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अंबेडकर जयंती विशेष: कैसा भारत चाहते थे बाबा साहेब?

“दलित प्रगति के किसी भी पथ पर आगे बढ़ें जाति का राक्षस रास्‍ता रोक कर खड़ा मिलता है। हमारा संघर्ष धन-संपत्ति के लिए नहीं मानवीय गरिमा के लिए है। मेरा जीवन संघर्ष ही मेरा संदेश है”— बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर
DR. AMBEDKAR

जब हम बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का नाम लेते हैं तभी संविधान भी हमारे दिमाग में कौंध जाता है। दरअसल बाबा साहब ही देश के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनकी मूर्ति के हाथ में संविधान होता है इसे आप संसद से लेकर शहरों गांव-कस्बों में भी देख सकते हैं। बाबासाहेब अंबेडकर और संविधान को देश की जनता साथ-साथ देखती है। इसलिए आज संविधान बचाने की लड़ाई के नेता या नई ज़ुबान में कहें तो पोस्टर बॉय बाबा साहब हैं। 

संविधान हम दलितों वंचितों महिलाओं और आदिवासियों को वे अधिकार देता है जो पहले कभी नहीं मिले। हमारे लिए बराबरी गरिमा और आजादी से प्यारा और कुछ नहीं है। इसलिए हमें बाबा साहब बहुत प्यारे हैं और संविधान जान से प्‍यारा है। संविधान पर हमला हमें बाबासाहेब पर हमला लगता है। यही वजह है कि मनुवादी ताकतें आज तक संविधान को हाथ लगाने या हटाने से डरती है। संविधान वह आग है जिसमें गैर बराबरी और छुआछूत को जलाया जा सकता है। 

नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने Run for Ambedkar Run for Constitution मैराथन के दौरान कहा कि हमें कहना होगा - मैं भी अंबेडकर। हमें भी कहना होगा मैं भी अंबेडकर संविधान हमें प्यारा है और हमें हर हाल में इसे बचाना है।

 डॉ. बी.आर. अंबेडकर, जिन्हें हम सम्मान से ‘बाबासाहेब’ कहते हैं, केवल भारतीय संविधान के निर्माता ही नहीं थे, बल्कि वे एक समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और महान मानवाधिकारवादी थे। उनका भारत केवल भौगोलिक सीमाओं का समूह नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवंत समाज था जहाँ हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार हो।

सामाजिक लोकतंत्र: जातिविहीन समाज का निर्माण

बाबासाहेब का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उसके मूल में सामाजिक लोकतंत्र न हो।

जाति प्रथा का उन्मूलन: वे एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जहाँ मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके गुणों और कर्मों से हो। उनके लिए ‘जाति’ प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी।

अस्पृश्यता का अंत: उन्होंने छुआछूत जैसी कुप्रथा को जड़ से खत्म करने का संकल्प लिया था ताकि दलित और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान मिल सके।

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का सिद्धांत

नारी सशक्तिकरण: शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो

बाबासाहेब कहते थे, मैं किसी समुदाय की प्रगति का मापन उस प्रगति से करता हूँ जो वहाँ की महिलाओं ने हासिल की है।

बाबासाहेब चाहते थे कि किसी को उसकी जाति के कारण अपमानित न होना पड़े। हर महिला सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करे। विज्ञान और तर्क पर आधारित सोच हो।

आज समय है कि हम बाबा साहेब के सपने के भारत को साकार बनाएं। आइए, संकल्प लें हम केवल बाबासाहेब की जय-जयकार न करें, बल्कि उनके बताए हुए ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के मंत्र को अपने जीवन में उतारें। उनके सपनों का भारत बनाने की जिम्मेदारी अब हमारे कंधों पर है।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्पणीकार हैं और सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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