Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

याद; कंचन कुमार: साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चे के क्रांतिकारी योद्धा

हिंदी साहित्य में एक दौर था, जब अराजकतावादी प्रवृत्तियां उफान पर थीं। इन्हें ध्वस्त करने और उनकी जगह वामपंथ को स्थापित करने में ‘आमुख’ पत्रिका और कंचन की अगुआ भूमिका थी।
Kanchan Kumar
कवि, लेखक, अनुवादक और 'आमुख' पत्रिका के संपादक कंचन कुमार (1936-2025)

मेरा पुराना दोस्त, हिंदी और बंगला का कवि-लेखक-अनुवादक कंचन कुमार नहीं रहा। 89 साल की उम्र में वह 28 नवंबर 2025 को कोलकाता में चल बसा। वह पिछले कुछ समय से बीमार चल रहा था।

1936 में बंगाल के बर्दवान ज़िले के एक गांव में पैदा हुआ कंचन कुमार हालांकि मुझसे दस साल बड़ा था, लेकिन हम दोनों एक-दूसरे को तुम कहकर ही बात करते थे।

कंचन कुमार की ज़िंदगी का बहुत लंबा हिस्सा बनारस और दिल्ली में बीता। ये दोनों शहर ही उसकी साहित्यिक गतिविधियों के केंद्र थे। बाद में 2001 में वह कोलकाता चला गया।

1960 के दशक में, बनारस में, कंचन कुमार का संपर्क हिंदी कवि राजकमल चौधरी और अमेरिकी कवि एलेन गिंसबर्ग से हुआ। ये दोनों कवि उन दिनों बनारस में रह रहे थे/आते-जाते थे, और इन दोनों से कंचन की अच्छी-ख़ासी दोस्ती थी।

1960 और 1970 के बीच हिंदी साहित्य जगत पर राजमकल और गिसंबर्ग का अच्छा-ख़ासा बौद्धिक/साहित्यिक असर था, और कंचन भी इससे अछूता न था। साहित्य में अराजक पीढ़ी/भूखी पीढ़ी/हंग्री जेनरेशन की धूम मची थी (हिंदी और बंगला साहित्य दोनों में)। हर कवि, हर लेखक बाग़ी था, विद्रोही था-स्थापित व्यवस्था से विद्रोह (कई बार अराजक विद्रोह) ही साहित्य का मुख्य स्वर था।

लेकिन इस विद्रोही स्वर को क्रांतिकारी दिशा और लक्ष्य देने का काम 1967 के नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान आंदोलन ने किया। इसने ज़बर्दस्त रचनात्मक विस्फोट किया, और रचनाकारों को राजकमल और गिंसबर्ग के बौद्धिक प्रभाव से काफ़ी हद तक मुक्त किया। इस दौर के ज़्यादातर बल्कि बहुसंख्यक कवि/लेखक/कलाकार/बुद्धिजीवी नक्सलबाड़ी धारा के साथ हो लिये। कंचन इनमें एक था। उसने अपनी पत्रिका ‘आमुख’ के माध्यम से साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में नक्सलबाड़ी धारा को—वामपंथ को –स्थापित करने में अगुआ भूमिका निभायी।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की धारा से बहुत गहराई से जुड़ा कंचन साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चे पर एक क्रांतिकारी योद्धा था। उसके संपादन में निकली हिंदी पत्रिका ‘आमुख’ 1970 के दशक की आमूलचूल परिवर्तनकारी सांस्कृतिक धारा का प्रतिनिधित्व करती थी। हिंदी कवि धूमिल को सामने लाने और उन्हें नयी पहचान दिलाने में ‘आमुख’ पत्रिका की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके पहले धूमिल भावुक गीत लिखते थे और 1962 के भारत-चीन युद्ध के संदर्भ में चीन-विरोधी, कम्युनिस्ट-विरोधी कविताएं लिखते थे। वहां से उन्हें बाहर निकालने और उन्हें नक्सलबाड़ी धारा से जोड़ने का श्रेय ‘आमुख’ और कंचन कुमार को जाता है।

हिंदी साहित्य में एक दौर था, जब अराजकतावादी प्रवृत्तियां उफान पर थीं। इन्हें ध्वस्त करने और उनकी जगह वामपंथ को स्थापित करने में ‘आमुख’ पत्रिका और कंचन की अगुआ भूमिका थी।

कंचन कुमार 1980 के दशक में बने अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक लीग के संस्थापकों में था।

1970 के दशक के दौरान और उसके बाद हिंदी साहित्य को रूपवादी-कलावादी दायरे से बाहर निकालकर उसे नक्सलबाड़ी की राजनीति से जोड़ने और व्यापक मार्क्सवादी सामाजिक-साहित्यिक आयाम देने में ‘आमुख’ पत्रिका की भूमिका का विश्लेषण अभी बाक़ी है। कंचन कुमार की भूमिका और उसके साहित्यिक योगदान का लेखा-जोखा भी अभी बाक़ी है।

मैं अपने पुराने कॉमरेड कंचन कुमार को लाल सलाम पेश करता हूं।

(लेखक कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं)

 

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest