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क्रोनी-पूंजीवादी शासन के ख़िलाफ़ मेहनतकश जनता का ऐतिहासिक संग्राम

यह हड़ताल केवल एक दिन का सांकेतिक विरोध नहीं है— यह 'क्रोनी-पूंजीवाद, 'साम्राज्यवाद-परस्त नीतियों, और 'मेहनतकश मजदूर-विरोधी राज्य सत्ता के खिलाफ उभरती हुई जन-प्रतिरोध की क्रांतिकारी लहर है। क्रोनी पूंजीवाद और बुर्जुआ राज्य के ख़िलाफ़ जनता का उभार।
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12 फरवरी 2026 को भारत के औद्योगिक मजदूरों, किसानों, छात्रों व नौजवानों ने ऐतिहासिक 'भारत बंद' की कार्रवाई के जरिये दक्षिणपंथी याराना कारपोरेट-परस्त सामंती दकियानूसी-रूढ़िवादी फासीवादी शासक वर्गों की नींव को हिला दिया। 24 घंटे की राष्ट्रव्यापी आम औद्योगिक हड़ताल और भारत बंद के रूप में भारतीय मजदूर वर्ग ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि देश की असली शक्ति संसद नहीं, कॉर्पोरेट घराने नहीं, बल्कि उत्पादन करने वाला श्रमिक वर्ग है।

यह हड़ताल केवल एक दिन का सांकेतिक विरोध नहीं है— यह 'क्रोनी-पूँजीवाद, 'साम्राज्यवाद-परस्त नीतियों, और 'मेहनतकश मजदूर-विरोधी राज्य सत्ता के खिलाफ उभरती हुई जन-प्रतिरोध की क्रांतिकारी लहर है। क्रोनी पूँजीवाद और बुर्जुआ राज्य के खिलाफ जनता का उभार।

आज भारत में राज्य मशीनरी पूरी तरह से कॉर्पोरेट लुटेरों, एकाधिकार पूँजीपतियों और साम्राज्यवादी एजेंटों के हाथों में गिरवी रख दी गई है। सरकार मजदूरों-किसानों के लिए नहीं, बल्कि मुट्ठीभर अरबपतियों के मुनाफे के लिए काम कर रही है।

जनता पर महँगाई, बेरोजगारी, ठेका प्रथा और असुरक्षा थोपी जा रही है, जबकि पूँजीपति वर्ग के लिए कर-माफी, कर्ज-माफी, सब्सिडी और राज्य संरक्षण की खुली लूट जारी है।

यह भारत बंद इस लूटतंत्र के खिलाफ जनता की गर्जना है:

·       “पूँजीवादी शोषण नहीं चलेगा !”

·       “मजदूर विरोधी श्रम संहिताएँ वापस लो !”

50 करोड़ औद्योगिक मजदूरों की शक्ति: पूँजीवादी मशीनरी पर प्रहार

दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा दी गई इस हड़ताल की पुकार ने तकरीबन 50 करोड़ से अधिक मजदूरों-किसानों-छात्रों-युवाओं को लामबंद किया। यह मानव इतिहास में श्रम शक्ति की सबसे विशाल सामूहिक कार्रवाई है। इस हड़ताल ने साबित कर दिया: “जब मजदूर रुकते हैं — पूँजीवाद रुकता है!” कारखाने ठप, बैंक बंद, परिवहन बाधित, सरकारी कार्यालय वीरान— यह सब इस बात का प्रमाण है कि समाज का वास्तविक आधार मजदूर वर्ग है, न कि शोषक वर्ग।

मजदूर–किसान एकता: क्रांतिकारी जनमोर्चे का निर्माण

यह आंदोलन केवल मजदूरों तक सीमित नहीं रहा। किसानों, युवाओं, छात्रों, महिलाओं और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों ने व्यापक समर्थन देकर यह दिखा दिया कि भारत में एक नया जन-लोकतांत्रिक मोर्चा उभर रहा है।

जाति-धर्म के झूठे विभाजनों को तोड़ते हुए मेहनतकश जनता एकजुट हो रही है।

यह वही ऐतिहासिक दिशा है जिसे मार्क्सवाद-लेनिनवाद हमेशा रेखांकित करता है:

·       मजदूर–किसान गठबंधन ही क्रांति की रीढ़ है।

·       श्रम संहिताएँ: बुर्जुआ हमले का नया चरण है।

चार नई श्रम संहिताएँ वास्तव में सुधार नहीं, बल्कि मजदूर वर्ग पर पूँजी का खुला हमला हैं। इनका उद्देश्य है:

·       स्थायी रोजगार को खत्म करना।

·       यूनियन अधिकारों को कुचलना।

·       ठेका और अस्थायी श्रम को बढ़ाना।

·       पूँजीपति के शोषण को कानूनी बनाना।

·       ये श्रम कानून नहीं, बल्कि शोषण संहिताएँ हैं।

भारतीय मजदूर वर्ग को “श्रम संहिताएँ नहीं — मजदूर सत्ता चाहिए!” 

राज्य सत्ता की घबराहट और जनता की बढ़ती चेतना

केरल, बंगाल, ओडिशा, पंजाब, बिहार, झारखंड, उत्तर-प्रदेश, मध्य-प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली सहित अनेक राज्यों में व्यापक बंद और जनप्रदर्शन हुए– “जनता की एकता से शासक वर्ग भयभीत है!”

वर्ग संघर्ष की नई लहर: भविष्य के संघर्षों का संकेत

12 फरवरी की आम हड़ताल एक शुरुआत है। यह मेहनतकश जनता की ओर से पूँजीवादी व्यवस्था को स्पष्ट संदेश है: “हम शोषण सहेंगे नहीं, संघर्ष रुकेगा नहीं!” यह हड़ताल बताती है कि भारत में वर्ग संघर्ष तेज हो रहा है और मजदूर वर्ग फिर से अपनी ऐतिहासिक भूमिका को पहचान रहा है — न केवल शोषित वर्ग के रूप में, बल्कि एक क्रांतिकारी शक्ति के रूप में जो बुर्जुआ शासन की पूरी संरचना को चुनौती दे सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

 

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