खरी-खरी: ख़ामेनेई की हत्या, भारत की चुप्पी और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का संकट
अमेरिका के बमवर्षक विमानों द्वारा गिराए गए बंकर बस्टर बमों से ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई, उनकी महज 14 माह की मासूम नातिन सहित निकट परिजनों और हाई-रैंकिंग अधिकारियों की मौत के बाद ईरान की सरकार ने उन्हें "शहीद" घोषित करते हुए 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। इस घटना ने वैश्विक स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रिया हुई है। कुछ देशों ने इसकी निंदा की, जबकि अन्य ने चुप्पी साधी या समर्थन जताया।
लेकिन सोशल मीडिया पर पिछले दिनों एक विचित्र बात दिखाई दी। अली ख़ामेनेई की हत्या की खबर के बाद भारत के कुछ वर्गों में शोक से अधिक उल्लास का भाव था। सवाल उठता है—क्या किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या पर खुश होना हमारी नैतिक संवेदना का विस्तार है, या उसका क्षरण? और क्या यह खुशी किसी वैचारिक असहमति से उपजी है, किसी पिछली अदावत या राष्ट्र विरोधी या धर्म विरोधी कार्य के कारण थी या सिर्फ इसलिए कि वह एक मुस्लिम देश का नेता था और स्वयं एक मुस्लिम समुदाय का धर्म गुरु भी था? इस सारे संदर्भ में कुछ प्रश्न हैं जो असहज करते हैं, लेकिन पूछे जाने चाहिए क्योंकि मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और भारत की विदेश नीति की आत्मा का है।
पहला सवाल: ख़ामेनई का अपराध क्या था?
यदि किसी सम्प्रभुता प्राप्त स्वतंत्र राष्ट्र के प्रमुख पर सैन्य हमला होता है और उसे सगर्व “टार्गेटेड किलिंग” या “स्ट्रेटेजिक स्ट्राइक” कहकर जायज़ ठहराया जाता है, तो कम-से-कम विश्व समुदाय को यह तो बताया जाना चाहिए कि उसका अपराध क्या था? क्या वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध था? क्या उस पर किसी मान्य वैश्विक संस्था ने प्रतिबंधों से आगे जाकर सैन्य कार्रवाई की अनुमति दी थी? संयुक्त राष्ट्र संघ UN के चार्टर के अनुसार किसी संप्रभु राष्ट्र पर बल प्रयोग तभी वैध है जब आत्मरक्षा में हो या सुरक्षा परिषद की अनुमति से हो। बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के “Extrajudicial killing” अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन है।
यदि इन मानकों को दरकिनार कर महाशक्तियाँ तय करेंगी कि कौन जिएगा और कौन मरेगा, तो यह नियम-आधारित विश्व व्यवस्था (rules-based order) नहीं, बल्कि शक्ति-आधारित व्यवस्था होगी।
क्या अयातुल्ला अली ख़ामनेई का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प के समक्ष घुटने टेकने से इंकार किया था? क्या किसी राष्ट्र का अमेरिका का मित्र न होना, उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रयोग करना, बमबारी का कारण बन सकता है? यदि हाँ, तो कल कोई भी असहमत देश इसी कसौटी पर चढ़ाया जा सकता है।
दूसरा सवाल: भारत की चुप्पी क्यों?
भारत स्वयं को शांति-अहिंसा और नैतिकता का पक्षधर बताता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक मंचों पर कहा है कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” पर जब एक संप्रभु राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व की बमवर्षा में हत्या होती है, तब भारत की प्रतिक्रिया क्या होती है? क्या हम कम-से-कम शांति की अपील भी नहीं कर सकते? कूटनीति में शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से होता है। शोक-संदेश देना किसी नीति-समर्थन का प्रमाण नहीं होता, बल्कि मानवीय संवेदना का संकेत होता है।
यदि हम हर वैश्विक घटना को अपनी सामरिक समीकरणों की कसौटी पर तौलेंगे, तो नैतिकता का स्थान कहाँ बचेगा?
