ब्राह्मण बनाम ब्राह्मणवाद: हंगामा है क्यों बरपा
दिनों-दिन और जाहिल हो रहे हैं
न जाने क्या पढ़ाया जा रहा है
ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद: यह इतनी बेसिक बात है, जिसे लेकर लगता था कि इस पर बात क्या करनी!, इसका फ़र्क़ तो सब जानते होंगे। अगर आपने थोड़ा भी सामाजिक विज्ञान पढ़ा होगा या नहीं भी पढ़ा होगा लेकिन अपने घर-परिवार और आसपास के समुदाय/समाज को थोड़ा भी देखते-समझते होंगे। जाति की सत्ता और सत्ता की राजनीति की ज़रा भी समझ रखते होंगे तो इसे बख़ूबी पहचानते होंगे। लेकिन नहीं, आज जिस तरह का नैरेटिव बनाया जा रहा है, उससे लगता है कि कुछ चालाक जातिवादी लोग जानबूझ कर इसे मिक्स कर देना चाहते हैं, एक भ्रम बना रहने देना चाहते हैं ताकि उनका विशेषाधिकार बना रहे, राजनीतिक रोटियां सिंकती रहें और कुछ लोग इनके झांसे में या वाकई अनजाने ही इसे एक समझकर आहत होते रहें।
तो मोटी बात यह है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद एक नहीं हैं। जैसे हिंदू और हिन्दुत्व एक नहीं हैं। जैसे पुरुष और पुरुषवाद एक नहीं हैं। इसलिए ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ नारे सुनकर किसी को आहत होने की ज़रूरत नहीं है, बिल्कुल वैसे ही जैसे पुरुषवाद, पितृसत्ता या हिन्दुत्व के ख़िलाफ़ नारे सुनकर किसी पुरुष, पिता या हिंदू को आहत होने की ज़रूरत नहीं है। हां, अगर आप ब्राह्मणवादी हैं, पुरुषवादी हैं तो ज़रूर आहत हो सकते हैं और आपको आहत ही नहीं शर्मिंदा भी होना चाहिए।
और यह भी दिलचस्प है कि पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। नाभि-नाल का संबंध है। जैसे आरएसएस और बीजेपी का है। इसलिए अब प्रगतिशील समाजशास्त्री, नारीवादी इस व्यवस्था को केवल ब्राह्मणवाद या पितृसत्ता नहीं कहते बल्कि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहते हैं।
ब्राह्मणवाद
समाज विज्ञान (Sociology / Social Sciences) के अनुसार ब्राह्मणवाद (Brahmanism) कोई केवल धार्मिक शब्द नहीं है, बल्कि एक सामाजिक-वैचारिक व्यवस्था (social ideology) को दर्शाता है। इसका अर्थ व्यक्ति विशेष (ब्राह्मण जाति) नहीं, बल्कि एक ऐसी संरचना से है जो समाज में श्रृंखलाबद्ध असमानता (hierarchical inequality) को वैध ठहराती है।
ब्राह्मणवाद उस विचार को कहा जाता है जिसमें समाज को जन्म आधारित श्रेणियों (वर्ण/जाति) में बांटकर ऊंच-नीच को स्वाभाविक और धार्मिक रूप से सही बताया जाता है।
इस व्यवस्था में धार्मिक ज्ञान, अनुष्ठान और सामाजिक नियमों पर एक खास वर्ग का नियंत्रण स्थापित होता है, जिससे सामाजिक शक्ति संरक्षित रहती है।
हम जब “ब्राह्मणवाद” शब्द का उपयोग करते हैं तो उसका मतलब– सत्ता संरचना (power structure) या dominant ideology के रूप में होता है। और यही मनुवाद है।
कुल मिलाकर ब्राह्मणवाद सामाजिक असमानता और जाति-आधारित भेदभाव को बनाए रखने वाली धार्मिक-वैचारिक व्यवस्था है।
इसका मतलब ब्राह्मण व्यक्ति या समुदाय नहीं होता, बल्कि एक विचारधारा या सामाजिक संरचना होता है। इसलिए कोई गैर-ब्राह्मण भी ब्राह्मणवादी सोच रख सकता है और कोई ब्राह्मण उसका विरोधी हो सकता है।

