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ख़बरों के आगे-पीछे: मुसलमानों से घृणा करना अब फ़ैशन बना

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन अपने साप्ताहिक कॉलम में विभिन्न राज्यों की राजनाति पर बात कर रहे हैं। साथ ही नफ़रती राजनीति की उस नब्ज़ पर हाथ धर रहे हैं जिसमें अब हर छोटा-बड़ा नेता खुलकर कहने लगा है कि 'हमको मुसलमान का वोट नहीं चाहिए’ या 'हमको मुसलमान ने वोट नहीं दिया है’ या 'हम मुसलमान का काम नहीं करेंगे।’।
SUBENDU-HIMANTAA
तस्वीर सोशल मीडिया से साभार

बंगाल में सब कुछ खुला खेल

सबको मालूम है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर कैसे हुआ। चुनाव आयोग ने एसआईआर के नाम पर करीब 91 लाख नाम काट दिए। इनमें 27 लाख 10 हजार तो ऐसे लोग हैं, जो जिंदा हैं, बंगाल में ही रहते हैं और उनके पास जरूरी दस्तावेज भी हैं, लेकिन तार्किक विसंगति के नाम पर उनके भी नाम हटाए गए, जिससे वे वोट नहीं डाल सके। इस तरह का पक्षपातपूर्ण एसआईआर जिस व्यक्ति की निगहबानी में हुआ, उस सुब्रत गुप्ता को चुनाव खत्म होते ही राज्य में नई बनी भाजपा सरकार का सलाहकार बना दिया गया। सुब्रत गुप्ता को पश्चिम बंगाल में एसआईआर की निगरानी के लिए विशेष पर्यवेक्षक बनाया गया था। यही नहीं, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया है। मनोज अग्रवाल के नेतृत्व में ही एसआईआर की प्रक्रिया, सुरक्षा बलों की तैनाती और पूरी चुनाव प्रक्रिया संपन्न हुई। 

यह समझना मुश्किल नहीं है कि इन दोनों नियुक्तियों के जरिये भाजपा ने क्या मैसेज दिया है। भाजपा ने बताया है कि राजनीति में लोक लाज से उसका कोई संबंध नहीं है। दूसरा मैसेज राज्य की समूची नौकरशाही को है कि भाजपा किसी को भी कुछ भी दे सकती है। यह मैसेज साधारण नहीं है। ज्यादातर अधिकारी वैसे भी अच्छा पद पाने के लिए कुछ भी समझौता करने को तैयार रहते हैं। मुख्यमंत्री बनाए गए शुभेंदु अधिकारी को तो पूर्व में कैमरे पर रिश्वत लेते हुए पूरे देश ने देखा ही था।

परजीवी होने में भाजपा और कांग्रेस का अंतर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को परजीवी पार्टी कहा है। उन्होंने यह बात पिछले सप्ताह दक्षिण भारत के दौरे पर उस समय कही जब तमिलनाडु में नई सरकार शपथ ले रही थी और मंच पर मुख्यमंत्री विजय के साथ राहुल गांधी भी मौजूद थे। मोदी का कांग्रेस को परजीवी कहना एक स्तर पर सही है। हालांकि अभी जिन तीन राज्यों- कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है वह सरकार उसने अपने दम पर बनाई है। चौथा राज्य केरल है, जहां कांग्रेस की सरकार बन रही है। वहां जरूर कांग्रेस एक क्षेत्रीय पार्टी के साथ मिल कर लड़ी। अगर दूसरी पार्टियों पर कांग्रेस की निर्भरता की बात करें तो बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्य हैं, जहां कांग्रेस निर्भर है। लेकिन ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस अकेले ही राजनीति करती है।

कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहां कांग्रेस गठबंधन में है लेकिन उसकी ताकत भी कम नहीं है और वहां गठबंधन नहीं होने से प्रादेशिक पार्टियों को नुकसान हो सकता है। बहरहाल, एक समय ऐसा भी रहा है जब कुछ राज्यों को छोड़ दे तो भाजपा भी हर जगह गठबंधन के सहारे ही चलती रही है। अटल बिहारी वाजपेयी ने छह साल तक अपनी सरकार करीब 25 पार्टियों के सहारे ही चलाई थी और इस समय मोदी सरकार भी कई पार्टियों के गठबंधन के सहारे ही चल रही है। 

अब अगर कांग्रेस और भाजपा के फर्क की बात करेंगे तो वह भी साफ दिखाई देगा। कांग्रेस जिन पार्टियों के साथ रही उनमें से ज्यादातर पार्टियां आज भी मजबूत स्थिति में हैं। दूसरी ओर भाजपा जिन पार्टियों के साथ रही वे आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। 

मुसलमानों से घृणा करना अब फ़ैशन बना

किसी भी चुनाव में भाजपा की जीत में हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा मुख्य कारक होता है, इसलिए उसका कोई भी नेता नफरती भाषण से परहेज नहीं करता है। लेकिन अब एक नया फैशन देखने को मिल रहा है। छोटे से लेकर बड़े नेता तक खुल कर कहने लगे है कि 'हमको मुसलमान का वोट नहीं चाहिए’ या 'हमको मुसलमान ने वोट नहीं दिया है’ या 'हम मुसलमान का काम नहीं करेंगे।’। पहले इस तरह के बयान नहीं दिए जाते थे। चुनाव में उम्मीदवार हर जाति, समुदाय के लोगों से वोट मांगते थे और चुनाव के बाद सबका काम करने का संकल्प करते थे। हालांकि वह दिखावा ही होता था लेकिन अब ध्रुवीकरण की राजनीति ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है, जहां इस तरह के दिखावे को भी जरूरी नहीं माना जा रहा है। 