भारत की विदेश नीति का इतिहास गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रहा है। परंतु यदि हमारी प्रतिक्रियाएँ मित्र-राष्ट्रों की स्वीकृति पर निर्भर दिखें, तो क्या यह स्वायत्तता बची रहती है? ज्ञातव्य है कि मोदी जी इज़राइल और UAE के प्रति चिंता व्यक्त की और इज़राइल के प्रति अतिरिक्त प्रेम दिखाने के लिए अपना ट्वीट वहाँ की हिब्रू भाषा में करने का नवाचार भी कर दिखाया। लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर और धर्मगुरु की हत्या पर शोक का एक ट्वीट भी ना कर सके वह भी तब जब चंद वर्ष पूर्व मोदी सरकार ने ईरान के राष्ट्रपति के निधन पर न सिर्फ शोक सन्देश दिया बल्कि एक दिन का राष्ट्रीय शोक भी घोषित किया था .
तीसरा सवाल: भारत-ईरान के ऐतिहासिक मैत्रीपूर्ण संबंधों का
यह याद रखा जाना चाहिए कि भारत और ईरान के संबंध किसी एक विचारधारा या सरकार के कारण नहीं, बल्कि सदियों की सांस्कृतिक और सामरिक साझेदारी पर आधारित हैं। अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण संधि हुई। 2016 में नरेंद्र मोदी ने तेहरान यात्रा के दौरान भारत-ईरान मित्रता को “शताब्दियों पुरानी” बताया गया। भारत के ईरान के साथ सबसे ज्यादा दोस्ताना संबंध ख़ामेनेई के कार्यकाल में ही रहे. ट्रंप के पहले कार्यकाल में भारत की अमेरिका से नज़दीकी के बाद भी ईरान ने कभी भारत का विरोध नहीं किया। मुस्लिम देश होने के बाद भी ईरान ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कूटनीतिक लड़ाई में भारत का साथ दिया और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भी अक्सर भारत के पक्ष का समर्थन किया।
एक और बड़ा प्रतीकात्मक उदाहरण है चाबहार बंदरगाह। चीन और पाकिस्तान के दबावों के बावजूद ईरान ने भारत को इस रणनीतिक परियोजना में स्थान दिया, जिससे भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक मार्ग मिल सका। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने कई अवसरों पर भारत को ऊर्जा आपूर्ति में रियायतें दीं। ईरान उन चुनिंदा देशों में हैं जो डॉलर की बजाय भारतीय रुपये में व्यापार करते हैं। ईरान के दसियों हज़ार करोड़ रुपये भारतीय बैंकों में जमा रहने से कुछ बैंकों की स्थिति सुधरी है। ऐसे में यदि आज उस देश के शीर्ष नेतृत्व की हत्या होती है, तो क्या भारत की न्यूनतम संवेदनात्मक प्रतिक्रिया भी अनावश्यक मानी जानी चाहिए?
चौथा सवाल: आज वह, कल हम क्यों नहीं?
इतिहास साक्षी है कि “सत्ता परिवर्तन” (regime change) की राजनीति ने कई देशों को अस्थिर किया है। ईराक में, बाद में आम तौर पर निराधार साबित हुए आरोपों के आधार पर, 2003 का अमेरिकी हस्तक्षेप आज भी क्षेत्रीय अस्थिरता का उदाहरण है। तारीफ़ करनी होगी तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की दृढ़ता और स्पष्टता की, जिन्होंने विदेशी मीडिया के सामने भी इसे अमेरिका की भूल बोलने से परहेज नहीं किया । सबसे ताज़ा उदाहरण वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन का है। बांग्लादेश में भारत की पक्षधर शेख़ हसीना को अपदस्थ करने के पीछे अमेरिकी कारगुज़ारी भी थी। ट्रम्प पचासों बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी जी की बेइज्जती कर चुका है। चाहे टैरिफ के नाम धमकाकर सीज़ फायर करवाने का दावा हो, भारत के राफेल विमान पाकिस्तान द्वारा गिराए जाने का ढिंढोरा पीटना हो या यह दावा करना हो कि वे जब चाहें नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटा सकते हैं, भारत के प्रति ट्रम्प का रवैया बराबरी का नहीं रहा है. यदि महाशक्तियाँ तय करेंगी कि कौन-सी सरकार वैध है और कौन-सी नहीं, तो यह अंतरराष्ट्रीय अराजकता को जन्म देगा। भारतीयों को या किसी अन्य देशवासी को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि महाशक्तियों की नीतियाँ अस्थायी मित्रता पर आधारित होती हैं। वे अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार मित्र और विरोधी तय करती हैं। यदि आज किसी और की संप्रभुता पर प्रहार हो रहा है और हम तालियाँ बजा रहे हैं, तो कल जब हमारी बारी आएगी तब कौन खड़ा होगा?
