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“भाषा की तमीज़ सीखने के लिए ज्ञानरंजन की कहानियों को पढ़ने की ज़रूरत”

प्रगतिशील लेखक संघ, पटना द्वारा ज्ञानरंजन की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
GYANRANJAN

पटना: प्रख्यात कथाकार और 'पहल' पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से जमाल रोड स्थित माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में किया गया। 

इस मौके पर पटना शहर के रचनाकार, साहित्यकार, रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन युवा कवि चंद्रबिंद सिंह ने किया। 

ज्ञानरंजन के साथ काफी वक्त बिताने वाले वाले प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने अपने कई संस्मरण सुनाते हुए कहा " ज्ञानरंजन एक सदी के लेखक थे। एक सदी में कोई ऐसा कहानीकार आता है। उनको मैं देखता था कि वे 'पहल' पत्रिका डिस्पैच कर रहे हैं। बड़ा कृतिकार का दिन कब होता है और कब रात होती है, यह देखना है तो हमें ज्ञानरंजन को देखना चाहिए। एक बार मैंने उनसे कहा कि आप लोर्का को सुनाइए। उन्होंने वह कविता सुनाई " जब मैं न रहूं तो बालकनी खुली छोड़ देना..."। 

कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार ने अपने संबोधन में कहा "हम जो काम करते हैं जो अमरत्व अर्जित करते हैं उनसे  खत्म नहीं हो पाता। तुलसीदास का अमरत्व चलता रहा है सैकड़ों साल से, कालिदास दो हजार साल से बने हुए हैं। ऐसे ही शेक्सपियर हैं। ज्ञानरंजन अपने लेखन, सहजता और संबंधों के कारण भी जाने जाते हैं। हिंदी का कोई काम कितना बड़ा है उसे पहचानना और उसका क्या महत्व है यह हमें ज्ञानरंजन से देखना चाहिए। मैने आलोक धन्वा को पहले पढ़ा था और ज्ञानरंजन को बाद में । मैंने पाया कि आलोक धन्वा की कविताओं के ट्रीटमेंट में और ज्ञानरंजन की कहानियों के वाक्य विन्यास में एक साम्य है। जब उन्होंने मुझे क्रिएटिविटी पर बोलने के लिए  जबलपुरआमंत्रित किया  तो मैने देखा कि वे समूचा इंतजाम देख रहे हैं। इतना बड़ा लेखक खुद यह काम कर रहा है। उनका बड़ा रुतबा और अदब था वहां। एक संपादक के रूप में वे सर्वसमावेशी थे। हर किस्म के लोगों को जगह दिया करते थे। ज्ञानरंजन को भाषा का ट्रीटमेंट सीखने के लिए पढ़ना चाहिए। वैसा निखरा हुआ सादगी भरा गद्य रहा है। " 

सांस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर ने शुरुआती वक्तव्य में कहा " इस शीतकाल में ज्ञानरंजन समेत हमारे अनेक लेखक हमें छोड़कर चले गये। ज्ञानरंजन की अनेक कहानियां चर्चित और पठित हैं। लेकिन उन्होंने पहल पत्रिका के जरिये बहुत बड़ा काम किया। ज्ञानरंजन गांधीवाद के पाखंड से ऊबकर मार्क्सवाद की ओर आये थे। वे कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे। पहल पत्रिका में उन्होंने देश-दुनिया की हलचल और बहसों को जगह दी।"

कवि नरेंद्र ने ज्ञानरंजन की कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि हम उनकी कहानियों में समाज के मानवीय संबंधों की गर्माहट को महसूस करते हैं। 

युवा कवयित्री गुंजन उपाध्याय ने अपने संबोधन में बताया  'ज्ञानरंजन की हिंदी साहित्य की दुनिया में कथाकार से तुलनात्मक रूप से पहल के संपादक का व्यक्तित्व बड़ा है।"

