अमेरिका का डर्टी गेम: साम्राज्यवाद फिर से अपने पंजे दिखा रहा है
इज़रायल और अमेरिका का ईरान पर संयुक्त हमला बहुत विनाशकारी रहा है। ज़्यादातर युद्धों की तरह यह भी पूरी तरह क्रूर है। युद्ध का बहाना यह बताया गया कि आयतुल्ला ख़ामेनेई की हुकूमत अत्याचारी है, महिलाओं के अधिकारों के ख़िलाफ़ है और परमाणु हथियार बनाने की तैयारी कर रही है।
दूसरी ओर ईरान बातचीत की मेज़ पर आने को तैयार था और वार्ता से निकलने वाले कुछ बिंदुओं पर समझौता करने के लिए भी तैयार था। लेकिन बातचीत के बीच ही इज़रायल-अमेरिका धुरी ने युद्ध शुरू करने का फ़ैसला कर लिया और युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया।
इन हमलों में दो घटनाएं विशेष रूप से सामने आईं। पहली, ख़ामेनेई और उनके परिवार के कुछ सदस्यों की हत्या। दूसरी, एक स्कूल पर बमबारी, जिसमें 165 किशोर लड़कियों की जान चली गई। इज़रायल-अमेरिका धुरी ने कई आम नागरिकों को भी निशाना बनाया।
इसी दौरान ईरान का एक नौसैनिक जहाज़, जो भारत के निमंत्रण पर नौसैनिक अभ्यास के लिए भारत आया था, उसे अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो से निशाना बनाया। इस हमले में जहाज़ पर सवार बड़ी संख्या में नाविक मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने भी साहस के साथ पलटवार किया और इज़रायल-अमेरिका धुरी को भारी नुकसान पहुंचाया।
इन घटनाओं के बीच भारत की भूमिका उसकी बदलती विदेश नीति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत देती है। शुरुआत में भारत गुटनिरपेक्ष था और उसके ईरान के साथ अच्छे संबंध थे। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान भी बहुत अच्छे थे।
लेकिन अब हम देखते हैं कि युद्ध से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़रायल का दौरा किया। प्रधानमंत्री की इस यात्रा का उद्देश्य देश को नहीं बताया गया। इस दौरान उन्हें इज़रायल का सर्वोच्च सम्मान मिला और उन्होंने कहा कि भारत हर परिस्थिति में इज़रायल के साथ खड़ा रहेगा। इसके अगले ही दिन इज़रायल-अमेरिका धुरी ने ईरान पर हमला कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या पर कोई ट्वीट नहीं किया और एक सामान्य बयान जारी किया, जिसमें हमलावर और पीड़ित देश को एक ही स्तर पर रख दिया गया। इस तरह प्रधानमंत्री के कुछ कदमों और कुछ मामलों में चुप्पी से यह साफ़ दिखा कि भारत की नीति तटस्थता से हटकर अमेरिका-इज़रायल धुरी के करीब जा रही है।
अब अमेरिका की भूमिका की ओर लौटते हैं। 1950 के दशक से हम अमेरिका की विदेश नीति को देखते आ रहे हैं। उसका रवैया अक्सर दूसरे देशों के मामलों में अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए दखल देने का रहा है।
पहले वह “दुनिया को साम्यवाद से बचाने” को युद्ध छेड़ने का मुख्य आधार बनाता था। इसकी शुरुआत वियतनाम युद्ध से हुई। वियतनाम पहले फ्रांस का उपनिवेश था। हो ची मिन्ह के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सेना ने फ्रांसीसी शासन को हटा दिया। इसके बाद एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया के चलते वियतनाम को 17वें समानांतर के आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया गया—कम्युनिस्ट उत्तर वियतनाम और पूंजीवादी दक्षिण वियतनाम।
अमेरिका ने वियतनाम के ख़िलाफ़ भयानक युद्ध शुरू किया और इस पर करोड़ों डॉलर खर्च किए। उसने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया—नेपाम (जेली जैसा पेट्रोल) और एजेंट ऑरेंज (बहुत शक्तिशाली खरपतवार नाशक)।
इनका इस्तेमाल जंगल की घनी झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों को साफ़ करने के लिए किया गया, क्योंकि वही जगह वियतकांग के लड़ाकों (वियतनामी लोगों द्वारा संगठित सेना) के लिए स्वाभाविक छिपने की जगह होती थी।
नेपाम ने जंगल की झाड़ियों को तो साफ़ किया, लेकिन यह इंसानों से भी चिपक जाता था और भयानक जलन और घाव पैदा करता था। एजेंट ऑरेंज के कारण कई निर्दोष नागरिक मारे गए, खेत-खलिहान नष्ट हो गए और जानवर भी मारे गए।
वियतनाम के लोग ज़्यादातर हो ची मिन्ह के साथ थे। वियतकांग ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और अंततः जीत हासिल की। अमेरिका को पहली बार बड़ी हार का सामना करना पड़ा। पांच लाख से अधिक सैनिकों वाली अमेरिकी सेना को एक नए और छोटे देश के हाथों हार के बाद पीछे हटना पड़ा।