हैरानी की बात है कि इस किस्म के बयान देने वाले नेताओं के खिलाफ भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कोई कार्रवाई नहीं करता है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में यह बात प्रदेश के उस बड़े नेता ने कही, जो मुख्यमंत्री बना। उन्होंंने बार-बार कहा कि हिंदू बूथों पर ही उनको वोट मिले हैं और नतीजों के बाद उन्होंने कहा कि वे मुसलमानो का काम नहीं करेंगे। उनकी देखा-देखी अब बंगाल के ही दूसरे भाजपा विधायकों ने भी कहना शुरू कर दिया है कि वे मुसलमानों का काम नहीं करेंगे। मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में तो पहले से ही कई विधायक ऐसा कहते रहे हैं। कुल मिला कर मुसलमानों के प्रति घृणा का खुला प्रदर्शन किया जाने लगा है। 

अन्ना डीएमके का अस्तित्व ख़तरे में

अभी तत्काल तो नहीं कहा जा सकता है कि तमिलनाडु में अन्ना डीएमके का क्या होगा, क्योंकि इससे खराब स्थितियों के बाद भी तमिलनाडु की पार्टियों ने वापसी की है। 2011 के चुनाव में डीएमके ही 25 सीट के आसपास आ गई थी लेकिन उसने वापसी की। हालांकि अन्ना डीएमके का मामला थोड़ा अलग है। यह उन चुनिंदा प्रादेशिक पार्टियों में से है, जिसके संस्थापक नेता ने अपने परिवार से किसी को उत्तराधिकारी नहीं बनाया है। एमजी रामचंद्रन इसके संस्थापक थे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन ने पार्टी संभाली लेकिन वे कामयाब नहीं हुईं और जयललिता नेता बनीं। उन्होंने भी अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया और उनके निधन के बाद उनके दो करीबी नेताओं ओ. पनीरसेल्वम और ई. पलानीस्वामी में घमासान छिड़ गया। पनीरसेल्वम ने आखिरकार हथियार डाले और डीएमके के साथ चले गए। 

अब अन्ना डीएमके में फिर विभाजन हो गया है। सीवी षणमुगम 30 विधायकों को लेकर अलग हो गए हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री जोसेफ विजय को समर्थन दे दिया है। पलानीस्वामी के साथ 17 विधायक बचे हैं। दूसरी ओर एक फोर्स के तौर पर विजय की पार्टी आ गई है और डीएमके में एमके स्टालिन के बाद उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन को पार्टी की कमान संभालना है। अन्ना डीएमके मे जो हो रहा है उससे प्रमाणित होता है कि प्रादेशिक पार्टियों के संस्थापक नेताओं के परिवार का कोई व्यक्ति आगे नहीं आए तो पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट होता है। अन्ना डीएमके पहले भी इसलिए बची क्योंकि उसे जयललिता जैसा करिश्माई नेतृत्व मिला था।

रेवंत रेड्डी को मोदी का प्रस्ताव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद की सभा में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अपने साथ आने का प्रस्ताव दिया। मोदी ने खास संदर्भ के साथ यह बात कही लेकिन उनका कहना अनायास नहीं था। उन्होंने राज्य की भलाई के लिए रेवंत रेड्डी को अपने साथ आने की बात कही। इसका सीधा मतलब तो यह है कि रेवंत रेड्डी अगर प्रधानमंत्री का प्रस्ताव नहीं मानते हैं तो तेलंगाना की भलाई के लिए केंद्र सरकार की मदद नहीं मिलेगी। 

वैसे रेवंत रेड्डी को सत्ता संभाले अभी ढाई साल ही हुए हैं, इसलिए वे कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन उनके साथ दो बातें ऐसी हैं, जो संदेह पैदा करती हैं। पहली तो यह कि वे सोनिया और राहुल गांधी के प्रति बहुत ज्यादा स्वामीभक्ति दिखाते हैं। उन्होने कहा था कि अगर गांधी परिवार कहे तो वे एक हजार करोड़ रुपए भी जुटा कर दे सकते हैं। ऐसी स्वामीभक्ति की बातें करने वालों को लेकर हमेशा संदेह होता है। 

दूसरी बात यह है कि रेवंत रेड्डी काफी समय तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से ही कांग्रेस में आए थे। दूसरी ओर हिमंत बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता हैं, जिनका संघ से कभी कोई जुड़ाव नहीं रहा, लेकिन जब भाजपा में गए तो वहां जाकर ऐसे रमे कि संघ के पुराने स्वयंसेवकों को भी मात देने लगे। सो, रेवंत रेड्डी के भीतर का स्वयंसेवक कब जाग जाए वे भाजपा की ओर चल पड़े, कहा नहीं जा सकता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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