बी. एस कॉलेज, दानापुर में हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर " ज्ञानरंजन ने बहुत कम लिखकर बहुत प्रभाव छोड़ा। 'पिता' कहानी में पिता की खामोशी और अड़ियलपन देखा जा सकता  है। पीढ़ियों का अंतराल है इसमें।  एक घर के अंदर है जबकि दूसरा घर के बाहर। ऐसा लगता है मानो दो युग हों। 'पिता' कहानी में जैसा तनाव है वह हिंदी कहानी में  दूसरी जगह अनुपस्थित है। इस कहानी में एक झीना पर्दा है जिसे कोई तोड़ नहीं पाता है। गर्मी की उमस भरी रात है। पिता में पुत्र और परिवार एक अंतहीन अपराध बोध से ग्रसित नजर आते हैं। ज्ञानरंजन की भाषा में ऐसा स्थिरता है जो अन्यत्र दुर्लभ है। " 

श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षा करते हुए पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो तरुण कुमार ने कहा " ज्ञानरंजन की लगभग दो दर्जन के करीब कहानियां हैं और लगभग पचास वर्षों तक उन्होंने  'पहल' पत्रिका संपादन किया। हिंदी में 'आलोचना' और 'पहल'  जैसी दो पत्रिका न होती तो हिंदी की बौद्धिक स्थिति क्या होती उसकी कल्पना की जा सकती है। इन दोनों पत्रिकाओं के वैचारिक अवदान का ठीक से अब तक मूल्यांकन नहीं हुआ है। उन्होंने कई पीढ़ियों को वैचारिक ऊष्मा देने का काम किया। भारतीयेतर भाषाओं से परिचित कराया। सत्तर के दशक में चार यार - ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया और दूधनाथ सिंह -  की चर्चा होती है  जिसने हिंदी की कथाभाषा और संवेदना में भारी सृजनात्मक उलटफेर किया था।  उनके पहले राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश का दौर था।  ज्ञानरंजन के पहले आजादी के मनमोहक स्वप्नों का दौर था लेकिन उनके यहां मोहभंग की बात आती है। नेमिचन्द्र जैन ने कहा था कि ज्ञानरंजन के यहां डरावना अनुभव संसार रहा करता है। यह 'अनुभव संसार' महत्वपूर्ण शब्द है। छोटे शहरों के युवकों के चरित्र के मनोविज्ञान को सधे गद्य में  अभिव्यक्त करते हैं। ज्ञानरंजन अपने स्वभाव की तरह लेखन में कभी लाउड नहीं होते। इतनी चुप्पी है वहां, साइलेंस है कि बिटवीन द लाइंस पढ़े बिना आप ज्ञानरंजन को नहीं समझ सकते। उनके यहां ऐसी  अर्थ सघनता  है जिसे पकड़ना आसान नहीं है। उनकी कहानियां को निष्कर्षता की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। आपको परत-दर-परत दिखाई पड़ता है। ज्ञानरंजन की कहानियां बदले हुए तालमेल की कहानियां हैं। उनकी कहानियां नायक विहीन कहानियां हैं जो चरित्रों के माध्यम से आगे बढ़ती है। घर ही समाज की धुरी है। घर के अंदर क्या घट रहा है? उसे पकड़ लिया जाए तो बात बन जाती है।  वे घर की ऐसी कहानियां लिखते हैं जिसका मुख बाहर की ओर खुला हुआ है। बहिर्गमन' में अर्थ की एक बहुस्तरीयता दिखाई पड़ता है। उनके यहां गझिन अनुभव यहां दिखाई पड़ता है।"

सभा को संजीव कुमार श्रीवास्तव ने भी  संबोधित किया। प्रमुख लोगों के मौजूद थे बेतिया के कला अधिकारी राकेश कुमुद, शिवांगी,  कवि प्रत्युष चंद्र मिश्रा, मुकेश, प्रदीप , जौहर, गोपाल शर्मा, उत्कर्ष आनंद, पटना आर्ट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अजय पांडे, पटना विश्विद्यालय में लोकप्रशासन के असिस्टेंट प्रोफेसर सुधीर कुमार, पत्रकार राजेश ठाकुर, सामाजिक कार्यकर्ता सतीश कुमार, यूट्यूबर रोहित, कवि निखिल आनंद गिरि,छात्र नेता  सुधीर कुमार, प्रशांत सुमन, लेखक राजकुमार शाही, रंगकर्मी जयप्रकाश, निखिल  आदि।  

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