ख़बरों के आगे-पीछे: मायावती पर कांग्रेस का दांव!
सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी छोटी अदालतों के ठेंगे पर
सरकारें तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों या टिप्पणियों को अक्सर ही अनदेखा करती ही रहती हैं, लेकिन अब तो निचली अदालतें भी ऐसा करने लगी हैं। पिछले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइंया की बेंच ने जमानत के बारे में बड़ी टिप्पणी की। दोनों जजों ने कहा कि जमानत नियम है और जेल अपवाद है। उन्होंने यह भी कहा कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून यानी यूएपीए के मामले में भी यही नियम लागू होता है।
यह टिप्पणी करते हुए दोनों जजों ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद की जमानत खारिज होने का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जमानत खारिज करते हुए दो जजों की बेंच ने जमानत को लेकर दिए गए सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के फैसले की अनदेखी की। उनके कहने का अर्थ यह था कि उमर को भी जमानत मिलनी चाहिए। दो जजों की बेंच की टिप्पणियों से लगा कि पांच साल से ज्यादा समय से जेल में बंद उमर को अब जमानत मिल जाएगी। उमर को शुक्रवार को हाई कोर्ट से तीन दिन की सशर्त अंतरिम जमानत मिल भी गई लेकिन इससे पहले मंगलवार को दिल्ली की एक निचली अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत की याचिका भी खारिज कर दी। उमर ने अपने दिवंगत चाचा के चेहल्लुम (चालीसवें) में शामिल होने के साथ-साथ अपनी मां सर्जरी के समय मौजूद रहने के लिए 15 दिन की जमानत मांगी थी, लेकिन निचली अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया था।
भाजपा नेताओं को पीछे छोड़ रहे हैं सेना प्रमुख
पाकिस्तान को लेकर इतिहास और भूगोल की बात करते हुए भाजपा और संघ के नेता हमेशा कहते रहे हैं कि क्या करें खराब पड़ोसी मिल गया है। इसके आगे वे कहते हैं कि इतिहास बदला जा सकता है लेकिन भूगोल नही। हालांकि यह गलत है। असल में इसका उलटा होता है। इतिहास नहीं बदला जा सकता है। बड़े नेता भूगोल बदलते हैं। इंदिरा गांधी ने भूगोल बदला था। बिस्मार्क से लेकर हेलमुट कोल और माओ से लेकर व्लादिमीर पुतिन तक सबने भूगोल बदला है। लेकिन भाजपा के नेता भूगोल की बजाय इतिहास बदलने की बात करते हैं।
अब इससे आगे बढ़ कर इतिहास और भूगोल की बात सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी ले आए हैं। जनरल द्विवेदी दो महीने बाद जुलाई में रिटायर होने वाले हैं। उससे पहले उन्होंने पाकिस्तान को धमकाते हुए कहा है कि पाकिस्तान सोच ले कि उसे इतिहास में दफन होना है या भूगोल में रहना है। उनका कहना था कि अगर पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता रहेगा तो भारत उसको भूगोल से मिटा देगा। आधुनिक युग में किसी देश के कुछ इलाके को अपने देश में मिला कर उसका भूगोल बदलने की मिसाल तो है लेकिन पूरा देश ही मिट जाए या पूरे देश को कोई देश अपने में मिला ले ऐसा नहीं हुआ है। भारत भी पाकिस्तान के साथ ऐसा कुछ नहीं कर सकता है और करने का इरादा भी नहीं है। फिर भी रिटायर हो रहे जनरल साहब की बात दिन-रात पाकिस्तान को मिटाने की बात करने वालों के एक समूह को भी अच्छी लगी होगी। अब देखना होगा कि जुलाई के बाद क्या होता है?
