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100 दिन में सीवर में 50 मौतें: कब बुलाओगे विशेष सत्र?

सीवर में मौतों को सिलसिला लगातार जारी है। सरकार ने विभिन्‍न राजनीतिक कारणों से महिला आरक्षण बिल पर तो विशेष सत्र बुलाया लेकिन क्‍या मैलाप्रथा और सीवर में मौत रोकने के लिए विशेष सत्र बुलाएगी?
SKA

पिछले 100 दिनों में 50 भारतीय नागरिकों की सीवर सफाई के दौरान मौत हुई जिसे हत्याएं कहा जाना चाहिए। इस वैज्ञानिक युग में 21वीं सदी के 2026 में जब हमारा चंद्रयान चांद पर पहुंच गया है। मंगलयान को मंगल ग्रह पर भेजा जा रहा है ऐसे में क्‍या सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए मशीने नहीं बनाई जा सकतीं? आज A.I. का जमाना है। अगर सरकार की इस मुद्दे पर उदासीनता न हो। इसे गंभीरता से ले तो देश के किसी भी नागरिक को इन मौत के सीवरों से बचाया जा सकता है। 
फिर सरकार ऐसा क्‍यों नहीं करती? यानी हमारी ज़िंदगी व मौत उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। 
सरकार की जातिवादी सोच की वजह से सीवर-सेप्टिक टैंक में सफाई करते हुए हमारे लोग मौत के गटर में ढकेले जा रहे हैं और इन हत्याओं के लिए किसी को भी आज तक सजा नहीं हुई, जबकि कानून गटर में किसी भी इंसान को उतारना अपराध बताता है। फिर भी रोज लोगों को देश भर में मौत के गटर में ढकेला जाता है। 
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) पिछले 40 वर्षों से देश से मैला प्रथा उन्‍मूलन के लिए आवाज उठा रहा है। हाल ही में 25 मार्च 2026 को जंतर मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय में सीवर में हो रही मौतों को रोकने के लिए ज्ञापन दिया। मैला प्रथा उन्‍मूलन और सीवर में मौतें रोकने के लिए SKA का संघर्ष लगातार जारी है।
क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ पर!
कहने को तो सरकार ने मैलाप्रथा उन्‍मूलन के लिए और सीवर में मौतें रोकने के लिए दो-दो कानून बना रखे हैं। पहला कानून वर्ष 1993 में बना और दूसरा 2023 में । इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी 27 मार्च 2014 और 20 अक्‍टूबर 2023 को आया। इन कानूनों के मुताबिक किसी व्‍यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई करने के लिए उतारना कानूनी अपराध है। इसके लिए जिम्‍मेदार व्‍यक्ति के लिए सजा का प्रावधान है।
एक मौत का मतलब, जानते हैं आप?
सीवर में यदि एक व्‍यक्ति की जान जाती है तो सिर्फ इतना ही नहीं है कि देश के एक नागरिक की सीवर में हत्‍या कर दी गई। इसके साथ ही एक परविार का चिराग हमेशा के लिए बुझ जाता है। एक औरत विधवा हो जाती है। कई बच्‍चे अनाथ हो जाते हैं। उनके परिवार का एकमात्र कमाने वाला चला जाता है। कैसे होता होगा उस परिवार का गुजारा? क्‍या सरकार कभी सोचती है? क्‍यों है सरकार इतनी संवेदनहीन?
सफाई कर्मचारी आंदोलन के नेता बेजवाड़ा विल्‍सन ने अपनी एक एक्‍स पोस्‍ट में लिखते हैं :
नूंह में दो और मौतों के साथ, इस साल 100 से कुछ ज़्यादा दिनों में ही सीवर औ सेप्टिक टैंक में 50 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है! लेकिन हमारी संसद इस बर्बर, जाति-आधारित प्रथा पर चर्चा करने और इसे ख़त्म करने के लिए कभी कोई विशेष सत्र नहीं बुलाएगी!

