कटाक्ष: वो कागज नहीं दिखाएंगे!

इसे कहते हैं, खरबूजे को देखकर खरबूजे का रंग बदलना। मोदी जी की बीए की डिग्री नहीं दिखाई जाएगी, तो स्मृति ईरानी की ग्यारहवीं-बारहवीं की मार्क शीट नहीं दिखाई जाएगी। सिर्फ नहीं दिखाई जाएगी नहीं, नहीं दिखा सकते। अब तो अदालत ने भी कह दिया है कि नहीं दिखा सकते। राष्ट्रीय हित का सवाल है। किसी ऐसे-वैसे राष्ट्रीय हित का भी नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। कागज नहीं दिखा सकते।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रिस्क मोल नहीं ले सकते। मोदी जी को देश संभाले हुए, ग्यारह साल से ज्यादा हो गए। राष्ट्र सुरक्षित है कि नहीं? क्या कहा, पहलगाम, पुलवामा, डोकलाम! हो जाती हैं, बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-मोटी घटनाएं भी हो जाती हैं; पर देश तो सुरक्षित है। जितना 2014 में था, 2025 में भी करीब-करीब उतना ही है। इसीलिए, कागज नहीं दिखा सकते। रिस्क नहीं ले सकते।
क्या पता कागज दिखाने के बाद राष्ट्र असुरक्षित हो जाए। राष्ट्र न सही मोदी जी की गद्दी ही खतरे में पड़ जाए। आखिर, गद्दी के लिए खतरा तो बाहर वालों से नहीं, देश के अंदर की पब्लिक से भी आ सकता है। जो पब्लिक ‘वोट चोर’ के जवाब में ‘गद्दी छोड़’ का नारा लगा सकती है, इसकी क्या गारंटी है कि ‘डिग्री चोर, गद्दी छोड़’ की जिद पकड़ कर नहीं बैठ जाती।
खैर, अदालत ने सारा टंटा ही खत्म कर दिया। जब कागज ही नहीं दिखाएंगे, तो डिग्री चोर के नारे कहां से आएंगे? एंटायर पॉलिटिकल साइंस की एमए की डिग्री की झलक दिखाने की गलती नहीं की होती, तो क्या अब तक एंटायर पॉलिटिकल साइंस का मजाक बन रहा होता। पढ़ा-लिखा तो किसी ने माना नहीं, एंटायर पालिटिकल साइंस की हंसी उड़ रही है, सो अलग।
खैर! खरबूजे को देखकर खरबूजे के रंग बदलने पर लौटें। जब मोदी जी, स्मृति ईरानी जी ने कागज नहीं दिखाएंगे का एलान कर दिया, तो चुनाव आयोग को भी जोश आ गया। आखिरकार, संवैधानिक संस्था है। उसके कागज की भी कोई इज्जत है। यूं ही हर किसी को नहीं दिखा सकते।
अब अदालत कागज छुपाने के अधिकार की हिफाजत करने के मूड में है, तो क्या आयोग के भी कागज नहीं दिखाने के अधिकार की रखवाली नहीं करेगी। सो एलान कर दिया– हम भी कागज नहीं दिखाएंगे। आरटीआई यानी सूचना के अधिकार के झांसे में हम नहीं आएंगे और बिहार वाले एसआईआर के कोई कागज नहीं दिखाएंगे। 2003 वाले आईआर यानी इंटेंसिव रिवीजन के कोई कागज दिखाने से तो पहले ही इंकार कर दिया था। कागज हैं ही नहीं तो दिखाएंगे क्या? पर अब 2025 के एसआईआर के भी कागज नहीं दिखाएंगे।
पर कागज देखना चाहने वालों की ढिठाई देखिए। छह अलग-अलग आरटीआइ लगाएंगे और दस अलग-अलग तरीकों से वही कागज दिखाने की मांग करेंगे। जैसे, बताएं कि बिहार में एसआईआर का जो फैसला हुआ, उसकी फाइल कहां से चली? कब चली और कहां तक पहुंची? इस पर किसने क्या राय दी? किस से क्या मशविरा किया गया? क्या किसी ने आपत्तियां कीं? किस ने फैसला लिया? कब फैसला लिया? और भी न जाने क्या-क्या? सवाल ही सवाल।
जब से अमर्त्य सेन की आर्गुमेंटेटिव इंडिया वाली किताब आयी है, तब से इंडिया वाले कुछ ज्यादा ही सवाल पूछने लगे हैं। वह तो मोदी जी का शुक्र मनाना चाहिए कि उन्होंने आरटीआई वगैरह सब फालतू कानूनों की मुश्कें कस दी हैं और ‘‘नो डाटा’’ को बाबुुओं का पसंदीदा जवाब बना दिया है, वर्ना न जाने किस जानकारी से, किस तरह देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती।
एसआईआर की जानकारियां हाथ लग जातीं, तो क्या दूसरे देश हमारे देश के खिलाफ इन जानकारियों का इस्तेमाल नहीं कर लेते? जैसे यही गुप्त जानकारी कि मोदी जी के राज में फैसले कैसे लिए जाते हैं?