केरल और तमिलनाडु में राजनीतिक सद्भाव की मिसाल
देश के कर्कशता भरे मौजूदा राजनीतिक माहौल में तमिलनाडु और केरल के मुख्यमंत्रियों ने एक अच्छी मिसाल बनाई है। जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे उनमें पश्चिम बंगाल और असम में तो पक्ष और विपक्ष के बीच दुश्मन जैसे रिश्ते हैं। चुनाव के बाद भाजपा नेताओं ने विपक्ष के खिलाफ अपमानजनक बयान दिए तो विपक्ष के नेताओं ने भी पहले दिन से सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। विपक्ष का कोई भी नेता न तो शुभेंदु अधिकारी और न ही हिमंत बिस्व सरमा के शपथ ग्रहण में गया। तमिलनाडु में भी विपक्ष का कोई नेता मुख्यमंत्री विजय की शपथ में भी नहीं गया। लेकिन शपथ के बाद विजय लगभग सभी विपक्षी नेताओं से मिले। उन्होंने एमके स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन से मुलाकात की तो वाइको से भी मिले। विजय ने विपक्ष के प्रति सद्भाव की ऐसी मिसाल बनाई, जो पहले देखने को नहीं मिलती थी। एक समय तमिलनाडु की राजनीति ऐसी थी कि करुणानिधि ने जयललिता को जेल भेजा था तो जयललिता की पुलिस करुणानिधि और मुरासोली मारन को घसीटते हुए जेल ले गई थी। लेकिन विजय ने उसे बदला है।
उधर केरल में भी मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने ऐसी ही मिसाल बनाई। वे कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री मनोनीत होने के बाद निवर्तमान मुख्यमंत्री और सीपीएम नेता पिनरायी विजयन से मिलने उनके घर गए। दोनों की हंसते मुस्कुराते फोटो और वीडियो जारी हुए। यह लोकतंत्र की बेहद खूबसूरत तस्वीर थी, जो दिखाती है कि राजनीति दल आपस में प्रतिद्वंद्वी होते हैं, दुश्मन नहीं। ये तस्वीर यह भी दिखाती है कि चुनाव हारने से जीवन समाप्त नहीं होता है।
तेल बचाने के लिए नेताओं की नौटंकिया
राजनीतिक रूप से भारत एक प्रदर्शन प्रधान देश है। यहां नेता जिस तरह अपनी नौटंकी का प्रदर्शन करते हुए जनता को मूर्ख बनाते हैं, वैसा दुनिया के किसी और देश के नेता नहीं करते होंगे। अभी तेल का वैश्विक संकट शुरू हुआ तो दुनिया भर के देशों ने अपने यहां इस संकट से निपटने के उपाय शुरू किए। लेकिन भारत में सरकार ने पहले तो 70 दिन तक संकट को स्वीकार ही नहीं किया गया क्योंकि पांच राज्यों में चुनाव होने थे। चुनावों में बेहिसाब रैलियां हुईं, रोड शो हुए, नेताओं के विशेष विमान उड़ते रहे। शपथ ग्रहण समारोह तक यह तमाशा चला। उसके बाद अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल, डीजल, गैस आदि किफायत से खर्च करने को कहा। मिसाल बनाने के लिए एक दिन वे भी दो गाड़ियों के काफिले से निकले।
उसके बाद उनकी पार्टी के दूसरे नेताओं ने जो तमाशा शुरू किया, वह लोगों के लिए सिरदर्द बन गया और सोशल मीडिया को मजाक का मसाला मिल गया। भाजपा के नेताओं में होड़ मची है कि कौन कितने क्रिएटिव तरीके से दिखावा कर सकता है।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और मंत्री कपिल मिश्रा मीडिया को दिखाने के लिए एक दिन मेट्रो से चले। राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के बारे में खबर आई कि उन्होंने अपने काफिले में गाड़ियों की संख्या काफी कम कर दी है। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने सबको पीछे छोड़ते हुए एक दिन बाइक चलाते हुए सचिवालय गए। राजस्थान में एक जज साहेब ने साइकिल से अदालत जाने का फैसला किया तो बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सबको पीछे छोड़ते हुए पैदल चल कर सचिवालय गए। अब देखना है कि इससे आगे की क्रिएटिविटी कौन दिखाता है!
मायावती पर कांग्रेस का दांव
सोशल मीडिया में इस बात का मजाक बनाया जा रहा है कि कांग्रेस के दो नेता राजेंद्रपाल गौतम और तनुज पुनिया अचानक मायावती से मिलने पहुंचे थे लेकिन मायावती के कार्यालय के बाहर से गार्ड ने उन्हें लौटा दिया।
पहली नजर में यह मामला मजाक का ही दिखता है। याद करें कि कैसे पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कुछ अन्य नेताओं को लेकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के घर के बाहर पहुंच गए थे और कह रहे थे कि उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल किया जाए। राजद ने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद ओवैसी की पार्टी के पांच उम्मीदवार मुस्लिम बहुल सीटों से चुनाव जीत गए।
ठीक उसी तर्ज पर कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के एससी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजेंद्रपाल गौतम ने बसपा प्रमुख पर दांव खेला है। वे तनुज पुनिया के साथ मायावती से मिलने गए। उन्हें पता था कि मायावती नहीं मिलेंगी। फिर भी वे गए तो इसका मकसद चुनाव से पहले राज्य के दलित मतदाताओं को यह संदेश देना था कि कांग्रेस उनके हितों का ध्यान रखने वाली पार्टी है और इसलिए वह बसपा से तालमेल करना चाहती है।
कांग्रेस के लोग एआई जेनरेटेड एक पोस्टर भी सोशल मीडिया में शेयर कर रहे हैं, जिसमें बसपा को कांग्रेस का स्वाभाविक सहयोगी बताया जा रहा है। गौरतलब है कि जब से खरगे कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं तब से दलित समुदाय में कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी है। सो, दोनों नेताओं का मायावती के यहां जाना सोचा समझा दांव था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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