पत्रकार भाषा सिंह दलेस कीर्ति सम्मान से सम्मानित
‘भोगा हुआ यथार्थ’ जब ‘देखे हुए यथार्थ’ के साथ समन्वय करता है, तब पूरा सच उजागर होता है, स्थापित होता है। इसलिए दलेस अपनी सीमाएं तोड़ते हुए ऐसे लोगों को भी सम्मानित कर रहा है, जो दलित समाज से न होते हुए भी इस सच को पूरी संवेदनशीलता और साक्षी भाव से रिपोर्ट कर रहे हैं। लिख रहे हैं, कह रहे हैं, बता रहे हैं।
यह कहना है दलित लेखक संघ (दलेस) के अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी का। वह दलेस के सालाना समारोह में बोल रहे थे।
दलेस ने 15 अगस्त, 2026 को अपना तीसवां स्थापना दिवस मनाया। इस मौके पर पत्रकार, कवि-लेखक भाषा सिंह को दलेस कीर्ति सम्मान से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान दलित चेतना के अंतर्गत कला, साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए दिया जाता है।
दलेस का यह छठा कीर्ति सम्मान था। इससे पहले यह सम्मान चित्रकला के लिए चित्रपाल, दलित लेखन के लिए मोहनदास नेमिशराय और जयप्रकाश कर्दम, कविता विधा में आलोचना के लिए शेखर पवार और चित्रकार सावी (सविंद्र) सावरकर को दिया जा चुका है।

छठे कीर्ति सम्मान से सम्मानित भाषा सिंह ने लीक से हटकर पूरी बेबाकी से लिखा-पढ़ा और पत्रकारिता की। उन्होंने अमर उजाला कारोबार, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, आउटलुक पत्रिका में काम किया और हाल तक न्यूज़क्लिक न्यूज़ पोर्टल से जुड़ी रहीं। इस समय वह अपना यू-ट्यूब चैनल “बेबाक भाषा” चला रही हैं। उन्होंने ‘आउटलुक’ पत्रिका में काम करते हुए मैला ढोने वाले समाज का सच लोगों के सामने रखा और बताया कि किस तरह कानूनी रूप से प्रतिबंधित होने के बाद भी मैला ढोने का यह अमानवीय कार्य कराया जा रहा है। इसे लेकर उन्होंने एक किताब भी लिखी ‘अदृश्य भारत’। जिसका अंग्रेज़ी समेत कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह एक ऐसा दस्तावेज़ है जो भारत में दलितों की स्थिति ख़ासकर सफ़ाई कर्मचारियों और उनमें भी महिलाओं की स्थिति और सरकारों की उदासीनता को उजागर करता है। इसके अलावा उन्होंने सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ दिल्ली समेत देशभर में हुए आंदोलन को “शाहीन बाग़: लोकतंत्र की नई करवट” नाम से दर्ज किया और महिलाओं ख़ासकर मुस्लिम महिलाओं के ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। इसके अलावा भाषा सिंह ने अपनी कविताओं “योनि सत्ता संवाद : पलकों से चुनना वासना के मोती” के जरिये भी सत्ता-समाज से तीखे सवाल किए।
कुल मिलाकर पत्रकार, कवि-लेखक के तौर पर उनका काम समाज के मेहनतकश और हाशिये के लोगों ख़ासकर दलित-पिछड़े-आदिवासियों, अल्पसंख्यकों की आवाज़ बनना रहा है।
यही वजह हैं कि उन्हें दलेस कीर्ति सम्मान के लिए चुना गया।
यही बात कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बैजवाड़ा विल्सन ने भी कही। उन्होंने कहा कि यह एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि उनके काम और विचार का सम्मान है। जो दलितो-वंचितों के हक़ में खड़ी रही है।
दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित अंबेडकर भवन में हुए इस कार्यक्रम में ‘पत्रकारिता, लोकतंत्र और धार्मिक-सामाजिक विषमता’ पर भी गहन चर्चा की गई। कवि-पत्रकार और सफाई कर्मचारी आंदोलन से ही जुड़े राज वाल्मीकि ने भी भाषा सिंह की पत्रकारिता और लेखन का उल्लेख करते हुए इस विडंबना को उजागर किया कि देश भले आज़ादी के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर गया हो पर सच्चा लोकतंत्र अभी भी काफी दूर है। दुखद है कि लोकतंत्र की हालत और बद से बदतर होती जा रही है। बाबा साहेब आंबेडकर तो पहले ही कह गए थे कि एक वोट एक मूल्य से राजनीतिक लोकतंत्र भले आ जाए लेकिन जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र और आर्थिक लोकतंत्र न आ जाए तब तक सच्चा लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
इस मौक़े पर भाषा सिंह ने अपने मंतव्य में कहा कि मैला ढोने वाले समुदाय को बहुत नज़दीक से देखने और उनसे बात करने पर उनके दुख-सुख, उनकी यातना के साथ उनकी जिजीविषा का भी पता चला। पता लगा कि लोग ख़ासकर महिलाएं इतनी अमानवीयता से जूझते हुए भी कितने जीवट से भरी हैं।
भाषा सिंह ने आंध्र प्रदेश की नारायणाम्मा को भी याद किया जिन्होंने सामूहिक शौचालयों का ध्वंस किया जिसमें वे वर्षों मैला साफ करती रहीं। उन्होंने हरियाणा की सरोज देवी को भी याद किया जो काफी संघर्षों के बाद मैला मुक्त हुईं।
इस अवसर पर कवि-शिक्षक पूनम तुषामड़ ने भाषा सिंह के बारे में आलेख पाठ किया। सरिता संधू ने भाषा सिंह की चार कविताओं का पाठ किया। स्वयं भाषा सिंह ने भी अपनी एक कविता का पाठ किया।
विशिष्ट अतिथि शेखर पवार और नेतराम ठगेला ने भाषा सिंह के योगदान की प्रशंसा करते हुए पत्रकारिता के माध्यम से दलितों और वंचितों की आवाज उठाने की सराहना की।
आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने जय प्रकाश लीलवान को याद करते हुए कहा कि वे पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि नफ़रती फैक्टरियां संविधान की हत्या करेंगी। आज वही ही हो रहा है। ऐसे समय में भाषा सिंह जैसी पत्रकार जोखिम लेते हुए बेबाक पत्रकारिता कर रही हैं जो कि आसान नहीं है।
अभय कुमार ने कहा कि आज के समय में ईमानदार पत्रकारिता सचमुच जोखिम का काम है। पर भाषा सिंह जैसे पत्रकार इस जोखिम को उठा रहे हैं। इस बारे में उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है। उन्होंने जेन-ज़ी की प्रशंसा करते हुए कहा कि चारों ओर भय का वातावरण था लेकिन जेन ज़ी ने इस भय के चक्रव्यूह को तोड़ने में सफलता पाई।
कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन दलेस के पद्म प्रतीक की ओर से किया गया जबकि संचालन बलविन्द्र सिंह बलि ने किया।
कार्यक्रम में रामशरण जोशी, उपेंद्र स्वामी, मुकुल सरल, सुलेखा सिंह, खिलखिल भाषानंदिनी, राजेन्द्र कुमार, अमर सिंह, देव कबीर, डॉ. पूरन सिंह और शोभना आदि उपस्थित रहे।
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