मोदी जी के चुनाव आयोग के विरोधी, चुनाव आयोग के हम कागज नहीं दिखाएंगे के एलान से, तोड़-मरोडक़र गलत अर्थ निकालने की कोशिश कर रहे हैं। विरोधी कह रहे हैं कि चुनाव आयोग के पास एसआईआर के कोई कागज ही नहीं हैं। जिस एसआईआर ने पूरे बिहार को हिला रखा है, जिस एसआईआर ने देश को चिंतित कर रखा है, चुनाव आयोग में उसकी कोई फाइल ही नहीं है। न कोई मूल प्रस्ताव है, न उस पर कोई चर्चा है, न उस पर कानून मंत्रालय या किसी और मंत्रालय से कोई परामर्श है। और तो और चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो यह दावा किया था कि किसी विशेष अध्ययन के आधार पर उसने एसआईआर के जरूरी होने का निर्णय लिया था, उस अध्ययन का भी कोई अता-पता नहीं है। एसआईआर के मामले में तो आयोग मेें सब हवा-हवाई ही है! पर ऐसा है नहीं। बेशक, आयोग ने कहा है कि कागज नहीं दिखाएंगे। लेकिन, कागज नहीं दिखाएंगे का मतलब यह थोड़े ही है कि कागज ही नहीं हैं। एसआईआर की कोई फाइल ही नहीं है! मोदी जी डिग्री नहीं दिखा रहे हैं, तो इसे कोई डिग्री नहीं होने का सबूत बता सकता है, क्या? डिग्री न होना और डिग्री नहीं दिखाना, दो अलग-अलग चीजें हैं। सच पूछिए तो डिग्री नहीं होने पर नहीं दिखाना, यह तो कोई भी कर सकता है। छप्पन इंची छाती वो है जो होने पर भी नहीं दिखाए और यह कहकर नहीं दिखाए कि नहीं दिखाते, क्या कर लोगे? दिखाना, तो होने का सबूत हो सकता है, पर नहीं दिखाना नहीं होने का सबूत हर्गिज नहीं है!
और ये विरोधी फाइल-फाइल का क्या शोर मचा रहे हैं? ये तो ऐसे दिखाने की कोशिश कर रहे हैं जैसे फाइल के इधर-उधर होने, फाइल पर टीका-टिप्पणियों वाली बहस के बिना सरकार कुछ कर ही नहीं सकती है। इस सब की ऐसी भी क्या जरूरत है बल्कि एक तरह से देखें तो यह सब तो टाइम ही खराब करना है। जब बिना चर्चा के फैसले ले सकते हैं, तो इस सब की जरूरत ही क्या है? कागज काले करने का क्या फायदा? और फैसले लेने की भी क्या जरूरत है, जब ऊपर से आए फैसले ही लागू करने हैं। यह पहले वाली अटकाने, भटकाने, लटकाने वाली सरकार थोड़े ही है। यह मोदी सरकार है, जो सीधे फैसले लागू करती है। यह वह सरकार है जो चर्चा-वर्चा से नहीं, इलहाम से चलती है, फैसले लेती है। चर्चा-वर्चा से फैसला तो कोई बायोलॉजीकल भी कर लेगा। मोदी जी के नॉनबायोलाजीकल होने का ही क्या फायदा, अगर फाइल, नोटिंग, चर्चा वगैरह के पचड़ों मेें ही टैम खराब करना पड़े।
खैर! डिग्री हो तो और फाइल हो तो, वो कागज नहीं दिखाएंगे--सीएए वाली पब्लिक समझ रखा है क्या?
(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)
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