साम्राज्यवाद के लुटेरे दौर में आज कोई देश सुरक्षित नहीं
जब सोवियत संघ का पराभव हुआ था, उदारपंथी पूंजीवादी लेखक इसका एलान कर रहे थे कि जनतंत्र की सार्वभौम विजय और स्थिरता का युग आ पहुंचा है। वे समाजवादी चुनौती को अनावश्यक और निरर्थक मानते थे और यह मानते थे कि पूंजीवाद, जो पहले ही अपने उपनिवेशों को स्वतंत्रता दे चुका था तथा सार्वभौम वयस्क मताधिकार एवं उसकी रीढ़ के रूप में कल्याणकारी राज्य के कदमों को ला चुका था, इस चुनौती की नामौजूदगी में मानवता के लिए शांति, आर्थिक सुरक्षा तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुनिश्चित करने जा रहा है।
दूसरी ओर, अनेक वामपंथी लेखक थे, जो निरुपनिवेशीकरण और सार्वभौम वयस्क मताधिकार तथा कल्याणकारी राज्य के कदमों के लाए जाने को, पूंजीवाद के हाथों से झपटी गयी ऐसी रियायतों के रूप में देखते थे, जिन्हें उस समय छीना गया था जब पूंजीवाद, समाजवादी चुनौती के चलते अपने अस्तित्व के लिए ही संकट का सामना कर रहा था।
इन वामपंथी लेखकों ने यह पूर्वानुमान प्रस्तुत किया था कि इस चुनौती के पीछे हटने से, पूंजीवादी व्यवस्था फिर से अपने सामान्य लुटेरे रूप में आ जाएगी और इन रियायतों को वापस छीन लेगी। ये बाद वाले लेखक ही सही साबित हुए हैं और साम्राज्यवाद ने--यहां हम उसी की बात करेंगे--अपने नंगे तौर पर हमलावर स्वभाव को प्रदर्शित किया है और उस चीज का प्रदर्शन किया है जिसे उसका "लुटेरा दौर" ही कहा जा सकता है।
अमेरिकी साम्राज्यवाद ने क्या किया है? उसने एक सैन्य कार्रवाई के जरिए, एक अन्य देश के विधिवत निर्वाचित राष्ट्रपति, वेनेजुएला के निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी को उनके घर से अगवा कर लिया है और उन्हें हथकड़ियां डालकर अमेरिका लाया गया है, जहां उन पर ऐसे फर्जी आरोपों में मुकद्दमा चलाया जा रहा है, जिनके लिए कोई विश्वसनीय साक्ष्य हैं ही नहीं। और अमेरिका उनके देश पर तब तक सीधे-सीधे अपने उपनिवेश के तौर पर राज करेगा, जब तक कि वह किसी पर्याप्त रूप से अनुकूल सरकार को इस देश पर बैठा नहीं देता है। यह एक अविश्सनीय धृष्टता की करतूत है, जो अंतरराष्ट्रीय आचरण के सभी कानूनी तथा नैतिक नियमों को पांवों तले रौंदती है और साम्राज्यवाद के इस लुटेरे दौर की ही पहचान कराती है।
बहरहाल, यह तो साम्राज्यवाद के लुटेरे दौर की ताजातरीन करतूत भर है। इराक के सद्दाम हुसैन को जबरन सत्ता से हटाया गया तथा फांसी पर लटका दिया गया और वह भी पूरी तरह से फर्जी आरोप लगाकर किया गया। लीबिया के मुअम्मार गद्दाफी की नृशंसता से हत्या कर दी गयी। सीरिया पर कब्जा कर लिया गया। फिलिस्तीनी जनता का नरसंहार किया गया, जबकि उसका कसूर सिर्फ इतना है कि उसे यह मंजूर नहीं है कि साम्राज्यवाद-समर्थिक सैटलर औपनिवेशिक परियोजना के जरिए, उसे अपने घरों से बेदखल कर दिया जाए। ग़ज़ा को एक अमेरिकी उपनिवेश के रूप में हाथ में लिया जा रहा है, जिसका शासन डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चुना गया "वायसराय" संभालेगा और ग़ज़ा को एक बेश कीमती अचल संपत्ति के टुकड़े में तब्दील कर दिया जाएगा। ये सभी साम्राज्यवाद के लुटेरे दौर के उन्मुक्त होने की प्रक्रिया में आए प्रकरण हैं।