जैसे यूजीसी विवाद में ब्रह्मणवाद का झंडा लिए ख़ुद को पीड़ित बताने वाली कथित यू-ट्यूबर भी ब्राह्मण है और उनका प्रतिरोध करने वाली छात्र एक्टिविस्ट भी ब्राह्मण हैं। दोनों पक्ष ब्राह्मण समुदाय से हैं, लेकिन फ़र्क़ जानना ज़रूरी है — एक पक्ष ब्राह्मणवादी सोच का समर्थन करता है, जबकि दूसरा न्याय और समानता के पक्ष में खड़ा होकर ब्राह्मणवाद-मनुवाद की संरचना की आलोचना करता है।
यहां ‘ब्राह्मणवाद ज़िंदाबाद’ के नारे लगाने वाली और ऐसी ही सोच रखने वाली अन्य महिलाओं को यह समझना ज़रूरी है कि जिस ब्राह्मणवादी या मनुवादी व्यवस्था के पक्ष में वे खड़ी हैं, उस व्यवस्था में स्त्रियों को स्वायत्त व्यक्तित्व के रूप में स्थान ही नहीं दिया गया है। आप भले ही ब्राह्मण हों, लेकिन इस संरचना (पितृसत्ता+ब्राह्मणवाद) में स्त्री की स्थिति अंततः पुरुष के अधीन ही निर्धारित की गई है। यानी सामाजिक पदानुक्रम में उसका स्थान उसके पुरुष संबंधों से तय होता है, स्वयं उससे नहीं।
मनुस्मृति में कहा गया है–
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥
इसका अर्थ है कि बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र स्त्री की रक्षा करते हैं; स्त्री स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है।
एक दूसरा श्लोक है–
विषीलः कामवृत्तो वा गुणहीनोऽपि वा पतिः।
उपचर्या स्त्रिया साध्व्या सततं देववत् पतिः॥
यानी पति चाहे चरित्रहीन, कामुक या गुणहीन ही क्यों न हो, स्त्री को उसे देवता समान मानकर सेवा करनी चाहिए।
न स्त्री शूद्रो न च वैश्यो वेदमधीयीत कदाचन।
यानी स्त्री, शूद्र और वैश्य — इनको वेद का अध्ययन नहीं करना चाहिए।
मनुस्मृति में ऐसे न जाने कितने श्लोक हैं। जिनमें स्त्रियों को पुरुष के अधीन बताया गया है। शिक्षा से वंचित किया गया है।
लेकिन विडंबना है कि आज भी स्त्रियां इस साज़िश को नहीं समझ रहीं और अगर समझ भी रहीं हैं तो भी वे इसी के पक्ष में, इसी में ख़ुश हैं। इसे ही कंडीशनिंग (Conditioning) कहा जाता है। यह तीनों स्तर यानी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर होती है। और व्यक्ति अपनी जंज़ीरों को भी तमगे की तरह पहन लेता है।
और आज जो सवर्ण जाति के लोग यूजीसी इक्विटी गाइडलाइंस यानी समता अधिनियम पर भड़के हुए हैं उन्हें समझना चाहिए कि अत्याचार अधिकार नहीं है। समझना चाहिए कि कैसे एक व्यवस्था के तहत कुछ लोगों ने विशेषाधिकार हथिया लिए और कैसे एक बड़े समुदाय विशेष को हाशिये पर धकेल दिया। आपको कोई भ्रम हो तो मनुस्मृति के यह श्लोक पढ़ लीजिए, आपका भ्रम दूर हो जाएगा।
शूद्र का कर्तव्य — सेवा (मनुस्मृति 1.91)
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया॥
अर्थ: शूद्र के लिए एक ही कर्म निर्धारित किया गया — अन्य तीन वर्णों की बिना द्वेष सेवा करना।
शूद्र द्वारा वेद सुनने पर दंड (मनुस्मृति 2.281 / 2.282)
श्रुत्वा तु वेदमधीयानं शूद्रः यदि कदाचन।