वियतनाम युद्ध ने यह साफ़ दिखा दिया कि अमेरिका अपने हितों के ख़िलाफ़ जाने वालों को हराने के लिए कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटता, जिसे वह “मुक्त दुनिया” की विचारधारा के नाम पर पेश करता है।
इसके बाद भी अमेरिका ने अलग-अलग बहानों से कई देशों पर हमला किया। इसका दूसरा बड़ा उदाहरण ईरान है। अपनी रणनीतिक स्थिति और विशाल तेल भंडार के कारण ईरान पश्चिमी शक्तियों—खासकर अमेरिका और ब्रिटेन—के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की ईरान में बड़ी मौजूदगी थी। युद्ध के बाद भी उसने एंग्लो-ईरानियन ऑयल कंपनी के जरिए ईरान के तेल पर नियंत्रण बनाए रखा। यह कंपनी ईरान के तेल का इस्तेमाल अपने हितों के लिए कर रही थी।
लेकिन 1951 में यह स्थिति अचानक बदल गई, जब मोहम्मद मोसद्दिक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करने का फ़ैसला किया।
इसके बाद ब्रिटेन ने मोसद्दिक सरकार का विरोध शुरू किया और उसके ख़िलाफ़ साज़िशें रचने लगा। उसने अमेरिका को भी अपने साथ लिया और ईरान में तख्तापलट कराया गया। इस तख्तापलट में लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर रज़ा शाह पहलवी को सत्ता में बैठा दिया गया, जो अमेरिका का समर्थक था। इस तरह ईरान के तेल पर पश्चिमी शक्तियों का नियंत्रण बना रहा।
चिली में साल्वाडोर आयेंदे की सरकार को हटाने की कहानी भी लगभग ऐसी ही है। आयेंदे मार्क्सवादी नेता थे और समाजवादी पार्टी के सदस्य थे। 3 नवंबर 1970 को उन्होंने चिली के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। उन्होंने अमेरिका के नियंत्रण वाली तांबे की कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करने का फ़ैसला किया।
1975 की अमेरिकी सीनेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1970 से 1973 के बीच तख्तापलट की तैयारी में अमेरिका ने गुप्त कार्रवाइयों पर लगभग 80 लाख डॉलर खर्च किए।
अमेरिकी अधिकारियों ने आयेंदे सरकार को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए भी कदम उठाए। अंततः सीआईए के समर्थन से एक तख्तापलट हुआ और सैन्य शासक पिनोशे सत्ता में आ गया। उसका शासन बेहद क्रूर था और उसने चिली के लोकतंत्र और संभावित समृद्धि को गहरा नुकसान पहुंचाया।
पश्चिम एशिया में अमेरिका की नीतियों का असर और भी खतरनाक रहा। जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा किया, तब अमेरिका ने पाकिस्तान की कुछ मदरसों को समर्थन दिया और मुजाहिदीन को प्रशिक्षण दिलाया। इसी प्रक्रिया से बाद में तालिबान और अल-कायदा जैसे संगठन बने।
अमेरिका ने उन्हें लगभग 8000 मिलियन डॉलर की सहायता दी और 7000 टन हथियार भी उपलब्ध कराए (महमूद ममदानी की किताब Good Muslim, Bad Muslim के अनुसार)।
11 सितंबर के हमलों के बाद अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करने का बहाना मिल गया। इस युद्ध में लगभग 60,000 लोग मारे गए। पूरे क्षेत्र पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए उसने “विनाशकारी हथियारों” का बहाना बनाकर इराक पर हमला किया।
सैनिकों से कहा गया कि सद्दाम हुसैन के शासन में इराक के लोग अत्याचार झेल रहे हैं, इसलिए यह युद्ध ज़रूरी है। उन्हें यह भी बताया गया कि इराक के लोग उन्हें “मुक्तिदाता” की तरह देखेंगे और उनका “फूलों और चॉकलेट से स्वागत” करेंगे।
लेकिन वास्तविकता कुछ और निकली। इराक बिखर गया और वहां इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन उभर आए। न तो कोई विनाशकारी हथियार मिले और न ही अमेरिकी सैनिकों का स्वागत हुआ।
उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद अपने शिकार बने देशों और पूरी दुनिया पर खतरनाक असर छोड़ते हैं। भारत में ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और राज करो” की नीति ने सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत किया, जिसके दुष्परिणाम हम आज तक झेल रहे हैं।
अमेरिकी मीडिया द्वारा “इस्लामी आतंकवाद” जैसे शब्द गढ़ने और उन्हें लोकप्रिय बनाने से दुनिया भर में मुसलमानों को लेकर नकारात्मक धारणा फैली है।
दरअसल, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ही आज दुनिया के कई बड़े संकटों की जड़ में मौजूद हैं। उम्मीद है कि हम साम्राज्यवाद के असर को समझकर शांति को बढ़ावा दे सकेंगे।
(लेखक प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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