यह अकेले ट्रंप का ही मामला नहीं है
उदारवादी विचारक अब भी, डोनाल्ड ट्रंप को एक सिरफिरे के रूप में लुटेरे की तरह आचरण करने के लिए जिम्मेदार तो मानते हैं, लेकिन हाल की लुटेरों वाली करतूतों की सारी जिम्मेदारी उसी पर डालते हैं। लेकिन, ऊपर बताए गए प्रकरणों में से अधिकांश तो डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने से पहले के हैं। ट्रंप और उससे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बीच अंतर यही है कि दूसरे राष्ट्रपतियों ने अपनी लुटेरी करतूतों सभ्य लफ्फाजी के आवरण में छुपाने का काम किया था, जबकि ट्रंप अपने प्रशासन के इरादों को छुपाने की कोई कोशिश नहीं करता है। इसके अलावा, पीछे उल्लेखित प्रकरणों में से हेरक में, और इसमें फिलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार भी शामिल है, अन्य साम्राज्यवादी देशों का पूरा समर्थन हासिल रहा है, जबकि वे अपने कथित उदारवादी सिद्धांतों का ढोल पीटते कभी नहीं थकते हैं। यहां तक कि निकोलस मादुरो के अपहरण को भी, जिसकी दुनिया भर ने निंदा की है, जिसके अपवाद वैश्विक दक्षिण के गिने-चुने देश ही हैं जो ट्रंप को खुश करना चाहते हैं (जिनमें दुर्भाग्य से भारत भी शामिल है), जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन का सक्रिय या मूक समर्थन हासिल है।
खासतौर पर अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों द्वारा एक दलील इस तरह की दी जा रही है कि निकोलस मादुरो तो एक तानाशाह शासक था, इसलिए उसके सत्ता से हटाए जाने पर कोई आंसू नहीं बहाए जाने चाहिए। इस दलील का सरासर बेतुकापन साफ देखा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय कानून अमेरिका को और वास्तव में किसी अन्य देश को भी, इसकी इजाजत नहीं देते हैं कि किसी अन्य देश के मामलों में सैन्य हस्तक्षेप करे, जिससे वहां जनतंत्र की स्थापना कर सके। यह तय करना तो संबंधित देश की जनता पर ही है कि उसका शासक कौन होगा। इसलिए, अमेरिकी हस्तक्षेप के संदर्भ में यह तो पूरी तरह से ही अप्रासांगिक है कि मादुरो तानाशाह था या नहीं था।
इसके अलावा, ट्रंप को खुद खुलेआम यह स्वीकार कर चुका है कि वेनेजुएला में मादुरो की मुख्य विरोधी, मारिया कोरिना मचाडो को इसके लिए पर्याप्त जनसमर्थन हासिल नहीं है कि मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वह प्रशासन को संभाल सके। किसी देश में जहां दो राजनीतिक मोर्चे हों, अगर एक को पर्याप्त जनसमर्थन हासिल नहीं है, तो तर्क तो यही कहता है कि दूसरे मोर्चे को उससे ज्यादा समर्थन हासिल होगा। ऐसी सूरत में यह दावा करना, जो दावा खुद ट्रंप ने तथा अनेक यूरोपीय नेताओं ने किया है, कि मादुरो को राजनीतिक वैधता हासिल नहीं थी, पूरी तरह से बकवास है। अगर मचाडो को राजनीतिक वैधता हासिल नहीं है और मादुरो को भी हासिल नहीं है, तब ट्रंप को बताना चाहिए कि वेनेजुएला में राजनीतिक वैधता किसे हासिल है?