सीवर-सेफ्टिक टैंक में हो रही इन हत्याओं को रोकने के लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन 11 मई, 2022 से एक देशव्यापी अभियान चला रहा है #StopKillingUs  #हमें मारना बंद करो। आंदोलन से जुड़े लोग रोजाना सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करते हैं। सरकार इन हत्याओं को बंद करने, देश को मैला प्रथा से पूरी तरह से मुक्त करने के बजाय, सिर्फ आंकड़ों को कम दिखाने की बाज़ीगरी कर रही है।
जातिवादी मानसिकता वाली सरकार हम सफाई कर्मचारियों को देश का नागरिक ही कहां मानती है जो हमारी सुरक्षा की गारंटी ले। कोई सख्त आदेश जारी करे जिससे एक भी सफाई कर्मचारी की सीवर-सेफ्टिक टैंक में मौत न हो। सीवर-सेफ्टिक टैंकों की सफाई के लिए मशीनीकरण अनिवार्य करे। संवेदनशील मुद्दों पर चुप्पी साधने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या इस मैलाप्रथा के समूल नाश के लिए लाल किले से घोषणा करेंगे? या संसद का विशेष सत्र बुलाएंगे?
हमारे देश में कई सामाजिक बुराईयां हैं। इन बुराईयों में जातिगत भेदभाव एवं जाति आधारित ऊंच-नीच की भावना भी है। इसी के तहत लोगों के पेशों को भी जाति आधारित यानी जन्म से निर्धारित कर दिया गया। अर्थात जो जिस जाति में जन्म लेगा उसको उसी जाति का पेशा अपनाना होगा- ऐसी परम्परा बना दी गई। यहां तक कि अनुसूचित जाति के अन्तर्गत आने वाली कुछ जाति विशेष के लोगों से तो मानव मल साफ करवाने का अमानवीय कार्य भी थोप दिया गया। और लोग सदियों से उसे अपना काम और कर्तव्य समझ कर करते आ रहे थे। अभी भी लाखों लोग कर रहे हैं। यह मनुवादी व्‍यवस्‍था है।
पर संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिक बराबर हैं और सब को इज्जत के साथ जिन्दगी जीने का अधिकार है। किन्तु मैला ढोना जैसी अमानवीय प्रथा का जारी रहना इस बात का प्रमाण है कि यहां का संविधान कुछ भी कहे पर सामाजिक प्रथाओं का प्रचलन बदस्तूर जारी रहता है। मैला ढोना भी एक ऐसी ही प्रथा है।
देश के विकास के दावे और दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की घोषणा के बीच भारत में आज भी अपने लोग सीवर-सेप्टिक टैंक में मारे जा रहे हैं। हर दूसरे तीसरे दिन एक भारतीय नागरिक को गटर में मारा जा रहा है। यह राष्ट्रीय शर्म की बात है, सरकार की इस मुद्दे पर चुप है। बाबा साहेब का संविधान सभी नागरिकों को गरिमा से जीने का अधिकार देता है (Right to life with Dignity RL-21), लेकिन सफाई कर्मचारियों को इससे वंचित रखा गया है। छुआछूत और जातिगत भेदभाव की वजह से हमारी मौत को भी सरकारें छुपा रही हैं, उनके आंकड़ों में गटर में मारे गये लोगों की असली संख्या तक नहीं दर्ज होती है। देश आजादी का 79वां महोत्‍सव करने जा रहा है और हमारे लोगों को जातिगत दंश की इस अमानवीय प्रथा में ढकेला जा रहा है। हमारी मौत के साथ भी भेदभाव!
सफाई कर्मचारी आंदोलन मांग करता है कि सरकार:
* सीवर-सेप्टिक टैंक में मरने वालों का सही आंकड़ा देश के सामने रखें।
 * गटर में मौतों को तुरंत रोकने समयबद्ध एक राष्ट्रीय एक्शन प्लान की घोषणा करें।
 * सफाई कर्मचारियों के लिए RL-21 यानी सम्मान से जीने की गारंटी करें।
* गटर में मौत के लिए वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो।
(लेखक एक स्वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
 

 

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