अजीत आनंद आदि थे।
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