तस्य कर्णौ पिधायेतां तप्तलोहस्य पूरणात्॥
अर्थ: यदि शूद्र वेद सुन ले तो उसके कानों में पिघला धातु डालने का दंड बताया गया। (विभिन्न संस्करणों में पाठांतर मिलते हैं, पर आशय यही दिया जाता है।)
शूद्र को धर्म उपदेश देने पर निषेध (मनुस्मृति 4.99)
न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्।
न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्मै व्रतमादिशेत्॥
अर्थ: शूद्र को बुद्धि (धर्म ज्ञान) न दें, न यज्ञ का अन्न दें, न धर्म का उपदेश दें और न व्रत बताएं।
शूद्र की संपत्ति पर नियंत्रण (मनुस्मृति 8.417)
ब्राह्मणस्य हि शूद्रोऽयं यद् यद् धनमुपार्जयेत्।
तत् तत् ब्राह्मण एव स्यात् शूद्रस्य नास्ति स्वं धनम्॥
अर्थ: शूद्र जो भी धन अर्जित करे, वह ब्राह्मण का माना जा सकता है; शूद्र का अपना धन नहीं। (पाठांतर मिलते हैं, पर आशय यही उद्धृत किया जाता है।)
ब्राह्मण को अपमान करने पर शूद्र का दंड (मनुस्मृति 8.270)
शूद्रः द्विजातीनां कुर्याद् वाचं दुरुक्तिम्।
तस्य जिह्वा छेदनीया॥
यदि शूद्र द्विज को अपशब्द कहे तो उसकी जीभ काटने का दंड बताया गया। (विस्तृत पाठ में भिन्नताएं मिलती हैं)
चांडाल आदि (अवर्ण) की सामाजिक स्थिति (मनुस्मृति 10.51–52)
चाण्डालश्वपचौ ग्रामाद् बहिर्निवसेताम्।
अपपात्रौ च कर्तव्यौ स्वकार्यं च पृथक् स्थितौ॥
अर्थ: चांडाल और श्वपच गांव के बाहर रहें, उनके बर्तन अलग हों और वे समाज से पृथक रहें।
चांडालों के लिए जीवन नियम (मनुस्मृति 10.54–56)
मृतचेलानि भुञ्जीरन् भिन्नभाण्डेषु वासिनः।
लोहाभरणधारिणः...
अर्थ: उन्हें मृतकों के कपड़े पहनने, टूटे बर्तनों में खाने आदि का जीवन बताया गया।

“दलित” शब्द मनुस्मृति या प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में नहीं मिलता; यह आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक और आंदोलन से उपजा शब्द है। संविधान में इसके लिए SC यानी अनुसूचित जाति का प्रयोग किया गया है। इसी तरह आदिवासी के लिए ST यानी अनुसूचित जनजाति का प्रयोग किया गया है। मनुस्मृति में जिन समूहों को शूद्र कहा गया है उन्हें आज सामाजिक आंदोलन और संविधान के तहत पिछड़ा वर्ग कहा जाता है। इसी तरह मनुस्मृति में जिन समूह का उल्लेख ‘चांडाल’, ‘श्वपच’ आदि नामों से किया गया है, उन्हें बाद के सामाजिक विमर्श में दलित श्रेणी से जोड़ा गया। इससे यह साफ़ होता है कि इन समुदायों को शास्त्रीय वर्ण व्यवस्था के चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के भीतर भी स्थान नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें ‘अवर्ण’ या सामाजिक रूप से बहिष्कृत श्रेणी में रखा गया।
इन सबको हमारे समाज सुधारकों जैसे ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबा साहेब अंबेडकर ने पहचाना और प्रतिरोध किया। दक्षिण भारत में पेरियार, नारायण गुरु आदि समाज सुधारक हुए। इसी समझदारी के तहत बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में दलित-वंचित वर्ग और स्त्रियों के अधिकारों के संबंध में क़ानून बनाए।
आज मनुस्मृति कौन फॉलो करता है?