सवाल व्यक्ति बनाम नीति का
यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी भी नेता की नीतियों से असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है। ईरान की आंतरिक राजनीति, मानवाधिकार रिकॉर्ड या क्षेत्रीय नीतियों पर आलोचना संभव है और होनी चाहिए। परंतु असहमति और हत्या—इन दोनों के बीच एक स्पष्ट रेखा है। यदि हम इस रेखा को मिटा देंगे, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नैतिक आधार समाप्त हो जाएगा। ख़ामनेई के शासन की कमियाँ गिनाने वालों को यह जवाब भी देना चाहिए कि उसके यदि कोई अपराध हों भी तो, बिना न्यायिक प्रकिया के उनकी मनमानी सज़ा देने का अधिकार अमेरिका को किसने दिया? क्या वह स्वयंभू अंतर्राष्ट्रीय दरोगा है?
ईरान को परमाणु सम्पन्न बनने से रोकने का तर्क देने वाले अमेरिका ने अपने परमाणु हथियार कितने कम किए या हठी राष्ट्राध्यक्ष वाले दक्षिण कोरिया के कितने हथियार कम करवाए? अली ख़ामेनेई यदि चाहते हो वे भी ट्रम्प के सामने घुटने टेककर ऑइल की जिओ पॉलिटिक्स में अमेरिका का मोहरा बनकर अपने मरने तक सुप्रीम लीडर बने रह सकते थे, उन्हें तो पाँच साल में चुनाव भी नहीं लड़ना था। वे चाहते तो ईरान छोड़कर किसी अन्य देश की शरण भी ले सकते थे. लेकिन एक 86 वर्षीय राष्ट्राध्यक्ष यदि अपने पद पर रहते हुए आख़िरी समय तक अपने कार्यालय में, अपने अधिकारियों से मीटिंग करता हुआ, अपने देश का हित सोचता हुआ बमबारी में मारा जाता है, तो वह दृश्य हमें कम-से-कम यह सोचने पर विवश करना चाहिए कि सत्ता संघर्ष की यह शैली किस दिशा में जा रही है। ख़ामेनेई तो आने वाले समय में अमेरिका के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई का एक प्रेरक चेहरा बनकर लम्बे समय तक याद रखे जायेंगे लेकिन हमें सोचना है कि क्या यही वह विश्व व्यवस्था है जिसकी कामना हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए करते हैं?
भारतीय समाज के लिए आत्ममंथन
सबसे चिंताजनक पक्ष वह मानसिकता है जो किसी की मृत्यु को वैचारिक विजय मान लेती है। क्या हमारी सभ्यता—जो “वसुधैव कुटुंबकम्” का उद्घोष करती है—अब इतनी संकुचित हो गई है कि हम वैश्विक हिंसा को सांप्रदायिक चश्मे से देखें? यदि खुशी का कारण सिर्फ यह है कि मृतक “मुस्लिम” था, तो यह हमारे लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए खतरे की घंटी है। राष्ट्रवाद का अर्थ यह नहीं कि हम अंतरराष्ट्रीय अन्याय पर मौन रहें या उसे उत्सव में बदल दें। सच्चा राष्ट्रवाद अपने देश की स्वायत्तता और विश्व शांति दोनों का पक्षधर होता है।
निष्कर्ष: हमें किसके साथ खड़ा होना चाहिए?
प्रश्न किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम शक्ति-राजनीति के साथ खड़े हैं या नियम-आधारित व्यवस्था के साथ? क्या हम साम्राज्यवाद की परंपरा को वैधता देंगे, या अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय मूल्यों की रक्षा का आग्रह करेंगे? आज आवश्यकता है कि भारत स्पष्ट रूप से शांति, संप्रभुता और संवाद के पक्ष में खड़ा हो। मित्रता और रणनीतिक साझेदारी महत्वपूर्ण हैं, परंतु नैतिक साहस उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है। अंततः, किसी भी हत्या पर उत्सव मनाना हमें भीतर से छोटा करता है। असहमति हो सकती है, आलोचना हो सकती है, पर मानव जीवन के प्रति संवेदना खो देना सभ्यता की पराजय है। अयातुल्ला अली ख़ामेनेई का राजनीतिक मूल्यांकन तो इतिहास करेगा लेकिन आज भारतीय समाज को यह तय करना है कि वह किस मूल्य-व्यवस्था के साथ खड़ा है—डर और दादागिरी के साथ, या न्याय और शांति के साथ।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं अर्थशास्त्र के शोधार्थी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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