असली मकसद तेल व अन्य संसाधनों की लूट
मादुरो को हटाने का असली कारण ट्रंप ने अपनी खास उजड्डता के साथ खुद ही बता दिया। शनिवार, 3 जनवरी को अपने संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा: "हम बहुत भारी मात्रा में संपदा (वेनेजुएला की) जमीन से निकालने जा रहे हैं।" उनका कहना था कि इससे जो पैसा बनेगा वह सिर्फ वेनेजुएला के लोगों के लिए ही नहीं होगा बल्कि अमेरिकी तेल कंपनियों को भी जाएगा और "उस देश द्वारा किए गए नुकसानों के लिए प्रतिपूर्ति के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका को जाएगा।" वह जिन नुकसानों का जिक्र कर रहे थे, ऐसा लगता है कि वेनेजुएला के अपने तेल संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करने से हुए कथित नुकसान हैं।
वेनेजुएला के पास दुनिया के दूसरे किसी भी देश से ज्यादा तेल है। उसके संचित तेल भंडार, विश्व के कुल संचित तेल भंडार के 17 फीसद के बराबर बैठेंगे। और वेनेजुएला का तेल लूटने का ट्रंप का प्रस्ताव, खुल्लम खुल्ला यह कबूल करना है कि इस देश को हथियाने और उसे चलाने का यही मकसद है। यह खुली डकैती के सिवा और कुछ नहीं है। चूंकि तुम्हारे पास तेल है, उसे हम हथिया लेंगे। अगर तुम्हारा राष्ट्रपति इसके आड़े आता है तो हम उसका अपहरण कर लेंगे और उसके बाद तुम्हारे देश को या तो सीधे एक उपनिवेश की तरह चलाएंगे या फिर उसकी जगह किसी कठपुतली सरकार को बैठा देंगे, जो हमें तुम्हारे देश को लूटने का मौका देगी।
बेशक, दूसरे देशों के संसाधनों को, जिसमें उनकी जमीन या जमीन से मिलने वाले उत्पाद भी शामिल हैं, लूटने का काम साम्राज्यवाद हमेशा से ही करता आया है। यह तो साम्राज्यवाद के केंद्र में ही है। निरुपनिवेशीकरण के बाद उसने लूट की इस प्रक्रिया को जारी रखने के लिए, इस काम में अपने आड़े आने वाली सरकारों का तख्तापलट कराने और उनकी जगह पर अपनी फर्माबर्दार सरकारें बैठने की कोशिश की थी। इसके उदाहरणों के रूप में ग्वाटेमाला में अरबेंज, ईरान में मोसद्देह, कांगो में (तब देश का यही नाम था) लुमुम्बा और चिली के एलेंदे के खिलाफ सीआईए-प्रायोजित तख्तापलटों का नाम खुद ब खुद सामने आ जाता है। और अपेक्षाकृत हाल में पूर्वी-यूरोप तथा पूर्व-सोवियत गणराज्यों में करायी गयी विभिन्न रंगीन क्रांतियां और पश्चिम एशिया पर अमेरिकी हमले भी इसी श्रेणी में आते हैं। इन पहले के तमाम मामलों में और वेनेजुएला के मामले में अंतर इसी तथ्य में निहित है कि जहां पहले के मामलों में अमेरिका यह दिखाने की कोशिश करता था कि वह तो एक आंतरिक टकराव में, एक खास पक्ष का साथ दे रहा था, जबकि पर्दे के पीछे वह तख्तापलट कराने के लिए काम कर रहा होता था, लेकिन वेनेजुएला के मामले में उसने सीधे-सीधे सैन्य हस्तक्षेप किया है और इसके लिए, आंतरिक टकराव के किसी एक पक्ष का समर्थन करने के दिखावे की, तिनके की ओट तक नहीं ली गयी है।
सोवियत संघ की नामौजूदगी से बढ़ते सामराजी हौसले