अगर आप कहते हैं कि आज मनुस्मृति को कौन मानता है, कौन फॉलो करता है तो आप धोखे में हैं। और अगर आप नहीं मानते तो आपको तो यूजीसी गाइडलाइन या किसी भी समता क़ानून से नहीं डरना चाहिए। लेकिन अगर आप फिर भी कहते हैं कि इन क़ानूनों का दुरुपयोग हो सकता है तो फिर तो इस देश से सभी क़ानूनों को हटाना पड़ेगा क्योंकि सभी का कहीं न कहीं दुरुपयोग होता है। जबकि आप जानते हैं कि यूजीसी गाइडलाइंस में EWS यानी आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को भी रखा गया है। और आप जानते हैं कि EWS आरक्षण का लाभ किसे मिलता है। इसमें कुछ भी ढका-छुपा नहीं है कि EWS आरक्षण सवर्ण वर्ग के लिए ही लाया गया है। इस समता गाइडलाइंस में दिव्यांग वर्ग भी शामिल है, जिसमें सभी जाति के लोग आते हैं। जेंडर भी है यानी महिला वर्ग है, जिसमें ब्राह्मण महिला भी आती है और दलित भी।
SC-ST के साथ पिछड़ा वर्ग को शामिल करने पर बहुत हल्ला है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि दलित, दिव्यांग या महिलाएं इनके ख़िलाफ़ शिकायत नहीं कर सकतीं। कुल मिलाकर अत्याचार या भेदभाव को बहुत व्यापक बनाया गया है। मांग इसे और स्पष्ट और मज़बूत बनाने की होने चाहिए, जैसा रोहित एक्ट की मांग करने वाले कहते हैं लेकिन विडंबना है कि लोग इसी का विरोध कर रहे हैं।
और जिन क़ानूनों का हमारी-आपकी आंखों के सामने सत्ता दुरुपयोग कर रही है, जैसे– NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून), UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम), उनका आप विरोध नहीं करते क्योंकि यह आपकी सत्ता की राजनीति को सूट करता है।
और “अब कोई जात-पात नहीं है”, “कोई जाति नहीं देखता”, अगर आप ऐसा कहते या सोचते हैं तो आप अख़बारों के Matrimonial पेज यानी वैवाहिक विज्ञापन देख सकते हैं।
अगर आप आज भी दलितों या मुसलमान-ईसाइयों के लिए “हम और वे” (We and They) शब्द का प्रयोग करते हैं तो समझ जाइए यही भेदभाव है। जातिवाद और सांप्रदायिकता है।
अगर आप सोचते हैं कि आज दलितों-वंचितों पर कहां अत्याचार हो रहा है– तो NCRB (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के ताज़ा आंकड़े देख लीजिए। सबसे नवीनतम यानी 2023 के आंकड़ों के अनुसार दलितों पर अत्याचार के 57 हज़ार से अधिक मामले दर्ज हुए, जो पिछले दशकों में सबसे अधिक कहे जा रहे हैं।
अगर आप अख़बार पढ़ते हैं तो केवल कुछ महीनों की ही ख़बरें या हेडलाइन देख लीजिए जहां दबंगों ने दलितों को घोड़ी पर चढ़ने से रोक दिया। स्कूल तक में बच्चे को पानी का घड़ा छूने पर पीटा गया। कहीं कुर्सी पर बैठने पर मारा गया।
अगर हम 21वीं सदी में, इस डिजिटल युग में, जहां एक क्लिक पर सारी जानकारी उपलब्ध है, इतना भी नहीं जानते-समझते — तो फिर यही कहना पड़ेगा कि या तो हम और आप चालाक जातिवादी हैं या फिर शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन छिपाकर यह मान लेना चाहते हैं कि समस्या है ही नहीं।
कुछ तो अपनी पढ़ाई में गड़बड़ है सर!
इतना पढ़ के भी ज़ेहनों में जाले हुए!!
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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