तिरछी नज़र: मिस हेले क्या आप अपने PM से पूछ सकती हैं कि वे आम कैसे खाते हैं!
सरकार जी विदेश जाते हैं। जाते ही रहते हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है। नई बात तो तब होगी कि अगर देश में चुनाव न हों और फिर भी सरकार जी विदेश नहीं जाएं। या फिर चुनाव हों और विदेश चले जाएं। ऐसे संयोग सरकार जी के जीवन में कम ही आते हैं।
सरकार जी को सरकार चलाने का तेइस-चौबीस साल का अनुभव तो है ही। बारह साल का राज्य में और इतने ही साल का केंद्र में। पर इससे ज्यादा अनुभव भिक्षा मांगने का है। लगभग पैंतीस चालीस साल का। इस अनुभव की बात सरकार जी ने खुद ही बताई है। जैसे भिक्षा में भिक्षा कम और वायदे ज्यादा मिलते हैं, 'बाबा कल आना। आज रोटी खत्म हो गई है।' उसी तरह सरकार जी की विदेश यात्रा में असल सौदे कम और वायदे ज्यादा होते हैं। अगर सरकार जी की विदेश यात्रा के दौरान किए गए इन्वेस्टमेंट के सारे वायदे पूरे हो गए होते तो कहाँ के कहाँ पहुंच गए होते।
हम कहाँ के कहाँ पहुंच भी गए हैं। अब देखो प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में कहाँ के कहाँ पहुंच गए। 2010 में 105वें स्थान पर होते थे। अब 157वें पर हैं। शायद ही किसी देश ने पंद्रह वर्ष में इतनी उन्नति की होगी। पर हमने की है। हम ही इतना गिरे हैं। और हमें फख्र है। फख्र है अपनी गिरावट पर। ऊपर उठना भी नहीं चाहते हैं। हाँ, हमारे पत्रकार और गिर सकते हैं, अगर सरकार जी चाहें तो। आज के दौर में हमारा मॉडल नोर्वे नहीं है। हम ऊपर से नहीं, हम तो नीचे से टॉप करना चाहते हैं।
हम घमंड नहीं करना चाहते हैं। हमें पता है अगर हम नंबर एक पर आ गए तो पत्रकारों में घमंड आ जायेगा। नंबर एक तो छोड़ो, अगर ऊपर के दस बीस में भी आ गए तो पत्रकार घमंडी हो जायेंगे। और हम यह ही नहीं चाहते हैं कि हमारे पत्रकार घमंडी बनें। इसीलिए हम 157 पर ठीक हैं। जरूरत होगी तो और नीचे गिरेंगे, पर ऊपर हरगिज नहीं उठेंगे।
अब वो नार्वे की पत्रकार थी, बड़े घमंड में थी। सीधा बोलती है, हम प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नंबर एक पर हैं। उसे पता था कि सरकार जी प्रश्न का उत्तर नहीं देंगे। उनकी प्रेस वार्ता न करने की आदत अब तो विश्व भर में प्रसिद्ध हो चुकी है। नार्वे की उस पत्रकार हेला लिंग को भी पता था कि भारत के सरकार जी प्रश्न का उत्तर नहीं देते हैं। पर फिर भी प्रश्न पूछ लिया। पूछ लिया कि आप दुनिया के सबसे आज़ाद प्रेस से प्रश्न क्यों नहीं लेते हैं। कहती है, मेरा काम प्रश्न पूछना है। तो हमारे सरकार जी का काम भी उत्तर नहीं देना है। सरकार जी ने ठीक ही किया। ऐसे बाहर निकल आए जैसे उसका प्रश्न सुना ही न हो। वेल डन सरकार जी, वेल डन।
और उसी दिन शाम को, इससे भी अच्छा हुआ। हमारे विदेश सचिव प्रेस वार्ता में थे। उसमें उस पत्रकार ने फिर प्रश्न पूछा। पूछा कि हम आप पर क्यों विश्वास करें। प्रेस फ्रीडम और मानवाधिकार पर पूछा। पूछा कि सरकार जी मीडिया के प्रश्न क्यों नहीं लेते हैं। हमारे विदेश सचिव जी, संभवतया आईएएस, आईएफएस टॉपर रहे होंगे, उन्होंने सब समझा दिया। पांच हज़ार साल से लेकर कोविड की वैक्सीन तक सब बता दिया। हेले ने टोका भी कि मुझे संक्षेप में मेरे प्रश्न का उत्तर चाहिए पर बंदा भारतीय था, ख़ालिस भारतीय। बंदा जरा नहीं डिगा। हेले महोदया को यह नहीं पता था कि भारत में टॉप वह करता है जो प्रश्न अकबर पर पूछा जाए तो 'मुगले आज़म' के डायलॉग और फ़िल्म 'जोधा अकबर' की कहानी से पेज भर दे।
पत्रकार महोदया जी, आपको अपनी फ्रीडम पर गर्व है। एक बात बताओ, आप क्या अपने सरकार जी से पूछ सकती हो, आप आम कैसे खाते हो। चलो, आम छोड़ो। वह भारतीय फल है। आप आयात करते होंगे। आप अपने सरकार जी से पूछ सकती हैं, आप केला कैसे खाते हैं। छील कर खाते हैं या बिना छीले खा जाते हैं। छील कर खाते हैं तो चाकू से काट कर, पीस पीस बना कर के खाते हैं या फिर सीधा दांतो से ही काट कर निगल जाते हैं। केले की चाट बना कर खाते हैं या बनाना शेक बनाते हैं। और हाँ, गुठली का क्या करते हैं। ओह सॉरी, केले में तो गुठली होती ही नहीं है। मैं पूछ तो केले के बारे में रहा हूँ पर दिमाग़ में आम ही घूम रहा है।
और हाँ, मिस हेले जी, आपके सरकार जी इस प्रश्न का उत्तर दे पाएंगे कि क्या वे अपनी जेब में बटुआ, मतलब पर्स, अरे वही जिसे आप वैले कहते हो, रखते हैं। उत्तर क्या देंगे, आप पूछेंगी ही नहीं। आपको यह सब पूछने की स्वतंत्रता ही नहीं है। हमारे यहाँ प्रेस को इतनी स्वतंत्रता है कि वह सरकार जी से यह सब भी पूछ सकती है। हमारे पत्रकार यह भी पूछ सकते हैं कि हे सरकार जी, आप क्या खाते हैं कि आप थकते ही नहीं हैं। आप पत्रकारिता में नंबर वन, स्वतंत्रता में अव्वल होंगे, पर यह सब नहीं पूछ सकते हो।
और हाँ, अगर बाई चांस, आपके सरकार जी सीरियसली यह लूज़ टॉक कर दें कि मैं नॉन बायोलॉजिकल हूँ, वैसे तो वे पढ़े लिखे हैं, ऐसी बात कहेंगे ही नहीं, फिर भी अगर कह दें तो! आपका क्या रिस्पांस होगा। आप कैसे रियेक्ट करेंगी।
यह आपका सौभाग्य है कि आप नोर्वे में पैदा हुई हैं। भारत में पैदा हुई होती और कुछ ऐसा वैसा बोल देतीं तो इधर उधर भाग रही होतीं। अपनी एंटीसिपेटरी बेल करा रही होतीं। और आप जैसे अर्बन नक्सल, लीब्राण्डू, सिकुलर, देशद्रोही लोगों के लिए तो हमारे देश में 'जेल इज रूल एंड बेल इस एक्सेप्शन' है। समझीं क्या?
(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं)
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