बेशक, वह ऐसे देशों को भी अपने हमले का निशाना बनाता है जहां साम्राज्यवाद-विरोधी सरकारें हैं, फिर भले ही ये देश खनिज संपदा के मामले में खास संपन्न न हों। ट्रंप ने कुख्यात मुनरो सिद्धांत को पुनर्जीवित करने की अपनी कोशिश के हिस्से के तौर पर क्यूबा, मैक्सिको तथा कोलंबिया को निशाना बनाने के अपने मंसूबों का एलान भी कर दिया है। लेकिन, उसके साम्राज्य के दायरे में लातीनी अमेरिका तथा कैरीबियाई क्षेत्र ही नहीं आते हैं। अमेरिकी दखलंदाजी से आज तो दुनिया का कोई भी देश सुरक्षित नहीं है।
तथाकथित क्यूबाई मिसाइल संकट के दौरान सोवियत संघ ने क्यूबा की हिफाजत की थी, जब अमेरिका ने इस द्वीप देश पर हमले की धमकी दी थी। अमेरिका के साथ नाभिकीय टकराव भड़कने तक का जोखिम लेकर, तब सोवियत संघ ने क्यूबा की हिफाजत की थी। इसी तरह, इससे भी पहले उसने, मिस्र के नेता नासिर द्वारा स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किए जाने के बाद, आंग्ल-फ्रांसीसी हमले के खिलाफ मिस्र की हिफाजत की थी। उन दोनों ही मामलों में साम्राज्यवाद को अपनी पांव पीछे खींचने पड़े थे। आज सोवियत संघ की कमी दुनिया के ऐसे सभी देशों को बहुत खलने वाली है, जिनके लिए अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवाद से खतरा है।
साम्राज्यवाद का लुटेरा दौर ज्यादा नहीं चल सकता है
साम्राज्यवाद का यह लुटेरा दौर, जो साम्राज्यवाद की अब तक की चरम अवस्था है, जाहिर है कि बहुत लंबा नहीं चल सकता है। दुनिया भर के लोग और खासतौर पर तीसरी दुनिया के लोग, जोकि साम्राज्यवाद के शिकार रहे हैं, एक बार फिर से साम्राज्यवादी प्रभुत्व के अंगूठे के नीचे दबे रहना मंजूर नहीं करेंगे। वास्तव में अरब दुनिया में साम्राज्यवादी लुटेरेपन के पहले वाले प्रकरणों में भी, उसकी दखलंदाजी के नतीजे, उसके मंसूबों से काफी भिन्न ही रहे हैं।
इस संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि ट्रंप की यह सरलीकृत धारणा अब तक खोखली साबित भी हो चुकी है कि अब जब मादुरो को उसने रास्ते से हटा दिया है और वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति, डेल्सी रोड्रिग्ज, जिन्होंने उनकी जगह ली है, अमेरिका के फरमानों पर नाचेंगी। डेल्सी रोड्रिग्ज ने अमेरिकी कार्रवाई की भर्तस्ना की है और मादुरो को रिहा किए जाने की मांग की है। इसके चलते ट्रंप ने अब उन्हें भी धमकियां देनी शुरू कर दी हैं कि उनका हश्र मादुरो से भी बुरा होगा। वास्तव में पूरा का पूरा देश ही अमेरिकी लुटेरपन के खिलाफ उठकर खड़ा हो गया है। बेशक, सोवियत संघ की नामौजूदगी से पूरे विश्व पर प्रभुत्व कायम करने के साम्राज्यवाद के हौसले तो बढ़ गए हैं, फिर भी प्रभुत्व का उसका सपना एक सपना ही रह जाएगा।
(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित यह लेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–
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